
-केरल से तमिलनाडु तक कांग्रेस की नई राजनीतिक रणनीति
-केरल से बड़ी राजनीतिक जीत तमिलनाडु में
देवेंद्र यादव

देश में जब भी कांग्रेस कमजोर हुई है, तब दक्षिण भारत ने उसे मजबूत सहारा दिया है। 4 मई को आए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों में कांग्रेस ने लंबे समय बाद दक्षिण के केरल में जीत दर्ज कर सत्ता में वापसी की। वहीं दक्षिण के एक अन्य महत्वपूर्ण राज्य तमिलनाडु में कांग्रेस ने नवनिर्वाचित पार्टी टीवीके को समर्थन देकर सरकार गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
दक्षिण भारत में कांग्रेस के लिए केरल की जीत राजनीतिक रूप से भले ही महत्वपूर्ण हो, लेकिन उससे भी बड़ी सफलता कांग्रेस ने तमिलनाडु में टीवीके सरकार के गठन में सहयोग देकर हासिल की है। तमिलनाडु में कांग्रेस लंबे समय से द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के साथ मिलकर अपने राजनीतिक अस्तित्व को बचाने का प्रयास कर रही थी। हालांकि वह केवल अपनी उपस्थिति दर्ज करा पा रही थी। एक समय तमिलनाडु में कांग्रेस की अपनी सरकार हुआ करती थी, लेकिन बाद में पार्टी क्षेत्रीय दलों के सहारे राजनीतिक संघर्ष करती नजर आई। कांग्रेस डीएमके सरकार में भागीदार तो थी, लेकिन नाममात्र के लिए और वह भी डीएमके की शर्तों पर। तमिलनाडु में कांग्रेस का राजनीतिक अस्तित्व पूरी तरह सहयोगी दल पर निर्भर दिखाई देता था।
सीमित सीटों पर चुनाव और सीमित सफलता
2026 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने केवल 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और पांच सीटों पर जीत दर्ज की। इससे यह संकेत जरूर मिला कि कांग्रेस तमिलनाडु में मौजूद है और जीवित है, लेकिन सवाल पार्टी हाईकमान के आत्मविश्वास का था। यदि डीएमके कांग्रेस को अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने का अवसर देती, तो संभवतः कांग्रेस पांच से अधिक सीटें जीत सकती थी।
राहुल गांधी के मिशन से जुड़ा तमिलनाडु मॉडल
तमिलनाडु की यह जीत इसलिए भी बड़ी मानी जा रही है क्योंकि कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी का बड़ा राजनीतिक मिशन जाति जनगणना तथा दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग को उनकी संख्या के आधार पर सत्ता और सरकार में हिस्सेदारी दिलाने का है। कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के लिए टीवीके सरकार बनने के बाद तमिलनाडु एक बड़े राजनीतिक मॉडल के रूप में उभर सकता है।
विजय थलापति ने साकार किया राहुल का सपना
टीवीके नेता विजय थलापति ने तमिलनाडु में राहुल गांधी के राजनीतिक विजन को एक तरह से जमीन पर उतारने का प्रयास किया। विजय ने अपनी पार्टी से बड़ी संख्या में दलित उम्मीदवारों को टिकट दिए और उनमें से बड़ी संख्या में प्रत्याशी जीतकर विधानसभा पहुंचे। अब राहुल गांधी देशभर में “तमिलनाडु मॉडल” की चर्चा करते हुए यह बता सकते हैं कि राजनीतिक हिस्सेदारी का महत्व क्या होता है।
कांग्रेस के लिए बड़ा राजनीतिक सबक
तमिलनाडु कांग्रेस के लिए एक महत्वपूर्ण सबक भी है। कांग्रेस हाईकमान को यह तय करना होगा कि वह लंबे समय से राज्यों में जमे पुराने क्षेत्रीय दलों के साथ समझौता कर चुनाव लड़ती रहेगी या फिर टीवीके जैसी नई क्षेत्रीय पार्टियों के साथ राजनीतिक सहयोग और चुनावी समझौते का रास्ता अपनाएगी।
पुराने सहयोगियों से ज्यादा लाभ नहीं
कांग्रेस पुराने क्षेत्रीय दलों के साथ समझौता कर अब तक बहुत बड़ी राजनीतिक उपलब्धि हासिल नहीं कर पाई है। उल्टा कई राज्यों में उसकी स्थिति और कमजोर हुई है। अब कांग्रेस को राज्यों में टीवीके जैसी नई क्षेत्रीय ताकतों को तैयार करना और उनके साथ समझौता करना होगा। तभी पार्टी देशभर में अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने में सफल हो सकती है।
तमिलनाडु बन सकता है कांग्रेस की वापसी का मॉडल
तमिलनाडु कांग्रेस के लिए कामयाबी का बड़ा मॉडल साबित हो सकता है, यदि राहुल गांधी और उनकी चुनावी रणनीतिकारों की टीम इस प्रोजेक्ट पर गंभीरता से काम करे। जरूरी यह भी है कि राहुल गांधी अपनी मौजूदा राजनीतिक दिशा से न भटकें और पार्टी के अनुभवहीन रणनीतिकार उन्हें गलत दिशा में न ले जाएं। तमिलनाडु में मणिकम टैगोर और सिंथल जैसे अनुभवी नेता मौजूद हैं, जिनमें कांग्रेस की खोई हुई जमीन वापस दिलाने की क्षमता है। हालांकि सबसे बड़ा सवाल हाईकमान के भरोसे का है और यह माना जा रहा है कि राहुल गांधी का भरोसा इन नेताओं पर है।
2029 की तैयारी की आधारशिला
दक्षिण भारत में कांग्रेस 2029 के लोकसभा चुनाव में कितनी बड़ी उपलब्धि हासिल कर सकती है, इसकी आधारशिला राहुल गांधी ने तमिलनाडु में टीवीके को समर्थन देकर रख दी है। वैसे भी 2019 में केरल के वायानाड लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीतने के बाद से राहुल गांधी का फोकस लगातार दक्षिण भारत पर रहा है। यही वजह है कि कांग्रेस ने 2019 के बाद पहले कर्नाटक, फिर तेलंगाना और बाद में केरल में अपनी सरकार बनाई।अब कांग्रेस के पास दक्षिण भारत के तीन राज्यों में अपनी सरकार है और तमिलनाडु में वह नवनिर्वाचित टीवीके सरकार के साथ सत्ता में साझेदार की भूमिका में है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं।)

















