
राजेंद्र गौतम की नियुक्ति क्या कांग्रेस की नई सामाजिक और संगठनात्मक रणनीति का संकेत है?
-देवेन्द्र यादव-

क्या कांग्रेस और राहुल गांधी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए कोई बड़ा राजनीतिक दांव चलने की तैयारी कर रहे हैं? क्या उत्तर प्रदेश कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रभारी के रूप में अविनाश पांडे की जगह वरिष्ठ दलित नेता राजेंद्र गौतम की नियुक्ति इसी रणनीति का हिस्सा है?
26 जून को कांग्रेस हाईकमान ने संगठन में चार महत्वपूर्ण नियुक्तियां कीं। इनमें तीन राज्यों के प्रभारियों में बदलाव के साथ-साथ राष्ट्रीय कांग्रेस सेवादल के अध्यक्ष लालजी देसाई के स्थान पर कर्नाटक के युवा नेता बी.वी. श्रीनिवास को जिम्मेदारी सौंपी गई। श्रीनिवास पूर्व में भारतीय युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष और कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव रह चुके हैं।
इन नियुक्तियों में सबसे अधिक राजनीतिक महत्व उत्तर प्रदेश के प्रभारी के रूप में राजेंद्र गौतम तथा कांग्रेस सेवादल के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में बी.वी. श्रीनिवास की नियुक्ति को माना जा सकता है। लंबे समय बाद कांग्रेस में ऐसी नियुक्तियां दिखाई दी हैं, जो राहुल गांधी की संगठनात्मक सोच और प्राथमिकताओं के अनुरूप प्रतीत होती हैं। पार्टी कार्यकर्ता भी लंबे समय से ऐसे ही जमीनी और सक्रिय नेतृत्व की अपेक्षा कर रहे थे।
राजेंद्र गौतम, बी.वी. श्रीनिवास और लालजी देसाई—तीनों की पहचान संगठन से निकले हुए जमीनी नेताओं के रूप में रही है। ये कार्यकर्ताओं की नब्ज और जनभावनाओं को समझते हैं तथा संगठनात्मक कार्यप्रणाली का व्यावहारिक अनुभव रखते हैं। राजेंद्र गौतम केवल एक प्रमुख दलित नेता ही नहीं, बल्कि एक कुशल राजनीतिक रणनीतिकार भी माने जाते हैं। वे दिल्ली से तीन बार विधायक रह चुके हैं और चुनावी रणनीति बनाने में उनकी विशेष पहचान रही है। संभवतः इसी कारण राहुल गांधी ने उन्हें उत्तर प्रदेश जैसे राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण राज्य की जिम्मेदारी सौंपी है।
चार दशक से सत्ता से दूर कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस चार दशक से अधिक समय से सत्ता से बाहर है। इस दौरान पार्टी ने वापसी के लिए अनेक राजनीतिक प्रयोग किए और विभिन्न रणनीतियां अपनाईं, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसके विपरीत संगठन लगातार कमजोर होता गया। बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के उभार के बाद कांग्रेस ने समय-समय पर इन क्षेत्रीय दलों के साथ चुनावी समझौते भी किए, लेकिन इससे भी पार्टी अपना राजनीतिक आधार पुनः स्थापित नहीं कर सकी। कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक धीरे-धीरे इन क्षेत्रीय दलों की ओर खिसकता गया।
संभवतः कांग्रेस नेतृत्व को अब यह एहसास हुआ है कि उसके पारंपरिक सामाजिक आधार को सबसे अधिक चुनौती भाजपा से पहले क्षेत्रीय दलों ने दी थी। ऐसे में एक प्रभावशाली दलित चेहरे को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाना कांग्रेस की नई सामाजिक रणनीति का हिस्सा माना जा सकता है।
क्या सोशल इंजीनियरिंग का नया प्रयोग सफल होगा?
राजेंद्र गौतम को सोशल इंजीनियरिंग की राजनीति का जानकार माना जाता है। उत्तर प्रदेश जैसे सामाजिक समीकरणों वाले राज्य में कांग्रेस को लंबे समय से ऐसे रणनीतिकार की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। इस दृष्टि से राजेंद्र गौतम की नियुक्ति महत्वपूर्ण मानी जा सकती है।
हालांकि, सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या कांग्रेस नेतृत्व उन्हें पूरी स्वतंत्रता से काम करने देगा? उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं रही, बल्कि यह भी रही है कि नियुक्त नेताओं को अक्सर संगठनात्मक निर्णय लेने की पूरी छूट नहीं मिलती। दिल्ली स्तर के नेताओं का अत्यधिक हस्तक्षेप कई बार प्रदेश संगठन की कार्यक्षमता को प्रभावित करता रहा है।
इसका उदाहरण यह भी है कि जिला अध्यक्षों की नियुक्तियों के बावजूद अब तक उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का पूर्ण गठन नहीं हो पाया है। इससे संगठनात्मक गति प्रभावित हुई है।
राहुल गांधी के लिए उत्तर प्रदेश क्यों सबसे अहम है?
उत्तर प्रदेश केवल राजनीतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि गांधी परिवार की राजनीतिक विरासत के कारण भी कांग्रेस के लिए सबसे महत्वपूर्ण राज्य है। गांधी परिवार लंबे समय तक उत्तर प्रदेश से लोकसभा का प्रतिनिधित्व करता रहा है और राहुल गांधी स्वयं रायबरेली से सांसद हैं।
यही कारण है कि उत्तर प्रदेश कांग्रेस के संगठनात्मक मामलों में राष्ट्रीय स्तर के नेताओं का हस्तक्षेप अपेक्षाकृत अधिक रहता है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यही हस्तक्षेप प्रदेश संगठन की स्वायत्तता को प्रभावित करता है और कांग्रेस की मजबूती में बाधा बनता है।
अब राहुल गांधी ने 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए राजेंद्र गौतम को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है। लेकिन यदि उन्हें अपेक्षित स्वतंत्रता और संगठनात्मक अधिकार नहीं मिले, तो यह नियुक्ति भी पूर्व के कई प्रयोगों की तरह सीमित परिणाम ही दे सकती है।यदि कांग्रेस वास्तव में उत्तर प्रदेश में अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस पाना चाहती है, तो केवल नए चेहरे नियुक्त करना पर्याप्त नहीं होगा। नेतृत्व को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि प्रदेश प्रभारी और संगठन को बिना अनावश्यक हस्तक्षेप के काम करने का अवसर मिले। तभी कांग्रेस 2027 के विधानसभा चुनाव में प्रभावी चुनौती पेश करने की स्थिति में आ सकेगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं।)

















