जिसकी भी ग़ज़ल गा दी , समझो वह मकबूल हो गया

बैंगनी रंग के जॉर्जेट की साड़ी, बाहों में फ्रिल लगा ब्लाउज, जैसा कि उन दिनों चलन था, हाथों में मोती के कंगन, कानों में झिलमिलाते हीरे,अंगुली में दमकता पन्ना, कंठ में मोतियों का मेल खाता कंठा, पान दोख़्ते से लाल-लाल अधरों पर भुवनमोहिनी स्मित, ये थीं अख़्तरी बाई फैज़ाबादी"

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file photo

-प्रतिभा नैथानी-

प्रतिभा नैथानी

“वह दिलकश आवाज़, स्नेह से छलकती वे रससिक्त आंखें और वह स्वरभंग होती हंसी मेरे जीवन की संचित बहुमूल्य धरोहर हैं ..
बैंगनी रंग के जॉर्जेट की साड़ी, बाहों में फ्रिल लगा ब्लाउज, जैसा कि उन दिनों चलन था, हाथों में मोती के कंगन, कानों में झिलमिलाते हीरे,अंगुली में दमकता पन्ना, कंठ में मोतियों का मेल खाता कंठा, पान दोख़्ते से लाल-लाल अधरों पर भुवनमोहिनी स्मित, ये थीं अख़्तरी बाई फैज़ाबादी”

उन पर लिखा हुआ एक लेख ‘कोयलिया मत कर पुकार’ जब ‘नवनीत’ पत्रिका में छपा तो पढ़कर ख़ुश होती बेगम साहिबा ने अपनी एक बेशकीमती अंगूठी लेखिका शिवानी जी को पहनाते हुए कहा -“अख़्ख़ाह, अब लगा ईद आई..”।
बेगम अख़्तर साहिबा अपनी जमाने की सुप्रसिद्ध ग़ज़ल गायिका थीं । दादरा, ठुमरी इत्यादि संगीत की अन्य शास्त्रीय विधाओं में भी बराबर महारत हासिल थी उन्हें, इसी से तो सांस्कृतिक मंचों और रेडियो की शान थीं वह।

नजरबख़्श सिंह, जो महाराजा ओरछा के ए.डी.सी.थे, याद करते हैं कि – बेगम अख़्तर से उनका परिचय तब का था,जब वह गाने के लिए हैदराबाद गई थीं। निज़ाम ने उनकी प्रत्येक फ़रमाइश पूरी की थी। उस रसपगी महफ़िल में मैं भी था । क्या गाया था अख़्तरी ने। वैसी गायकी फिर कभी नहीं सुनी । एक के बाद एक तोहफ़े आते गए। अंत में निज़ाम ने पूछा, और कुछ ?
‘जी’ ! बेगम अख़्तर ने सोचा ऐसी चीज़ मांगे, जो उस शाही दरबार में तत्काल पेश न की जा सके, ‘आंवले का मुरब्बा’ उन्होंने कहा, और पलक झपकते ही बड़ी-बड़ी बेहंगियों में अमृतबान लटकाए पेशदारों ने तत्काल मनचाही फ़रमाइश पूरी करके दिखा दी ।
ऐसे न जाने कितने किस्से हैं जो बेगम साहिबा की शान में चार चांद लगाते हैं।

हुनर के दम पर शोहरत की बुलंदियां छू लेना आम है, लेकिन वहां पहुंचकर भी पांव ज़मीन पर टिके रहें, ऐसे कम ही लोग होते हैं।
ब्याह के बाद बेगम अख़्तर के गीत-संगीत पर उनके परिवार वालों ने रोक लगा दी थी। औलाद ना होने के अलावा, जिंदगी के कुछ और गहरे ज़ख्म उन्हें जब-तब टीसते रहते थे , ऐसे में संगीत का छूट जाना उनके लिए मर जाने के बराबर था। इस दुःख में बेगम साहिबा की सेहत लगातार गिरती ही जा रही थी, इसलिए उनके शौहर को उन्हें रेडियो से गाने की इज़ाजत देनी ही पड़ी । पूरे पांच वर्ष लगे थे घर से बाहर निकलने में।
एक रोज़ जब वह रेडियो स्टेशन जा रही थीं, देखा कि सड़क किनारे एक आदमी बहुत सारी छिपकलियों को लिए बैठा है। कुछ हैरत से उन्होंने उस आदमी से पूछा – यह क्यों इतनी सारी छिपकलियां पकड़ रखी हैं तुमने ?
‘इन सबका तेल निकाला जाएगा मोहतरमा’ !
‘लिल्लाह ! क्या बिगाड़ा है इन्होंने तुम्हारा’ ?
‘इन्होंने तो कुछ नहीं बिगड़ा, यह तो पेट की आग है जो इनका तेल बेचकर कमाए हुए पैसों से बुझाने को मजबूर हूं’।
बेगम साहिबा ने अपने पर्स में रखे हुए सारे पैसे उस आदमी के हाथ में रख दिए, और कहा कि – अभी के अभी मेरे सामने ही इन सारी छिपकलियों को आज़ाद कर दो। कोई नया धंधा शुरू करने के लिए बहुत हैं यह पैसे। आइंदा ऐसा गलत काम कभी न करना। बेजुबानों के दर्द को महसूस करती थीं वह।

लोगों को उनकी इस दरियादिली पर भले ही ताज़्जुब होता हो, मगर नामालूम शागिर्दों को भी अपने साथ मंच पर बिठाकर गाने का मौका दे देना उनके लिए आम बात थी।
अपने समय के शायरों पर भी बेगम साहिबा के बहुत एहसान रहे । जिसकी भी ग़ज़ल उन्होंने गा दी , समझो वह मकबूल हो गया। ज़िगर मुरादाबादी, फ़िराक़ गोरखपुरी, कैफ़ी आज़मी, शकील बदायूंनी, सुदर्शन फाकिर जैसे शायरों को उन्होंने ख़ूब गाया।
इनकी ग़ज़लों के अलावा बेगम साहिबा ने हिंदी सिनेमा की शुरुआती फिल्मों में भी बहुत गीत गाए थे।
7 अक्टूबर 1914 में बेगम अख़्तर साहिबा का जन्म हुआ था। उनकी आवाज़ में एक बेहद प्यारी ग़ज़ल ‘कुछ तो दुनिया की इनायात’ सुनकर अपने पसंदीदा गायिका को श्रद्धांजलि

#बेगमअख्तर

(प्रतिभा की कलम से)

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Neelam
Neelam
3 years ago

बेग़म अख्तर जिनका नाम सुनते ही अनायास उनके गाये ठुमरी दादरा कानो में गूँजने लगते हैं।शास्त्रीय संगीत की दुनिया का एक अमिट नाम। उनको नमन।