
-पुष्कर से कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं को बड़ा संदेश
-देवेंद्र यादव-

“दूरी न रहे कोई, आज इतने करीब आ जाओ, मैं तुममें समा जाऊं, तुम मुझमें समा जाओ।”
सोमवार, 1 जून को कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने राजस्थान की ऐतिहासिक ब्रह्मा नगरी पुष्कर से कांग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं को बड़ा संदेश दिया। कांग्रेस के 10 दिवसीय संगठन सृजन कार्यक्रम के तहत आयोजित राजस्थान और दिल्ली के जिला अध्यक्षों के प्रशिक्षण शिविर में राहुल गांधी ने सभी जिला अध्यक्षों के परिजनों से मुलाकात की।
राहुल गांधी ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेता केवल किसी राजनीतिक दल के सदस्य नहीं हैं, बल्कि कांग्रेस परिवार के सदस्य हैं। उन्हें पूरे देश को अपना परिवार मानते हुए जनता के सुख-दुख में सहभागी बनकर काम करना होगा। कांग्रेस केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि ऐसी मजबूत विचारधारा है जो समाज और परिवार को जोड़कर रखने में विश्वास करती है।
कार्यकर्ता एकजुट, नेता बंटे हुए
राजस्थान में कांग्रेस अपने मजबूत कार्यकर्ताओं के कारण मजबूत बनी हुई है, लेकिन नेतृत्व स्तर पर कुर्सी की लड़ाई पार्टी को कमजोर कर रही है। कांग्रेस का कार्यकर्ता तो एकजुट है, मगर नेता एकजुट नहीं हैं। यही कारण है कि राहुल गांधी ने राजस्थान के नेताओं को परिवार की तरह मिलकर काम करने का संदेश दिया है। उनका स्पष्ट संकेत है कि यदि नेता एकजुट रहेंगे तो सफलता निश्चित रूप से कांग्रेस के कदम चूमेगी।
डोटासरा-जूली की जोड़ी पर राहुल गांधी की मुहर
मैंने 1 जून को राहुल गांधी के राजस्थान आगमन से ठीक पहले अपने ब्लॉग में लिखा था कि राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली की जोड़ी एकजुट होकर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की नीतियों के खिलाफ सड़क से लेकर विधानसभा तक संघर्ष कर रही है। यह जोड़ी कांग्रेस को 2027 में राजस्थान की सत्ता में वापसी दिला सकती है, बशर्ते पार्टी के अन्य बड़े नेता भी ईमानदारी से इनके साथ खड़े हों। राहुल गांधी ने भी गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली की जोड़ी की सराहना करते हुए कहा कि यह जोड़ी राजस्थान में अच्छा काम कर रही है और अन्य राज्यों के नेताओं को भी इससे सीख लेनी चाहिए।
क्या राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन की संभावना खत्म?
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या विधानसभा चुनाव से पहले राजस्थान कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन होगा? राहुल गांधी के भाषण और संकेतों को देखें तो इसकी संभावना फिलहाल कम दिखाई देती है। केरल और कर्नाटक में लिए गए फैसलों के बाद यह माना जा रहा था कि राहुल गांधी राजस्थान में भी कोई बड़ा संगठनात्मक निर्णय ले सकते हैं। लेकिन डोटासरा और जूली की सार्वजनिक प्रशंसा कर उन्होंने शायद यह संकेत दे दिया है कि राजस्थान में उनकी प्राथमिकता क्या है। ऐसा प्रतीत होता है कि सचिन पायलट राष्ट्रीय राजनीति में अपनी भूमिका निभाते रहेंगे, जबकि अशोक गहलोत एक वरिष्ठ मार्गदर्शक की भूमिका में दिखाई देंगे। वहीं गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली की जोड़ी 2027 के विधानसभा चुनाव तक बनी रह सकती है।
राहुल गांधी की कसौटी: ईमानदारी और वफादारी
राहुल गांधी को ऐसे नेताओं की आवश्यकता है जो कांग्रेस और उसकी विचारधारा के प्रति पूरी ईमानदारी और वफादारी के साथ काम करें। राजस्थान में डोटासरा और जूली की जोड़ी उनकी इस अपेक्षा पर खरी उतरती दिखाई देती है।यह जोड़ी कांग्रेस को सत्ता में वापसी दिलाने की क्षमता रखती है। दूसरी ओर, अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच लंबे समय से चली आ रही नेतृत्व और कुर्सी की खींचतान का असर अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। यदि यह अंतर्विरोध चुनाव तक बना रहा तो 2027 में कांग्रेस को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसीलिए राहुल गांधी को राजस्थान की राजनीतिक परिस्थितियों पर गंभीर मंथन और विचार-विमर्श के बाद ही कोई निर्णय लेना होगा। भावनात्मक आधार पर लिया गया कोई भी फैसला पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।
‘जगरा’ और ‘बाटी’ का राजनीतिक संदेश
संभव है कि राहुल गांधी अब राजस्थान की राजनीतिक संस्कृति में प्रचलित ‘जगरा’ और ‘बाटी’ के अर्थ भी समझ गए हों। राजनीति में जिन्होंने संघर्ष किया है, राहुल गांधी शायद अवसर भी उन्हीं नेताओं को देना चाहेंगे जिन्होंने जमीन पर मेहनत की है। राजस्थान में कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व 2027 में पार्टी की वापसी का आधार बनने की क्षमता रखता है।
जमीन से निकले नेताओं की जोड़ी
यदि गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली की बात करें तो दोनों किसी राजनीतिक परिवार से नहीं आते। दोनों साधारण परिवारों से उठकर राजनीति के बड़े मुकाम तक पहुंचे हैं। दोनों जमीनी नेता हैं और जनता के अधिकारों के लिए संघर्ष करना तथा उन्हें उनका हक दिलाना जानते हैं। दोनों नेताओं की सबसे बड़ी ताकत उनका जमीनी अनुभव और आम जनता से सीधा जुड़ाव है।
अब अंतिम फैसला राहुल गांधी को करना है कि राजस्थान में वे किस प्रकार का नेतृत्व चाहते हैं। क्या वे मौजूदा जोड़ी को बनाए रखेंगे, या फिर नई नेतृत्व व्यवस्था तैयार करेंगे? क्या वे संघर्ष और संगठन को प्राथमिकता देंगे, या फिर कुर्सी की राजनीति करने वाले नेताओं को आगे बढ़ाएंगे? आने वाले समय में इसका उत्तर स्पष्ट हो जाएगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं।)

















