
कोटा का छात्र संवाद कार्यक्रम राहुल गांधी के लिए राजनीतिक और संगठनात्मक दोनों दृष्टियों से सफल माना जा सकता है। कार्यक्रम ने एक ओर छात्रों और युवाओं को कांग्रेस के केंद्र में लाने का प्रयास किया, वहीं दूसरी ओर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को यह संकेत भी दिया कि संगठन की नई संरचना में युवाओं और जमीनी नेतृत्व की भूमिका लगातार बढ़ाई जा रही है।
-देवेंद्र यादव-

17 जून को शिक्षा नगरी कोटा में आयोजित राहुल गांधी के छात्र संवाद कार्यक्रम की यदि राजनीतिक दृष्टि से समीक्षा की जाए, तो यह कार्यक्रम कांग्रेस के उन बड़े नेताओं के लिए एक स्पष्ट संदेश के रूप में देखा जा सकता है जो यह मानते हैं कि उनकी राजनीतिक हैसियत के कारण ही कांग्रेस मजबूत है। राहुल गांधी ने मानो यह संकेत दिया कि कांग्रेस किसी एक नेता पर निर्भर नहीं है और यदि आवश्यक हुआ तो युवाओं की नई टीम तैयार की जा सकती है।
शायद यही कारण था कि कोटा के छात्र संवाद कार्यक्रम को औपचारिक रूप से गैर-राजनीतिक स्वरूप दिया गया। कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए राहुल गांधी ने पहले ही दिल्ली से अपनी टीम को कोटा भेज दिया था। कांग्रेस के छात्र और युवा कार्यकर्ता भी कार्यक्रम को भव्य और सफल बनाने में जुट गए। परिणामस्वरूप 17 जून का छात्र संवाद कार्यक्रम व्यापक चर्चा का विषय बना और इसे ऐतिहासिक बताया गया।
जिला अध्यक्षों को ताकतवर बनाने का संदेश
राहुल गांधी लंबे समय से कांग्रेस संगठन को मजबूत करने के लिए संगठन सृजन अभियान चला रहे हैं। इसी अभियान के तहत देशभर में जिला कांग्रेस अध्यक्षों की नियुक्तियां की गई हैं। राहुल गांधी चाहते हैं कि जिला अध्यक्ष संगठन की वास्तविक ताकत बनें। कोटा के छात्र संवाद कार्यक्रम में भी इसकी झलक दिखाई दी। प्रदेश के कई बड़े नेता यह कहते नजर आए कि उनके हाथ में बहुत कुछ नहीं है, जबकि जिला अध्यक्षों की सक्रियता और भूमिका अधिक प्रभावशाली दिखाई दी। इससे यह संदेश गया कि संगठनात्मक ढांचे में जिला स्तर के नेतृत्व को अधिक महत्व दिया जा रहा है।
बड़े नेताओं की मौजूदगी, लेकिन सीमित भूमिका
कार्यक्रम के दौरान राजस्थान कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता मीडिया के सामने अपनी उपस्थिति दर्ज कराते दिखाई दिए। संभवतः इसका उद्देश्य यह संदेश देना था कि वे भी राहुल गांधी के कार्यक्रम को सफल बनाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि, राजस्थान कांग्रेस के प्रभारी रहे सुखजिंदर सिंह रंधावा कार्यक्रम में प्रमुखता से नजर नहीं आए, जिसकी भी राजनीतिक हलकों में चर्चा रही।
मीडिया प्रबंधन पर उठे सवाल
कांग्रेस और राहुल गांधी की ओर से अक्सर यह शिकायत की जाती रही है कि मुख्यधारा का मीडिया उन्हें पर्याप्त स्थान नहीं देता। ऐसे में कोटा कार्यक्रम के दौरान मीडिया प्रबंधन को लेकर भी सवाल उठे। बताया गया कि दिल्ली से कवरेज के लिए आई मीडिया टीम को कोटा के बजाय लगभग 40 किलोमीटर दूर बूंदी के एक होटल में ठहराया गया। जबकि कोटा में भी पर्याप्त होटल उपलब्ध थे। इस निर्णय को लेकर सवाल उठे कि आखिर मीडिया टीम को बूंदी में क्यों ठहराया गया और इसका फैसला किस स्तर पर लिया गया। यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि कांग्रेस नेता लगातार आरोप लगा रहे थे कि भाजपा राहुल गांधी के कार्यक्रम को कमजोर करने का प्रयास कर रही है। ऐसे में मीडिया कवरेज की रणनीति और व्यवस्थाओं पर भी चर्चा होना स्वाभाविक था।
मीडिया में राहुल से ज्यादा दिखे राजस्थान के नेता
कार्यक्रम के दौरान मीडिया कवरेज में राजस्थान कांग्रेस के कई बड़े नेता प्रमुखता से दिखाई दिए। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव सचिन पायलट तथा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा मीडिया से बातचीत करते नजर आए। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इससे कार्यक्रम का एक बड़ा हिस्सा नेताओं की मौजूदगी और उनकी प्रतिक्रियाओं पर केंद्रित हो गया।
राहुल गांधी का छात्र संवाद कार्यक्रम एक और कारण से चर्चा में रहा। कार्यक्रम की शुरुआत लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के कोटा स्थित निजी आवास के ठीक सामने से हुई। इस संयोग ने राजनीतिक गलियारों में अलग तरह की चर्चाओं को जन्म दिया।
मुस्कुराहटों के पीछे छिपे राजनीतिक संकेत
कार्यक्रम के बाद एक तस्वीर विशेष रूप से चर्चा में रही, जिसमें अशोक गहलोत, सचिन पायलट और गोविंद सिंह डोटासरा साथ बैठकर मुस्कुराते और ठहाके लगाते दिखाई दे रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों ने इस तस्वीर को अपने-अपने नजरिये से देखा। कुछ लोगों का मानना है कि मुस्कुराहटों के पीछे यह संदेश भी छिपा हो सकता है कि राहुल गांधी ने कार्यक्रम का केंद्र युवाओं और छात्रों को बनाया तथा वरिष्ठ नेताओं की भूमिका अपेक्षाकृत सीमित रखी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

















