
मानसून सत्र के आखिरी दो दिनों में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का सदन में आकर विपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिए तैयार होना कई सवाल खड़े कर रहा है। 20 जुलाई से 10 अगस्त तक विपक्ष लगातार अमित शाह के सदन में नहीं आने को मुद्दा बनाता रहा। ऐसे में अचानक 11 अगस्त को उनके सदन में आने का फैसला क्या राहुल गांधी के दबाव का नतीजा है, या भाजपा ने विपक्ष को ही अपने राजनीतिक चक्रव्यूह में फंसाने की रणनीति तैयार कर ली है? यही सवाल अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
-देवेन्द्र यादव-

मानसून सत्र के आखिरी दो दिनों में 11 अगस्त को केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह सदन के भीतर आकर विपक्षी दलों के सवालों का जवाब देने के लिए क्यों मान गए, इसको लेकर राजनीतिक गलियारों और मीडिया में तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं। क्या लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के दबाव में आकर अमित शाह संसद में विपक्ष के नेताओं के सवालों का जवाब देने के लिए मान गए? यह चर्चा इसलिए हो रही है, क्योंकि केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने प्रेस से कहा कि राहुल गांधी की मांग थी कि गृहमंत्री सदन में आकर विपक्ष के सवालों का जवाब दें।
इसलिए सवाल उठ रहा है कि क्या अमित शाह राहुल गांधी के दबाव में आए और संसद में जवाब देने के लिए राजी हो गए?
20 जुलाई से 10 अगस्त तक विपक्ष लगातार उठाता रहा सवाल
सवाल यह भी खड़ा हो रहा है कि संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हुआ था। 20 जुलाई के बाद से 10 अगस्त तक विपक्ष और राहुल गांधी लगातार सवाल खड़े कर रहे थे कि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह सदन के भीतर क्यों नहीं आ रहे हैं।
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सहित विपक्ष के तमाम सांसद सदन के भीतर और बाहर लगातार अमित शाह के सदन में नहीं आने को लेकर सवाल उठाते रहे। अचानक 10 अगस्त को ऐसा क्या हुआ कि अमित शाह सदन में आने और विपक्ष के सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हो गए?
राहुल गांधी का दबाव या केसी वेणुगोपाल का पत्र?
क्या यह राहुल गांधी का दबाव था या फिर कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री केसी वेणुगोपाल का वह पत्र, जो उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को लिखा था और कहा था कि अमित शाह सदन के भीतर आकर जवाब दें?
वहीं, कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरोप लगाया था कि भाजपा के नेता घरों में बैठकर सरकार चला रहे हैं। विपक्ष के सांसद संसद परिसर में सांसदों का रजिस्टर लेकर यह भी बता रहे थे कि अमित शाह कितने दिनों से सदन के भीतर नहीं आ रहे हैं।
अब सवाल उठता है कि क्या अमित शाह ने विपक्ष के सांसदों और कांग्रेस नेताओं के इन्हीं सवालों के कारण बड़ा फैसला किया और सदन के भीतर विपक्ष के सांसदों के सवालों का जवाब देने का निर्णय किया?
अंतिम दो दिनों में क्या भाजपा विपक्ष को देगी बड़ा झटका?
भले ही अमित शाह ने सदन के भीतर आकर विपक्षी दलों के सवालों का जवाब देने का निर्णय किया हो, लेकिन सवाल अभी भी बने हुए हैं। क्या भाजपा सरकार मानसून सत्र के अंतिम दो दिनों में महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित करवा लेगी?
यदि ऐसा हुआ तो यह अमित शाह की विपक्ष पर बड़ी जीत मानी जाएगी। तब यह भी कहा जा सकता है कि भाजपा राहुल गांधी के चक्रव्यूह में नहीं फंसी, बल्कि भाजपा के नेताओं ने राहुल गांधी और विपक्ष को ही अपने चक्रव्यूह में फंसा लिया।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये लेखक के निजी विचार हैं।)

















