
ग़ज़ल
-शकूर अनवर-
ऊॅंची है जो इमारत उसमें मकाॅं मिला है।
गोया ज़मीं पे रहकर इक आसमाॅं मिला है।।
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ये आस तो बॅंधी है दिल को सुकूँ* मिलेगा।
मुद्दत के बाद हमको इक मेहरबाॉं मिला है।।
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ऑंसू हमारी अब तो तक़दीर बन गये हैं।
इन ऑंसुओं में डूबा हिंदोस्ताॅं मिला है।।
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जिसने भी ये ज़माना अपनी नज़र से देखा।
उसको अलग ही अपना तर्ज़े ए बयाॅं* मिला है।।
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दुनिया के ये झमेले चलते ही आ रहे हैं।
बिछड़ा कोई कहाँ पर कोई कहाँ मिला है।।
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अजदाद* मेरे सारे करते थे बुत परस्ती*।
विरसे* में मुझको “अनवर”इश्क़े-बुताॅं* मिला है।।
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सुकूँ*चैन
तर्ज़े ए बयाॅं*बयान करने का तरीक़ा
अजदाद*पूर्वज
बुत परस्ती*मूर्तिपूजा
विरसे*विरासत में
इश्क़े-बुता*बुतों से मुहब्बत करना
शकूर अनवर
9460851271

















