
संसद से सड़क तक संघर्ष के बाद विपक्ष की राजनीति में नए सवाल
-देवेंद्र यादव-

देश के युवाओं की आवाज कौन है? विपक्ष है तो दिखता क्यों नहीं? लंबे समय से देश के राजनीतिक गलियारों और मीडिया में यह चर्चा सुनाई देती रही है। अब सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी को देश के युवाओं के लिए सड़क पर संघर्ष करते देखने के बाद यह बहस थम जाएगी? हालांकि राहुल गांधी पिछले एक दशक से युवाओं के मुद्दों को संसद से लेकर सड़क तक उठाते रहे हैं, लेकिन उनकी आवाज देश के युवाओं तक उस तरह नहीं पहुंच सकी, जैसी अपेक्षा की जा रही थी। यही कारण था कि राजनीतिक गलियारों और मीडिया में बार-बार सवाल उठता रहा कि युवाओं की आवाज कौन है, विपक्ष कहां है और राहुल गांधी सड़क पर संघर्ष क्यों नहीं करते? जबकि वे भारत जोड़ो यात्रा और भारत जोड़ो न्याय यात्रा जैसी यात्राएं निकाल चुके हैं।
अब एक बार फिर राहुल गांधी देश के युवाओं और छात्रों के मुद्दे पर 21 जुलाई, मंगलवार को संसद से सड़क तक उतर आए। वे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, प्रियंका गांधी तथा पार्टी के सांसदों और नेताओं के साथ दिल्ली स्थित प्रधानमंत्री आवास के सामने धरने पर बैठ गए। भारतीय राजनीति में यह पहला अवसर था, जब लोकसभा में विपक्ष के नेता प्रधानमंत्री आवास के सामने धरने पर बैठे।
20 जुलाई को नीट पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर देशभर के छात्र और युवा संसद मार्च कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए बल प्रयोग किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में छात्र और युवा घायल हुए। इसके विरोध में 21 जुलाई को राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और कांग्रेस के अन्य नेताओं ने प्रधानमंत्री आवास तक मार्च किया और धरने पर बैठ गए। बाद में पुलिस ने राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अन्य कांग्रेस नेताओं को हिरासत में ले लिया। इस दौरान राहुल गांधी को चोट भी लगी और उनकी नाक से खून निकलने की खबर सामने आई।
राहुल गांधी के इस प्रदर्शन के बाद बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या वे देश के युवाओं और छात्रों की आवाज बन गए हैं? इसे समझने के लिए दो घटनाओं पर ध्यान देना होगा।
पहली घटना यह कि प्रधानमंत्री आवास के सामने धरने के बाद आम आदमी पार्टी के नेताओं ने राहुल गांधी पर आरोप लगाया कि वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले हुए हैं, इसलिए उन्हें वहां धरना देने की अनुमति मिल गई।
दूसरी घटना समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के अचानक धरना स्थल पर पहुंचने की है। सवाल यह भी है कि जब राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री आवास पर धरना शुरू किया, तब प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री जितेंद्र सिंह उनसे बातचीत करने पहुंचे। दोनों के बीच क्या बातचीत हुई, इसका पूरा विवरण अभी सामने नहीं आया है। लेकिन शाम होते-होते अखिलेश यादव अचानक धरना स्थल पर पहुंच गए। इसके बाद पुलिस और सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो गईं। पहले अखिलेश यादव को हिरासत में लिया गया और उसके बाद राहुल गांधी को भी बलपूर्वक हिरासत में लिया गया।
क्या अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल को यह एहसास हो गया कि राहुल गांधी अकेले ऐसे विपक्षी नेता बनकर उभर रहे हैं, जो युवाओं के मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व कर सकते हैं? क्या इसी वजह से आम आदमी पार्टी ने राहुल गांधी पर प्रधानमंत्री से मिले होने का आरोप लगाया और अखिलेश यादव अचानक उनके धरना स्थल पर पहुंचे?
यहीं से एक बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा होता है। क्या राहुल गांधी देश के युवाओं की आवाज बनेंगे, या वे पहले ही बन चुके हैं? और यदि ऐसा है, तो क्या गैर-भाजपा दल राहुल गांधी को अकेले इस भूमिका में स्वीकार करेंगे?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि नीट पेपर लीक मामले को लेकर देशभर के छात्र लंबे समय तक जंतर-मंतर पर आंदोलन करते रहे। उस दौरान अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल छात्रों से मिलने पहुंचे थे, लेकिन राहुल गांधी धरना स्थल पर नहीं गए थे। उस समय विपक्षी दलों का पूरा फोकस जंतर-मंतर पर था। लेकिन जैसे ही राहुल गांधी स्वयं आंदोलनकारी छात्रों और युवाओं की आवाज बनकर सड़क पर उतरे, आम आदमी पार्टी ने उन पर प्रधानमंत्री से मिले होने का आरोप लगाया और अखिलेश यादव भी अचानक उनके धरना स्थल पर पहुंच गए।
21 जुलाई की घटना के बाद इतना जरूर लगता है कि राहुल गांधी अब पीछे हटने के मूड में नहीं हैं। संकेत यही हैं कि वे देश के युवाओं और छात्रों के मुद्दों पर आगे भी संघर्ष का रास्ता जारी रखेंगे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

















