
राहुल गांधी ने संगठन मजबूत किया, लेकिन जमीनी संघर्ष के लिए साहसी नेतृत्व की चुनौती बरकरार
-देवेन्द्र यादव-

कांग्रेस रूपी वटवृक्ष को मजबूत करने के लिए राहुल गांधी ने उसकी विभिन्न शाखाओं, कांग्रेस सेवा दल, महिला कांग्रेस, दलित कांग्रेस, आदिवासी कांग्रेस, ओबीसी कांग्रेस, छात्र कांग्रेस, युवा कांग्रेस और अल्पसंख्यक कांग्रेस में ऊर्जावान, ईमानदार और वफादार अध्यक्षों की नियुक्ति कर दी है। लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस को अब भी अपने भीतर बिहार के पूर्णिया से निर्दलीय लोकसभा सांसद राजेश रंजन (पप्पू यादव) जैसे निडर, साहसी और जनाधार वाले नेताओं की जरूरत है।
2024 के लोकसभा चुनाव से पहले पप्पू यादव ने अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया था। हालांकि राष्ट्रीय जनता दल के साथ चुनावी समझौते के कारण कांग्रेस उन्हें पूर्णिया लोकसभा सीट से अपना उम्मीदवार नहीं बना सकी। इसके बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।
पप्पू यादव ने यह भी दिखाया कि पार्टी और नेतृत्व के प्रति वफादारी क्या होती है। ऐसे समय में, जब कई नेता कांग्रेस के कठिन दौर में पार्टी छोड़कर भाजपा या अन्य दलों में अपने राजनीतिक हित साधने चले गए, पप्पू यादव ने अलग रास्ता चुना। वहीं कांग्रेस के भीतर आज भी ऐसे नेताओं की कमी नहीं है, जो संगठन में बड़ा पद या राज्यसभा का टिकट चाहते हैं। राज्यों में भी अक्सर यह देखने को मिलता है कि कांग्रेस के सत्ता में आने से पहले ही कई नेता स्वयं को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बताने लगते हैं।
कांग्रेस के भीतर आज भी ऐसे नेताओं की आवश्यकता महसूस होती है, जो राहुल गांधी के साथ मिलकर संगठन को मजबूत करने और भाजपा का मुकाबला करने के लिए पूरी प्रतिबद्धता से काम करें। कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि मेहनत राहुल गांधी करते हैं और उसका राजनीतिक लाभ संगठन के भीतर बैठे कुछ नेता उठाने की कोशिश करते हैं।
टिकट नहीं मिला, फिर भी नहीं छोड़ा कांग्रेस का साथ
लोकसभा का टिकट नहीं मिलने और निर्दलीय सांसद बनने के बावजूद पप्पू यादव ने कांग्रेस और राहुल गांधी का साथ नहीं छोड़ा। इसके विपरीत, वे लगातार राहुल गांधी के समर्थन में मजबूती से खड़े नजर आए।
2024 के बाद जिन-जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए, वहां भी पप्पू यादव ने कांग्रेस के पक्ष में चुनाव प्रचार किया। यदि बिहार से अलग बने राज्य झारखंड की बात करें, तो वहां भी उन्होंने कांग्रेस गठबंधन के समर्थन में सक्रिय प्रचार किया।
छात्रों और युवाओं के मुद्दों पर सक्रिय भूमिका
यदि राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ अभियान की बात करें, तो छात्रों और बेरोजगार युवाओं की आवाज बिहार की सड़कों से लेकर संसद तक सबसे पहले पप्पू यादव ने ही प्रमुखता से उठाई। बिहार विधानसभा चुनाव से पहले अपनी मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे छात्रों से राहुल गांधी ने भी बिहार जाकर संवाद किया और यात्रा निकाली। इससे पहले पप्पू यादव भी छात्रों के समर्थन में यात्रा कर चुके थे।
राहुल गांधी के पटना में प्रस्तावित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए भी पप्पू यादव सक्रिय हैं। 4 अगस्त को पप्पू यादव और छात्र कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष जाखड़ के नेतृत्व में पटना में छात्रों की समस्याओं को लेकर एक बड़ा मार्च निकाला गया।
संघर्ष की राजनीति करने वाले नेताओं की जरूरत
पप्पू यादव ने संसद में चंदा चोरी के मुद्दे को लेकर प्रदर्शन किया। उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई। दिल्ली स्थित उनके आवास पर जानलेवा हमले का भी सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने कदम पीछे नहीं खींचे। इसके बाद भी वे 4 अगस्त को पटना पहुंचे और छात्र कांग्रेस के मार्च में शामिल हुए।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस और राहुल गांधी को पार्टी के भीतर पप्पू यादव जैसे निडर, साहसी और संघर्षशील नेताओं की जरूरत है, जो हर परिस्थिति में नेतृत्व के साथ मजबूती से खड़े रह सकें?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

















