
-लगातार संवाद के बावजूद सियासी लाभ क्यों नहीं मिल रहा, और क्या मीडिया विभाग संगठन पर हावी हो गया है?
-देवेंद्र यादव-

क्या सिर्फ प्रेस वार्ताएं करने से कांग्रेस मजबूत हो जाएगी और क्या इसी रास्ते वह केंद्र तथा राज्यों की सत्ता में वापसी कर पाएगी? यह सवाल इसलिए अहम है, क्योंकि 2014 के बाद के लगभग 12 वर्षों में कांग्रेस ने जितनी प्रेस वार्ताएं की हैं, उनका कागजी हिसाब लगाया जाए तो शायद वह अपने-आप में एक रिकॉर्ड होगा। देश के किसी सत्ताधारी दल या विपक्ष के अन्य दलों ने मिलकर भी जितनी प्रेस वार्ताएं की होंगी, उतनी शायद अकेले कांग्रेस ने कर ली हों।
कांग्रेस की लगातार होती प्रेस वार्ताओं को देखकर कई बार ऐसा लगता है मानो पार्टी के भीतर केवल मीडिया विभाग ही सक्रिय है और वही कांग्रेस को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित भी है। इसके उलट, बाकी विभागों और नेताओं की सक्रियता उतनी दिखाई नहीं देती। यही वजह है कि यह धारणा बनती है कि एक विभाग को छोड़कर पार्टी का बड़ा हिस्सा निष्क्रिय पड़ा है, और कांग्रेस की कमजोरी का एक कारण यह भी हो सकता है।
प्रेस वार्ताएं बहुत, लेकिन राजनीतिक लाभ कम
सबसे बड़ा सवाल यह है कि कांग्रेस की निरंतर प्रेस वार्ताओं के बावजूद उसे इसका राजनीतिक लाभ क्यों नहीं मिल रहा? आखिर क्यों कांग्रेस केंद्र और राज्यों के चुनावों में बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पा रही? अगर प्रेस वार्ताएं जनमत बनाने और राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने का इतना प्रभावी माध्यम हैं, तो फिर उनका असर चुनावी नतीजों में क्यों नहीं दिखता?
यह भी सही है कि प्रेस वार्ताओं से कोई लाभ नहीं हुआ, ऐसा कहना पूरी तरह उचित नहीं होगा। भले ही कांग्रेस को प्रत्यक्ष राजनीतिक फायदा न मिला हो, लेकिन पार्टी के मीडिया विभाग से जुड़े कुछ नेताओं को इसका लाभ जरूर मिला है। जयराम रमेश और पवन खेड़ा जैसे नेता, जो लगातार मीडिया में पार्टी का पक्ष रखते रहे, राज्यसभा तक पहुंचे। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कांग्रेस की प्रेस वार्ताओं का लाभ पार्टी से ज्यादा उसके मीडिया चेहरों को मिल रहा है?
क्या राहुल गांधी को गलत रास्ते पर ले जाया जा रहा है?
एक और गंभीर सवाल यह है कि क्या कांग्रेस का मीडिया विभाग राहुल गांधी को प्रेस वार्ताओं में उलझाकर पार्टी का बड़ा नुकसान कर रहा है? इस सवाल को समझने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैली को भी देखना होगा। कांग्रेस और उसके नेता अक्सर आरोप लगाते हैं कि नरेंद्र मोदी ने पिछले 12 वर्षों में शायद ही कोई खुली प्रेस वार्ता की हो। इसके बावजूद भाजपा 2014 से लगातार केंद्र की सत्ता में बनी हुई है, अनेक राज्यों में सरकार चला रही है और चुनाव भी जीत रही है।
दूसरी ओर, राहुल गांधी और कांग्रेस लगातार प्रेस वार्ताएं कर रहे हैं, लेकिन उसके बावजूद पार्टी केंद्र से लेकर राज्यों तक चुनावी हार का सिलसिला नहीं रोक पा रही। ऐसे में सवाल प्रेस वार्ता करने या न करने का नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक नफा-नुकसान का है। यदि प्रेस वार्ताएं ही सफलता की कुंजी होतीं, तो कांग्रेस की स्थिति आज कहीं बेहतर होनी चाहिए थी।
जब कवरेज ही नहीं, तो औचित्य क्या?
एक बड़ा सवाल यह भी है कि जब मुख्यधारा का मीडिया कांग्रेस की प्रेस वार्ताओं को अपेक्षित कवरेज ही नहीं देता, तब लगातार प्रेस वार्ताएं करने का औचित्य क्या है? अगर राहुल गांधी और कांग्रेस की बात जनता तक उसी प्रभाव और व्यापकता के साथ नहीं पहुंच रही, जिसकी उम्मीद की जाती है, तो फिर यह पूरी कवायद कितनी उपयोगी है?
राजनीति में संवाद जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि वह संवाद जनता तक पहुंचे, असर पैदा करे और संगठनात्मक ऊर्जा में बदले। यदि प्रेस वार्ताएं केवल रिकॉर्ड बनाने या मीडिया विभाग की सक्रियता दिखाने तक सीमित रह जाएं, तो उनका राजनीतिक मूल्य सीमित हो जाता है।
क्या रणनीतिकारों की जगह प्रवक्ताओं ने ले ली है?
अब यह आशंका भी जोर पकड़ती है कि क्या कांग्रेस में रणनीतिकारों की जगह धीरे-धीरे मीडिया विभाग के प्रवक्ताओं ने ले ली है? क्या वही राहुल गांधी को ऐसी दिशा में ले जा रहे हैं, जहां पार्टी की ऊर्जा जमीनी संघर्ष, संगठन निर्माण और जनसंपर्क के बजाय प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सिमटती जा रही है? और क्या यह सब कुछ कुछ नेताओं के निजी राजनीतिक हितों को साधने का माध्यम बन गया है?
पवन खेड़ा का राज्यसभा पहुंचना और उनसे पहले जयराम रमेश का राज्यसभा सदस्य बनना इस बहस को और हवा देता है। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि मीडिया में पार्टी का चेहरा बनने वालों को व्यक्तिगत राजनीतिक लाभ तो मिल रहा है, लेकिन पार्टी को वैसा सामूहिक लाभ नहीं मिल पा रहा, जिसकी कांग्रेस को आज सबसे ज्यादा जरूरत है।
कांग्रेस के सामने असली चुनौती
कांग्रेस के सामने असली चुनौती प्रेस वार्ताएं करने की नहीं, बल्कि संगठन को जीवंत बनाने, जमीनी कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने, राज्यों में नेतृत्व को मजबूत करने और जनता के बीच विश्वसनीय विकल्प के रूप में खुद को स्थापित करने की है। प्रेस वार्ता राजनीति का एक औजार हो सकती है, लेकिन वह पूरी राजनीति नहीं हो सकती। यदि पार्टी की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा सिर्फ कैमरों के सामने बोलने में खर्च होगा और मैदान में संगठन कमजोर रहेगा, तो सत्ता में वापसी का रास्ता और कठिन होता जाएगा।
कांग्रेस को यह तय करना होगा कि वह मीडिया-केंद्रित राजनीति करेगी या जनाधार-केंद्रित राजनीति। क्योंकि अंततः चुनाव प्रेस कॉन्फ्रेंस से नहीं, बल्कि बूथ, कार्यकर्ता, संगठन, नेतृत्व और जनता के भरोसे से जीते जाते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

















