
-प्रशिक्षण शिविर के बाद कोटा कांग्रेस की कार्यकारिणी पर उठे सवाल
-देवेन्द्र यादव-

कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही है कि संगठन में बड़ा पद मिलते ही कई नेता अपने आपको ‘पंसारी’ समझ बैठते हैं। कुछ ऐसा ही दृश्य कोटा जिला कांग्रेस कमेटी में देखने को मिला।
राजस्थान के पुष्कर में नव नियुक्त जिला अध्यक्षों का प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया था, जिसे कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने संबोधित किया। इस दौरान राहुल गांधी ने जिला अध्यक्षों के परिवारजनों से भी मुलाकात की। प्रशिक्षण शिविर के तुरंत बाद 17 जुलाई को कोटा में राहुल गांधी ने ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के तहत विद्यार्थियों से सीधा संवाद किया।
यहीं से मानो नेताजी ‘पंसारी’ बन बैठे। परिवार के लोगों से राहुल गांधी ने बात क्या कर ली, ऐसा लगा जैसे नेताजी को हल्दी की गांठ मिल गई हो। इसके बाद उन्होंने जिला कार्यकारिणी की घोषणा कर दी। कार्यकारिणी बनाते समय न तो वरिष्ठता का ध्यान रखा गया और न ही सोशल इंजीनियरिंग का। यहां तक कि राहुल गांधी के मिशन ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी’ को भी दरकिनार कर दिया गया।
कार्यकारिणी की घोषणा के बाद बढ़ी नाराजगी
जिला कार्यकारिणी को लेकर कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं में नाराजगी देखने को मिली। यह नाराजगी इतनी बढ़ गई कि नव नियुक्त जिला पदाधिकारियों में से कुछ ने अपने पदों से इस्तीफा तक दे दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि जिला अध्यक्ष ने वरिष्ठता की अनदेखी करते हुए अपने चहेते लोगों को महत्वपूर्ण पद दे दिए।
यह आरोप भी सुनने को मिल रहे हैं कि जिला कार्यकारिणी में ऐसे लोगों को पदाधिकारी बनाया गया है, जिनकी पृष्ठभूमि कांग्रेस की नहीं रही है।
नगर निगम चुनाव पर पड़ सकता है असर
कोटा शहर में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की यह नाराजगी आगामी नगर निगम चुनाव में पार्टी को कितना नुकसान पहुंचाएगी, यह अलग विषय है। लेकिन नेताओं के बीच गुटबाजी कांग्रेस के लिए निश्चित रूप से भारी पड़ सकती है।
क्या यही था प्रशिक्षण शिविर का उद्देश्य?
सबसे बड़ा सवाल जिला अध्यक्षों के प्रशिक्षण शिविर को लेकर है। क्या प्रशिक्षण शिविर में जिला अध्यक्षों को यही सीख दी गई थी कि कांग्रेस के कर्मठ कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर अपने चहेते लोगों को संगठन में जगह दी जाए?
सवाल यह भी है कि जिला अध्यक्ष राहुल गांधी के मिशन को सफल बना रहे हैं या उसे विफल कर रहे हैं। राहुल गांधी लगातार कहते रहे हैं कि संगठन में दलित, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समाज के कार्यकर्ताओं को उनकी आबादी के अनुपात में भागीदारी मिलनी चाहिए। क्या कोटा शहर और कोटा देहात की कार्यकारिणी में इस सोच को प्राथमिकता दी गई?
इसका जवाब कांग्रेस के संगठन सृजन और जिला अध्यक्षों के प्रशिक्षण शिविर की जिम्मेदारी संभालने वाले दिल्ली में बैठे कार्यक्रम के प्रमुख सचिन राव ही बेहतर दे सकते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेख उनके निजी विचार हैं।)

















