
-राजेंद्र पाल गौतम को प्रभारी बनाने के बाद अब नए प्रदेश अध्यक्ष की मांग तेज, क्या राहुल गांधी सोशल इंजीनियरिंग का नया दांव चलेंगे?
-देवेंद्र यादव-

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रभारी के रूप में अविनाश पांडे की जगह राजेंद्र पाल गौतम की नियुक्ति के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं की निगाहें अब राहुल गांधी के अगले बड़े राजनीतिक फैसले पर टिक गई हैं। कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश कांग्रेस को नया प्रदेश अध्यक्ष भी मिलेगा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर राहुल गांधी किस नेता पर भरोसा जताएंगे?
राजेंद्र पाल गौतम को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देकर कांग्रेस ने दलित राजनीति और सोशल इंजीनियरिंग का स्पष्ट संदेश दिया है। अब चर्चा इस बात की है कि क्या राहुल गांधी इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए प्रदेश अध्यक्ष के पद पर किसी ब्राह्मण चेहरे को सामने लाकर नया राजनीतिक संतुलन साधने का प्रयास करेंगे?
उत्तर प्रदेश में लंबे समय से कांग्रेस ने किसी प्रभावशाली ब्राह्मण नेता को प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनाया है। जबकि एक दौर ऐसा था, जब राज्य में कांग्रेस के कई बड़े ब्राह्मण नेता हुआ करते थे और पार्टी सत्ता की केंद्रबिंदु थी। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या कांग्रेस अपनी खोई हुई सामाजिक पकड़ को फिर मजबूत करने के लिए किसी ब्राह्मण नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर नया राजनीतिक संदेश देना चाहेगी?
यदि ऐसा होता है, तो सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह होगा कि राहुल गांधी की कसौटी पर खरा उतरने वाला वह नेता कौन होगा, जो संगठनात्मक अनुभव, गांधी परिवार के प्रति निष्ठा, राजनीतिक विश्वसनीयता और सर्वस्वीकार्यता—चारों मानकों पर खरा उतर सके।
इन सभी मानकों पर सबसे प्रमुख नाम अमेठी से लोकसभा सांसद किशोरी लाल शर्मा का दिखाई देता है।
मौजूदा समय में उत्तर प्रदेश कांग्रेस में शायद ही कोई ऐसा ब्राह्मण नेता हो, जो गांधी परिवार के प्रति उतना भरोसेमंद और संगठन के स्तर पर उतना अनुभवी माना जाता हो। किशोरी लाल शर्मा लगभग चार दशकों से अमेठी और रायबरेली में संगठन की जिम्मेदारियां संभालते रहे हैं। वे उत्तर प्रदेश की राजनीतिक परिस्थितियों, सामाजिक समीकरणों और कांग्रेस संगठन की कार्यशैली से भली-भांति परिचित हैं।
2024 के लोकसभा चुनाव में गांधी परिवार ने उन पर भरोसा जताते हुए अमेठी से उम्मीदवार बनाया। उन्होंने भाजपा की तत्कालीन सांसद स्मृति ईरानी को पराजित कर अपनी राजनीतिक क्षमता भी सिद्ध की। संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच उनकी स्वीकार्यता भी एक महत्वपूर्ण पक्ष मानी जाती है। यदि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाता है, तो इससे कांग्रेस संगठन में एकजुटता का संदेश जा सकता है।
प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में दूसरा प्रमुख नाम कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी की पुत्री तथा विधायक मोना मिश्रा का भी माना जा रहा है। वह भी मजबूत दावेदार हैं। हालांकि, यह सवाल बना हुआ है कि क्या वह विधानसभा चुनाव जैसे चुनौतीपूर्ण समय में पूरे प्रदेश संगठन को एकजुट रखते हुए अपेक्षित राजनीतिक परिणाम दिला पाएंगी?
चूंकि 2027 का विधानसभा चुनाव अब अधिक दूर नहीं है, इसलिए कांग्रेस को ऐसा प्रदेश अध्यक्ष चाहिए, जो अनुभवी होने के साथ-साथ संगठन को सक्रिय कर सके, कार्यकर्ताओं का विश्वास जीत सके और गांधी परिवार के प्रति निर्विवाद रूप से भरोसेमंद हो। इन कसौटियों पर फिलहाल किशोरी लाल शर्मा का नाम सबसे मजबूत दिखाई देता है।
हालांकि, अंतिम निर्णय राहुल गांधी को ही लेना है। प्रदेश अध्यक्ष के रूप में किस नेता के नाम पर उनकी मुहर लगेगी, इसका इंतजार करना होगा। लेकिन यह भी सच है कि कांग्रेस के पास समय बहुत कम है और अपेक्षाएं बहुत अधिक हैं।
पार्टी को बिहार के अनुभव से भी सबक लेने की जरूरत है। यदि उत्तर प्रदेश में भी संगठनात्मक बदलाव और चुनावी रणनीति तय करने में अनावश्यक विलंब हुआ, तो बिहार जैसी स्थिति दोहराई जा सकती है। बिहार में कांग्रेस संगठनात्मक बदलाव और चुनावी तैयारियों में अपेक्षित तेजी नहीं दिखा सकी, जिसके कारण वह स्थानीय कार्यकर्ताओं और समर्थकों की उम्मीदों के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाई।
उत्तर प्रदेश जैसे निर्णायक राज्य में कांग्रेस के लिए अब हर फैसला राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होगा। ऐसे में नया प्रदेश अध्यक्ष केवल संगठनात्मक नियुक्ति नहीं, बल्कि 2027 की चुनावी रणनीति का सबसे अहम आधार भी साबित हो सकता है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेख उनके निजी विचार हैं।)

















