राजस्थान में सत्ता की कुर्सी पर नजर, भाजपा-कांग्रेस दोनों में अंदरूनी खींचतान बरकरार

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राजस्थान की राजनीति में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही अंदरूनी नेतृत्व संघर्ष से जूझ रही हैं। मुख्यमंत्री पद की होड़ ने जहां भाजपा के कामकाज की धार को कमजोर किया है, वहीं कांग्रेस के सामने स्पष्ट रणनीति का अभाव है, ऐसे में 2028 का चुनाव दोनों दलों के लिए नेतृत्व और एकजुटता की बड़ी परीक्षा बनने जा रहा है।
-देवेंद्र यादव-
devendra yadav
देवेन्द्र यादव

यदि राजस्थान की राजनीति की बात करें तो कमोबेश सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस, दोनों की राजनीतिक परिस्थितियां एक जैसी हैं। दोनों ही पार्टियों के भीतर मुख्यमंत्री पद के कई दावेदार हैं। भाजपा सत्ता में है, इसलिए उसके भीतर दावेदारों की संख्या कांग्रेस से अधिक है। मुख्यमंत्री पद की इस होड़ के कारण सत्ता पक्ष भाजपा के काम जनता के बीच प्रभावी ढंग से नजर नहीं आ रहे हैं, वहीं कांग्रेस में भविष्य की रणनीति और संगठन को मजबूत कर सत्ता में वापसी का स्पष्ट रोडमैप दिखाई नहीं दे रहा है। दोनों ही दलों के नेता अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग अलापते नजर आते हैं और उनकी नजर 2028 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर टिकी हुई है। राजनीतिक परिस्थितियों को संभालने के लिए भाजपा ने राधा मोहन अग्रवाल और कांग्रेस ने सुखजिंदर सिंह रंधावा को राजस्थान का प्रभारी बनाया है, लेकिन इसके बावजूद दोनों दलों के भीतर नेतृत्व को लेकर विवाद जस का तस बना हुआ है। भाजपा में वसुंधरा राजे, ओम बिरला और गजेंद्र सिंह शेखावत प्रमुख दावेदार माने जाते हैं, जबकि कांग्रेस में अशोक गहलोत, सचिन पायलट और गोविंद सिंह डोटासरा प्रमुख चेहरे हैं।

गहलोत-पायलट विवाद ने छीनी कांग्रेस की जीत
2023 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और कांग्रेस दोनों में मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदार वसुंधरा राजे और सचिन पायलट थे। लेकिन चुनाव से पहले अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर चला विवाद कांग्रेस को भारी पड़ा। इसी अंदरूनी खींचतान के कारण 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा, जबकि ऐसा लग रहा था कि पार्टी अपनी सरकार बरकरार रखेगी। गहलोत और पायलट के बीच की इस कुर्सी की लड़ाई ने कांग्रेस से लगभग जीती हुई बाजी छीन ली।

भाजपा में भी नेतृत्व को लेकर असंतोष
2023 में भाजपा की सत्ता में वापसी के बाद यह माना जा रहा था कि वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री बनेंगी, लेकिन पार्टी हाईकमान ने पहली बार के विधायक भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाकर सभी को चौंका दिया। उस समय ओम बिरला और गजेंद्र सिंह शेखावत भी दावेदारों में शामिल थे, लेकिन हाईकमान ने नए चेहरे को मौका दिया। इसके बाद से ही वसुंधरा राजे की नाराजगी की चर्चाएं लगातार सामने आती रही हैं। इस नाराजगी का असर भाजपा को लोकसभा चुनाव में भी देखने को मिला, जहां पार्टी को राजस्थान में 12 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा।

पंचायत चुनाव टलना भी अंदरूनी खींचतान का संकेत
भाजपा में मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रही खींचतान का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पार्टी राजस्थान में पंचायत राज और निकाय चुनाव करा नहीं पा रही है और चुनाव लगातार टाले जा रहे हैं। सवाल उठता है कि क्या भाजपा अपने ही नेताओं से डर रही है? पार्टी को यह एहसास है कि अंदरूनी संघर्ष के कारण उसे 2024 के लोकसभा चुनाव में नुकसान उठाना पड़ा। इसी बीच राधा मोहन अग्रवाल द्वारा टोंक में सचिन पायलट पर दिया गया बयान भी चर्चा में रहा। इस बयान से यह संकेत मिला कि सचिन पायलट राजस्थान में एक लोकप्रिय नेता हैं और 2028 में कांग्रेस की सत्ता वापसी में भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि, यह भी सवाल है कि भाजपा हाईकमान ने राधा मोहन अग्रवाल को राज्य का प्रभारी बनाकर संगठनात्मक विवाद सुलझाने की जिम्मेदारी दी थी, लेकिन उनके बयान ने राजनीतिक और मीडिया विमर्श का केंद्र बदल दिया। यह बयान उस समय आया जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राजस्थान दौरे की तैयारी चल रही थी, जिससे उनके दौरे की चर्चा पीछे छूट गई और फोकस सचिन पायलट पर आ गया।

2028 की रणनीति पर टिकी सबकी नजर
अब बड़ा सवाल यह है कि 2028 में भाजपा अपनी सत्ता बरकरार रख पाएगी या कांग्रेस वापसी करेगी। साथ ही यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या भाजपा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री बदलेगी और क्या कांग्रेस अपने प्रदेश अध्यक्ष में बदलाव करेगी। दोनों ही पार्टियों के लिए यह तय करना अहम है कि वे किस नेतृत्व में चुनाव लड़ेंगी, क्योंकि वर्तमान में दोनों के भीतर लगभग समान राजनीतिक परिस्थितियां बनी हुई हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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