
-क्या इन घटनाओं के पीछे बदलते शक्ति संतुलन के संकेत छिपे हैं?
-देवेंद्र यादव-

क्या 2028 के राजस्थान विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद की नई दावेदारी आकार ले रही है? क्या प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा अब केवल संगठनात्मक नेता नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार के रूप में उभर रहे हैं? और क्या यही कारण है कि एक ओर भाजपा के नेता उन पर लगातार राजनीतिक हमले कर रहे हैं, जबकि दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खुलकर उनके बचाव में सामने आ रहे हैं?
हाल के घटनाक्रमों को देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि डोटासरा के राजनीतिक कद में तेजी से वृद्धि हुई है। भाजपा की ओर से शिक्षा मंत्री मदन दिलावर और कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने डोटासरा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। इसके बाद अशोक गहलोत जिस तरह उनके समर्थन में उतरे, उसने राजनीतिक हलकों में नई चर्चाओं को जन्म दिया।
यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या अशोक गहलोत अब यह मानने लगे हैं कि 2028 में उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती सचिन पायलट नहीं, बल्कि गोविंद सिंह डोटासरा हो सकते हैं?
कुछ समय पहले लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पुष्कर में आयोजित कांग्रेस के जिला अध्यक्षों के प्रशिक्षण शिविर में पहुंचे थे। उस दौरान, अशोक गहलोत की मौजूदगी में राहुल गांधी ने गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली की खुलकर प्रशंसा करते हुए कहा था कि राजस्थान में यह जोड़ी पार्टी के लिए बेहतर काम कर रही है और अन्य राज्यों के कांग्रेस नेताओं को उनसे सीख लेनी चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी द्वारा सार्वजनिक मंच से डोटासरा की प्रशंसा केवल औपचारिक टिप्पणी नहीं थी, बल्कि यह उनके प्रति केंद्रीय नेतृत्व के भरोसे का संकेत भी माना जा सकता है। यदि 2028 में कांग्रेस सत्ता में लौटती है और किसी कारणवश सचिन पायलट के नाम पर व्यापक सहमति नहीं बनती, तो क्या राहुल गांधी की दूसरी पसंद गोविंद सिंह डोटासरा हो सकते हैं?
इसी संदर्भ में यह भी चर्चा है कि अशोक गहलोत डोटासरा के बचाव में इसलिए आगे आए ताकि उनके खिलाफ चल रहा राजनीतिक विवाद पार्टी के भीतर उनके लिए बड़ा नुकसान न बन जाए। हालांकि, यह केवल राजनीतिक विश्लेषण है और इसकी पुष्टि संबंधित नेता ही कर सकते हैं।
17 जून को राहुल गांधी एक दिवसीय दौरे पर कोटा आए, जहां उन्होंने “छात्रों की गूंज” कार्यक्रम की शुरुआत की। आधिकारिक तौर पर इसे गैर-राजनीतिक कार्यक्रम बताया गया, लेकिन कांग्रेस के भीतर इसके कई राजनीतिक संकेत देखने को मिले।
कार्यक्रम से पहले और बाद की गतिविधियों पर नजर डालें तो ऐसा लगा कि राहुल गांधी के इस आयोजन की पूरी जिम्मेदारी अशोक गहलोत ने अपने हाथों में ले रखी थी। वहीं, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष होने के बावजूद गोविंद सिंह डोटासरा अपेक्षाकृत कम सक्रिय और कुछ हद तक असहज दिखाई दिए। राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने कार्यक्रम के दौरान दोनों नेताओं की सक्रियता और हाव-भाव को भी अलग-अलग नजरिए से देखा।
पुष्कर और कोटा के कार्यक्रमों के बाद जिस तरह भाजपा ने डोटासरा पर हमले तेज किए और उसके जवाब में अशोक गहलोत उनके बचाव में आए, उसने राजनीतिक अटकलों को और बल दिया है। इन घटनाओं के वास्तविक राजनीतिक कारण क्या हैं, इसका उत्तर आरोप लगाने वाले और बचाव करने वाले नेता ही बेहतर दे सकते हैं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि राजस्थान कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर नई हलचल शुरू हो चुकी है।
राहुल गांधी को भी यह समझना होगा कि राजस्थान कांग्रेस में सब कुछ सामान्य नहीं है। मुख्यमंत्री पद की संभावित दावेदारी को लेकर अंदरूनी राजनीति धीरे-धीरे तेज होती दिखाई दे रही है।
इसी बीच, प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा को बदले जाने की चर्चाएं भी राजनीतिक गलियारों में जोर पकड़ रही हैं। ऐसी अटकलें हैं कि हरियाणा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर को राजस्थान का नया प्रभारी बनाया जा सकता है।
26 जून को “छात्रों की गूंज” कार्यक्रम को लेकर प्रेस वार्ता के लिए अशोक तंवर का जयपुर आना भी इन चर्चाओं को बल देता है। यदि उन्हें राजस्थान की जिम्मेदारी मिलती है, तो यह कांग्रेस संगठन में नए समीकरणों की शुरुआत हो सकती है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अशोक गहलोत भी ऐसे प्रभारी की नियुक्ति चाहेंगे, जिनके साथ उनकी बेहतर राजनीतिक समझ और समन्वय हो। हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले अशोक तंवर की भाजपा से कांग्रेस में वापसी में कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसमें अशोक गहलोत की सहमति और रणनीतिक समर्थन भी देखते हैं।
फिलहाल इतना तय है कि राजस्थान कांग्रेस में 2028 की राजनीतिक बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्री पद की इस संभावित दौड़ में सचिन पायलट, गोविंद सिंह डोटासरा और अशोक गहलोत की राजनीतिक रणनीतियां किस दिशा में आगे बढ़ती हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















