ये आस तो बॅंधी है दिल को सुकूँ* मिलेगा। मुद्दत के बाद हमको इक मेहरबाॉं मिला है।।

shakoor anwar
शकूर अनवर

ग़ज़ल

-शकूर अनवर-

ऊॅंची है जो इमारत उसमें मकाॅं मिला है।
गोया ज़मीं पे रहकर इक आसमाॅं मिला है।।
*
ये आस तो बॅंधी है दिल को सुकूँ* मिलेगा।
मुद्दत के बाद हमको इक मेहरबाॉं मिला है।।
*
ऑंसू हमारी अब तो तक़दीर बन गये हैं।
इन ऑंसुओं में डूबा हिंदोस्ताॅं मिला है।।
*
जिसने भी ये ज़माना अपनी नज़र से देखा।
उसको अलग ही अपना तर्ज़े ए बयाॅं* मिला है।।
*
दुनिया के ये झमेले चलते ही आ रहे हैं।
बिछड़ा कोई कहाँ पर कोई कहाँ मिला है।।
*
अजदाद* मेरे सारे करते थे बुत परस्ती*।
विरसे* में मुझको “अनवर”इश्क़े-बुताॅं* मिला है।।
*

सुकूँ*चैन
तर्ज़े ए बयाॅं*बयान करने का तरीक़ा
अजदाद*पूर्वज
बुत परस्ती*मूर्तिपूजा
विरसे*विरासत में
इश्क़े-बुता*बुतों से मुहब्बत करना

शकूर अनवर
9460851271

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