दिल्ली दरबार में राजस्थान: अब गहलोत नहीं, पायलट की चल रही है

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photo courtesy social media
नतीजा साफ़ है कि दिल्ली दरबार में राजस्थान की सियासत बदल चुकी है। अब सवाल यह नहीं कि गहलोत कितने अनुभवी हैं, सवाल यह है कि आज किसकी सुनी जा रही है। और जवाब भी साफ़ है।

– देवेंद्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

कांग्रेस के दिल्ली दरबार में राजस्थान का नाम आते ही वर्षों तक एक ही चेहरा उभरता रहा अशोक गहलोत। यह हक़ उन्हें अनुभव, राजनीतिक चतुराई और सत्ता की राजनीति से मिला। इसमें कोई बहस नहीं है। लेकिन राजनीति वर्तमान से चलती है, अतीत से नहीं। आज की तारीख़ में सच्चाई यह है कि कांग्रेस के दिल्ली दरबार में राजस्थान से अगर किसी नेता की चल रही है, तो वह सचिन पायलट हैं। इसका सबूत भाषणों में नहीं, फैसलों में दिखता है।

इसका सबसे साफ़ उदाहरण कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर विनोद जाखड़ की नियुक्ति। विनोद जाखड़ कोई नामी सियासी खानदान से नहीं हैं। वे राजस्थान के एक साधारण दलित परिवार से आते हैं। विनोद जाखड़ छात्र राजनीति में लड़े, अध्यक्ष बने, 800 किलोमीटर की नशा मुक्ति यात्रा की। और उसी संघर्ष के दौरान सचिन पायलट उनके साथ सड़क पर खड़े दिखे। यह कोई संयोग नहीं था। यह सत्ता का इशारा था।

आज विनोद जाखड़ एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और सचिन पायलट कांग्रेस के राष्ट्रीय महामंत्री के तौर पर संगठन की कमान संभाल रहे हैं। इससे साफ़ है कि दिल्ली में फैसले अब कहाँ से हो रहे हैं।

यह सवाल बेमानी है कि विनोद जाखड़ किस नेता के करीबी हैं। असली सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अब वाकई ज़मीन से जुड़े लोगों को आगे बढ़ा रही है? यही वह लाइन है जिसे राहुल गांधी बार-बार कहते रहे हैं कि संगठन में वही आगे आए जो संघर्ष से निकले हों, न कि उपनाम से। विनोद जाखड़ इस कसौटी पर फिट बैठते हैं। वे किसी बड़े नेता के बेटे नहीं हैं। वे दिल्ली की पैदाइश नहीं, मैदान की पैदाइश हैं।

अब फिर मूल सवाल पर लौटते हैं कि जब सचिन पायलट राजस्थान में थे, तब वे अपने समर्थकों की नियुक्ति तक नहीं करवा पा रहे थे। दिल्ली पहुँचे, राष्ट्रीय महामंत्री बने और वही काम तुरंत हो गया। यही फर्क होता है राज्य की राजनीति और दिल्ली दरबार की राजनीति में। अभी यह शुरुआत है। अगर सचिन पायलट राजस्थान के ज़मीनी कार्यकर्ताओं को इसी तरह आगे बढ़ाते रहे, तो 2028 की राजनीति की दिशा यहीं से तय होगी।

नतीजा साफ़ है कि दिल्ली दरबार में राजस्थान की सियासत बदल चुकी है। अब सवाल यह नहीं कि गहलोत कितने अनुभवी हैं, सवाल यह है कि आज किसकी सुनी जा रही है। और जवाब भी साफ़ है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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