असम में कांग्रेस की राह आसान नहीं

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फोटो सोशल मीडिया से साभार
असम में कांग्रेस के लिए यह चुनाव आसान नहीं है। बड़े नेता मैदान में हैं, लेकिन चुनौती भी बड़ी है। कम समय, मजबूत विपक्ष और अंदरूनी रणनीति सब कुछ दांव पर है। अब नजर इस बात पर है कि क्या कांग्रेस सही तालमेल और रणनीति के दम पर सत्ता में वापसी कर पाएगी।

-देवेंद्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

असम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के सामने इस बार असली परीक्षा है। कांग्रेस की सत्ता में वापसी आसान नहीं दिख रही। इस बार मैदान बड़ा है। मुकाबला कड़ा है। और समय भी बहुत कम है।

इस चुनाव में कई बड़े नेता लगे हुए हैं। प्रियंका गांधी स्क्रीनिंग कमेटी की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। भंवर जितेंद्र सिंह संगठन के काम में जुटे हैं। डीके शिवकुमार मुख्य पर्यवेक्षक हैं। वहीं तरुण गोगोई राज्य इकाई को संभाल रहे हैं और मुख्यमंत्री का चेहरा भी माने जा रहे हैं। चारों नेताओं पर बड़ी जिम्मेदारी है। लेकिन सबसे ज्यादा नजर डीके शिवकुमार पर है। वजह साफ है। उन्हें कांग्रेस का मजबूत रणनीतिकार माना जाता है।

2023 में कर्नाटक में कांग्रेस की जीत के बाद उनकी खूब चर्चा हुई थी। माना गया कि उनकी रणनीति ने खेल पलट दिया। हालांकि मुख्यमंत्री की कुर्सी सिद्धारमैया को मिली। तब से ही यह सवाल बना हुआ है कि पार्टी उन्हें आगे कब बढ़ाएगी। अब असम का चुनाव उनके लिए एक तरह की अग्निपरीक्षा जैसा है। अगर यहां कांग्रेस अच्छा करती है तो उनकी छवि और मजबूत होगी। अगर नतीजे कमजोर रहे तो सवाल भी उठेंगे।

इस बार चुनाव का समय भी कम है। सिर्फ 21 दिन। इतने कम समय में संगठन को खड़ा करना आसान नहीं होता। हर सीट पर मजबूत तैयारी चाहिए। बूथ स्तर तक काम करना होगा। असम में एक और बात अहम है। यहां प्रवासी मतदाताओं का असर काफी रहता है। खासकर झारखंड और बिहार से जुड़े मतदाता कई सीटों पर फर्क डालते हैं।

कांग्रेस ने झारखंड के कुछ विधायकों को पर्यवेक्षक बनाया है। लेकिन अभी तक उन्हें बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी गई। इरफान अंसारी जैसे नेता को सिर्फ सीमित भूमिका में रखना समझ से परे लगता है। वे अपने समुदाय में असर रखते हैं। उनका बेहतर इस्तेमाल हो सकता है।

इसी तरह पप्पू यादव को भी अभी तक कोई खास जिम्मेदारी नहीं मिली। बिहार के मतदाताओं पर उनकी पकड़ मानी जाती है। ऐसे में उनका इस्तेमाल चुनाव में किया जा सकता है।

गठबंधन की राजनीति भी अहम है। झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ कांग्रेस सरकार में साझेदार है। ऐसे में असम में भी उन्हें साथ लेकर चलना समझदारी हो सकती है। हेमंत सोरेन की मांग है कि उनकी पार्टी को कुछ सीटें दी जाएं। अगर ऐसा होता है तो चुनाव में तालमेल बेहतर बन सकता है।

दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी पूरी ताकत के साथ मैदान में है। वह जीत की हैट्रिक चाहती है। ऐसे में कांग्रेस के लिए चुनौती और बढ़ जाती है। कांग्रेस 100 से ज्यादा सीटों पर लड़ रही है। मतलब पार्टी पूरे दम के साथ मैदान में है। लेकिन सिर्फ संख्या से जीत नहीं मिलती। जमीन पर काम दिखना चाहिए।

अब देखना यह है कि डीके शिवकुमार इस पूरे चुनाव को कैसे संभालते हैं। क्या वे अपने रणनीतिक कौशल से कांग्रेस को वापसी दिला पाते हैं या नहीं। असम का यह चुनाव सिर्फ एक राज्य का चुनाव नहीं है। यह कांग्रेस के लिए एक बड़ा संदेश भी लेकर आएगा। यहां की जीत या हार आने वाले समय की राजनीति की दिशा तय कर सकती है।

असम का यह चुनाव कांग्रेस के लिए एक बड़ा मौका भी है और कड़ी परीक्षा भी। सबकी नजर रणनीति और तालमेल पर है। अगर पार्टी समय रहते सही फैसले लेती है और जमीन पर मजबूती दिखाती है तो वापसी संभव है। लेकिन जरा सी चूक भारी पड़ सकती है। यही इस चुनाव की असली सच्चाई है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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