
-संगठन में पीढ़ीगत बदलाव के संकेत, युवा नेतृत्व और ऊर्जावान कार्यकर्ताओं पर बढ़ रहा जोर
-देवेन्द्र यादव-

कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी की नई टीम तैयार करने का रोडमैप बनाकर उस पर धीरे-धीरे अमल शुरू कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अब राहुल गांधी की नई टीम के ‘कोच’ की भूमिका में दिखाई देंगे, जबकि मैदान में सक्रिय जिम्मेदारी युवा और ऊर्जावान नेताओं के हाथों में होगी?
जून के अंतिम सप्ताह में घटनाक्रम कुछ ऐसे ही संकेत देता नजर आया। 26 जून को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद, पूर्व रेल मंत्री पवन बंसल, मुकुल वासनिक और सोनिया गांधी के पूर्व राजनीतिक सलाहकार जनार्दन द्विवेदी, 10 जनपथ पर सोनिया गांधी से मुलाकात कर रहे थे। ठीक उसी समय कांग्रेस हाईकमान उत्तर प्रदेश, हरियाणा और ओडिशा के लिए नए राष्ट्रीय प्रभारियों की घोषणा कर रहा था।
इन नियुक्तियों के साथ कांग्रेस ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन प्रभारियों को हटाया गया है, वे नए प्रभारियों को संगठनात्मक सहयोग और मार्गदर्शन देते रहेंगे। यही निर्णय इस चर्चा को बल देता है कि क्या अब कांग्रेस में वरिष्ठ नेताओं की भूमिका सक्रिय संचालन की बजाय मार्गदर्शक और ‘कोच’ की होगी, जबकि मुख्य जिम्मेदारी राहुल गांधी की नई पीढ़ी के नेताओं के हाथ में सौंपी जाएगी।
उत्तर प्रदेश से मिला बदलाव का सबसे बड़ा संकेत
26 जून को जब अशोक गहलोत सहित कई वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी से मिलने पहुंचे, तब राजनीतिक गलियारों और मीडिया में यह चर्चा शुरू हो गई कि क्या संगठन में वरिष्ठ नेताओं को नई और बड़ी जिम्मेदारियां मिलने वाली हैं।
लेकिन उसी दिन उत्तर प्रदेश जैसे सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक राज्य में कांग्रेस ने वरिष्ठ नेता अविनाश पांडे को प्रभारी पद से हटाकर दलित नेता राजेंद्र पाल गौतम को प्रदेश प्रभारी नियुक्त कर दिया। साथ ही यह भी कहा गया कि अविनाश पांडे पहले की तरह संगठन को मजबूत करने में सहयोग करते रहेंगे।
यह फैसला संकेत देता है कि राहुल गांधी अब वरिष्ठ नेताओं के अनुभव का उपयोग मार्गदर्शक के रूप में करना चाहते हैं, जबकि संगठन की कमान अपेक्षाकृत नई पीढ़ी के नेताओं को सौंपने की रणनीति पर आगे बढ़ रहे हैं।
65 वर्ष से कम उम्र के नेताओं पर बढ़ता भरोसा
राहुल गांधी लगातार अपनी नई टीम तैयार कर रहे हैं। इस टीम की एक प्रमुख विशेषता यह दिखाई देती है कि इसमें अधिकांश जिम्मेदारियां 65 वर्ष से कम आयु के नेताओं को दी जा रही हैं।
यदि भारतीय युवा कांग्रेस और एनएसयूआई को अलग भी रख दें, तब भी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक विभाग और महिला कांग्रेस के अधिकांश राष्ट्रीय अध्यक्ष इसी आयु वर्ग के हैं।
उत्तर प्रदेश, हरियाणा और ओडिशा में नए राष्ट्रीय प्रभारियों की नियुक्तियों में भी अपेक्षाकृत युवा नेतृत्व को प्राथमिकता मिलती दिखाई दी है। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि राहुल गांधी संगठन में पीढ़ीगत बदलाव को आगे बढ़ाना चाहते हैं।
क्या बदलेगी कांग्रेस की जंबो राष्ट्रीय कार्यकारिणी?
अब सबसे बड़ा सवाल कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी को लेकर है। क्या राहुल गांधी पहले की तरह विशाल राष्ट्रीय कार्यकारिणी को छोटा करके उसमें ऊर्जावान, सक्रिय और जमीनी कार्यकर्ताओं को जगह देंगे?
वर्तमान राष्ट्रीय कार्यकारिणी में लगभग 80 सचिव और सह-सचिव हैं। आलोचकों का आरोप रहा है कि इनमें से अनेक नेताओं की नियुक्ति बड़े नेताओं की सिफारिश या दरबारी राजनीति के कारण हुई। यदि राहुल गांधी वास्तव में संगठन में व्यापक बदलाव चाहते हैं, तो उन्हें ऐसे पदाधिकारियों की समीक्षा करनी होगी।
राष्ट्रीय कार्यकारिणी में ऐसे भी सचिव रहे हैं जो पद मिलने के बाद विधानसभा का टिकट तो हासिल कर गए, लेकिन चुनाव जीतने में सफल नहीं हो सके। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जो नेता स्वयं चुनाव नहीं जीत पाए, वे अपने प्रभार वाले राज्यों में पार्टी को चुनाव कैसे जिता पाएंगे?
यदि कांग्रेस को संगठनात्मक रूप से मजबूत करना है, तो राष्ट्रीय कार्यकारिणी में वफादार, ईमानदार, संघर्षशील और जनाधार वाले कार्यकर्ताओं को अधिक अवसर देना आवश्यक होगा।
क्या ‘बयानवीर’ नेताओं पर भी लगेगी लगाम?
राहुल गांधी के सामने एक और चुनौती उन नेताओं की है, जिन्हें अक्सर ‘बयानवीर’ कहा जाता है। कई बार ऐसे नेताओं के विवादित या असावधान बयान कांग्रेस के लिए राजनीतिक संकट खड़ा कर देते हैं।
कांग्रेस में लंबे समय से यह देखा गया है कि कुछ नेता विपक्ष के खिलाफ प्रभावी राजनीतिक रणनीति बनाने की बजाय विवादित बयान देकर पार्टी को रक्षात्मक स्थिति में पहुंचा देते हैं। हाल ही में राज्यसभा सांसद और कांग्रेस के मीडिया एवं प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा के कुछ बयानों को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा रही है।
यदि राहुल गांधी संगठन में अनुशासन और संदेश की एकरूपता स्थापित करना चाहते हैं, तो उन्हें इस पहलू पर भी गंभीरता से विचार करना होगा। क्योंकि कई बार नेताओं के बयान, पार्टी के राजनीतिक अभियान की गति धीमी कर देते हैं।
कांग्रेस में जो बदलाव दिखाई दे रहे हैं, वे केवल पदों के फेरबदल तक सीमित नहीं हैं। यदि राहुल गांधी वास्तव में वरिष्ठ नेताओं को मार्गदर्शक और युवा नेताओं को नेतृत्व की भूमिका देने की रणनीति पर आगे बढ़ते हैं, तो यह पार्टी में एक बड़े पीढ़ीगत परिवर्तन की शुरुआत हो सकती है। हालांकि, इस रणनीति की सफलता केवल नए चेहरों की नियुक्ति से नहीं, बल्कि संगठनात्मक जवाबदेही, प्रदर्शन आधारित मूल्यांकन और अनुशासन लागू करने पर निर्भर करेगी। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि राहुल गांधी का यह प्रयोग कांग्रेस को नई ऊर्जा देता है या यह भी केवल एक सीमित संगठनात्मक बदलाव बनकर रह जाता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेख उनके निजी विचार हैं।)

















