चुनौतियों के बीच राहुल गांधी की राजनीति, संघर्ष से गढ़ती नई पहचान

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राहुल गांधी
राहुल गांधी के सामने एक और बड़ी चुनौती है और वह है भरोसे की। कई बार उन्होंने नए चेहरों को आगे बढ़ाया, लेकिन कुछ मामलों में वही नेता बाद में पार्टी छोड़कर चले गए। इससे उनकी रणनीति पर सवाल उठे। आलोचक कहते हैं कि राहुल गांधी को संगठन में बड़े बदलाव करने चाहिए, लेकिन पार्टी के भीतर भरोसे की कमी इस प्रक्रिया को आसान नहीं बनाती।

-देवेन्द्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

कहावत है कि महान वह बनता है जो अनेक चुनौतियों का सामना कर अपने को निखारता है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर, यह कहावत सटीक बैठती है। 2014 में कांग्रेस केंद्र की और विभिन्न राज्यों की सत्ता से बाहर हुई थी, तब से लेकर अब तक राहुल गांधी राजनीतिक रूप से अनेक राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। राहुल गांधी के सामने कांग्रेस के भीतर कमजोर पड़ी कांग्रेस को मजबूत करने की चुनौती है। 2014 के बाद केंद्र और अनेक राज्यों की सत्ता से बाहर हुई कांग्रेस को सत्ता में वापसी कराने की चुनौती है, तो वहीं सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को केंद्र और विभिन्न राज्यों की सत्ता से बाहर करने की चुनौती है। जनता के बीच अपना विश्वास कायम रखने की चुनौती है। मौजूदा वक्त में कांग्रेस के कार्यकर्ता ही नहीं बल्कि देश का युवा और बुद्धिजीवी वर्ग राहुल गांधी की तरफ देख रहा है लेकिन राहुल गांधी के सामने शायद यह समस्या है कि उनको अभी भी कांग्रेस के भीतर कुंडली मारकर बैठे नेता नहीं समझ पा रहे हैं। यही चुनौती राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी है। कई बार ऐसा लगता है जैसे राहुल गांधी कांग्रेस को फिर से मजबूत कर खड़ा करने के लिए अकेले प्रयास कर रहे हैं। यह बात तब अधिक पुख्ता होती है, जब कांग्रेस के नेता कांग्रेस छोड़कर अन्य दलों में शामिल होते हैं या राज्यसभा जैसे महत्वपूर्ण चुनाव में क्रॉस वोटिंग करते हैं। तब ऐसा लगता है जैसे राहुल गांधी को कांग्रेस के नेता समझ ही नहीं पा रहे हैं और राहुल गांधी अकेले कांग्रेस को मजबूत करने में जुटे हुए। राहुल गांधी का आत्म बल कितना मजबूत है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि, वह यह सब कुछ जानते हुए भी कभी मायूस नहीं हुए बल्कि अक्सर कहते हैं कि मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जिसे पार्टी छोड़कर जाना है चले जाएं मैं देश की जनता और कांग्रेस के बब्बर शेरों के लिए अंतिम सांस तक लडूंगा। एक दिन सच्चाई की जीत होगी। मैं चुनाव जीतने के लिए नहीं बल्कि देश की जनता और कांग्रेस कार्यकर्ताओं को हक दिलाने के लिए लड़ता रहूंगा। संविधान की रक्षा करना मेरा प्रमुख दायित्व है और संविधान के तहत में संविधान को बचाने और जनता को उसका हक दिलाने के लिए लड़ता रहूंगा। राहुल गांधी को शायद उनका यह लक्ष्य ही महान नेता बना रहा है। देश की राजनीति का एक सच यह भी है कि किसी भी राजनीतिक दल की सत्ता स्थिर नहीं रहती है। राहुल गांधी इसे समझते हैं, समझना उन कांग्रेस के नेताओं को है जो सत्ता के बगैर रह नहीं सकते और जी नहीं सकते। सत्ता का आनंद लेने कांग्रेस छोड़कर सत्ताधारी दलों में शामिल हो जाते हैं। राहुल गांधी को यह ज्ञान भी बांटा जाता है कि वह बड़ा फैसला क्यों नहीं लेते और कांग्रेस के भीतर बड़ा बदलाव क्यों नहीं करते। क्यों नए चेहरों को अवसर नहीं देते हैं। जहां तक बदलाव और नए चेहरों को अवसर देने की बात करें तो, बात भरोसे पर आकर अटक जाती है। राहुल गांधी ने नए चेहरों पर भरोसा किया और अवसर दिया लेकिन राज्यसभा के चुनाव में नए चेहरों ने क्रॉस वोटिंग की ना। असम में दीपक वोहरा जिसे राहुल गांधी ने कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया था, वह भाजपा में शामिल हो गए। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिन पर राहुल गांधी ने भरोसा किया लेकिन उन्होंने कांग्रेस और राहुल गांधी के साथ राजनीतिक दगा किया। फिर भी राहुल गांधी अपने लक्ष्य पर डटे हुए हैं, यही महान नेता की पहचान होती है जो राहुल गांधी में दिखाई दे रही है। राहुल गांधी ने 2029 का आगाज उत्तर प्रदेश के 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव से मजबूती के साथ करेंगे। इसकी झलक देखने को तब मिली जब राहुल गांधी ने कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग का राष्ट्रीय अध्यक्ष दिल्ली सरकार में पूर्व मंत्री राजेंद्र गौतम को बनाया। राजेंद्र गौतम बड़े दलित नेता हैं जो उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि हिंदी प्रदेशों में कांग्रेस के पारंपरिक दलित मतदाताओं की कांग्रेस में वापसी करवा सकते हैं। यूं भी कांग्रेस के पास लंबे समय से बहुजन समाज पार्टी और दलित नेता मायावती के बराबर का नेता नहीं था। कांग्रेस के पास ऐसे दलित नेता थे जो कांग्रेस के दलित मतदाताओं को कांग्रेस में वापसी कराने में सक्षम नहीं थे। राहुल गांधी ने गत दिनों उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में दलित मंच से कहा था कि मुझे उत्तर प्रदेश में हजार नहीं सौ मजबूत कार्यकर्ता चाहिए। जो निडर होकर जनता के हक और संविधान की रक्षा के लिए सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी से लड़ सकें।शायद इसीलिए राजेंद्र गौतम उत्तर प्रदेश में लीडरशिप डेवलपमेंट मिशन का अभियान चलाने वाले हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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