
आने वाले समय में कांग्रेस अगर गुजरात और अन्य राज्यों में मजबूत वापसी चाहती है, तो उसे हर संगठन की भूमिका और जवाबदेही पर स्पष्ट निर्णय लेना होगा। सेवा दल पर उठ रही चर्चाएं इसी व्यापक बहस का हिस्सा हैं।
-देवेन्द्र यादव-

कांग्रेस ने पिछले पांच साल में अपने संगठन में बड़े बदलाव किए। राष्ट्रीय अध्यक्ष से लेकर युवक कांग्रेस, एनएसयूआई, महिला कांग्रेस और अलग-अलग प्रकोष्ठों के नेतृत्व तक नई नियुक्तियां हुईं। 2014 और 2019 की लोकसभा हार के बाद पार्टी ने आत्ममंथन किया और 2022 में दलित नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। यह फैसला राजनीतिक तौर पर साहसिक माना गया।
खड़गे के अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी ने कर्नाटक के साथ हिमाचल में भाजपा को हराकर सत्ता में वापसी की। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 99 सीटें जीतकर अपनी स्थिति मजबूत की। यह संकेत था कि संगठनात्मक बदलावों का असर जमीन पर दिखने लगा है।
लेकिन इसी बदलाव की लहर के बीच एक सवाल लगातार उठ रहा है। कांग्रेस सेवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर अब भी लालजी देसाई बने हुए हैं। वे करीब एक दशक पूरा करने की ओर हैं। जबकि बाकी बड़े संगठनों में नेतृत्व परिवर्तन हो चुका है, सेवा दल में बदलाव नहीं हुआ। लालजी देसाई गुजरात से आते हैं। गुजरात वही राज्य है जिसे जीतना कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बना हुआ है। राहुल गांधी कई बार सार्वजनिक मंचों और संसद में यह कह चुके हैं कि कांग्रेस गुजरात में सत्ता में वापसी का सपना देखती है।
2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस गुजरात में सत्ता से थोड़ी दूरी पर रह गई थी। इसके बाद संगठन को मजबूत करने की मंशा से लालजी देसाई को सेवा दल की कमान सौंपी गई। उम्मीद थी कि सेवा दल कैडर आधारित ढांचे को मजबूत करेगा और भाजपा के मजबूत संगठन के सामने मुकाबले की जमीन तैयार करेगा।
लेकिन 2022 के गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पिछला प्रदर्शन भी नहीं दोहरा सकी। पार्टी बुरी तरह हार गई। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी गुजरात से कांग्रेस को केवल एक सीट मिली। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सेवा दल संगठनात्मक रूप से अपेक्षित भूमिका निभा पाया?
सेवा दल का इतिहास गौरवशाली रहा है। आजादी के आंदोलन से लेकर स्वतंत्र भारत में कांग्रेस की जमीनी मजबूती तक इसकी भूमिका रही है। अनुशासन, प्रशिक्षण और विचारधारा इसकी पहचान मानी जाती थी। लेकिन आरोप यह भी लगते हैं कि हाल के वर्षों में सेवा दल के कई पारंपरिक नियमों में बदलाव हुए और उसकी पुरानी पहचान धुंधली पड़ गई।
दूसरी ओर, 2022 के बाद युवक कांग्रेस, एनएसयूआई और महिला कांग्रेस सड़क पर सक्रिय दिखीं। भाजपा सरकार के खिलाफ आंदोलनों में इन संगठनों की मौजूदगी साफ नजर आई। मगर सेवा दल की गतिविधियां उतनी मुखर नहीं दिखीं। आलोचक कहते हैं कि सेवा दल का राष्ट्रीय नेतृत्व दिल्ली की बजाय गुजरात की राजनीति में अधिक व्यस्त दिखाई देता है।
गुजरात से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह आते हैं। ऐसे में वहां संगठन की मजबूती कांग्रेस के लिए रणनीतिक रूप से और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
अब कांग्रेस के रणनीतिकारों के सामने मूल प्रश्न यह है कि क्या सेवा दल में भी वैसा ही बदलाव जरूरी है जैसा अन्य संगठनों में किया गया? या फिर समस्या नेतृत्व से ज्यादा व्यापक संगठनात्मक ढांचे की है?
राजनीति में संदेश और संगठन दोनों मायने रखते हैं। कांग्रेस ने संदेश देने में बदलाव किया है। कई मोर्चों पर नेतृत्व भी बदला है। लेकिन सेवा दल को लेकर उठते सवाल यह बताते हैं कि पार्टी के भीतर आत्ममंथन की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है।
आने वाले समय में कांग्रेस अगर गुजरात और अन्य राज्यों में मजबूत वापसी चाहती है, तो उसे हर संगठन की भूमिका और जवाबदेही पर स्पष्ट निर्णय लेना होगा। सेवा दल पर उठ रही चर्चाएं इसी व्यापक बहस का हिस्सा हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















