
ग़ज़ल
-शकूर अनवर-
अपने क़ातिल से कहूॅंगा कोई हथियार उठा।
दस्ते-नाज़ुक* से मेरे वास्ते तलवार उठा।।
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मैं तो कहता हूॅं कि दिल में कोई नफ़रत न रहे।
घर में दीवार उठाना है तो दीवार उठा।।
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आज फिर शहरे-ख़मोशाॅं* में बड़ी रौनक़ है।
कौन बस्ती से मेरी साहिबे-किरदार* उठा।।
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जब भी मंसूर* कोई बनके यहाँ आया है।
एक हंगामा पसे-क़त्ल* सरे-दार* उठा।।
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लोग सब नेक अमल साथ लिये जाते हैं।
उसकी रहमत के सहारे मैं गुनहगार उठा।।
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शोला ए इश्क़* सियापोश* मेरा होना था।
दोस्तो दिल से धुऑं फिर मेरे बेकार उठा।।
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बेरुख़ी* आज मेरे दिल में तेरी बैठ गई।
यूँ तो उठने को तेरी बज़्म से सौ बार उठा।।
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हसरते- दीद* में “अनवर” न सहर* हो जाये।
शब का पर्दा न उठे पर्दा ए दीदार* उठा।।
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दस्ते-नाज़ुक*कोमल हाथ
शहरे-ख़मोशा*कब्रिस्तान
साहिबे-किरदार*चरित्रवान व्यक्ति
मंसूर*एक संत जिन्हें मौत की सजा दी गई
पसे-क़त्ल*क़त्ल के बाद
सरे-दार*सूली के समक्ष
शोला ए इश्क़ यानी प्रेम का शोला
सिया पोश*काला पड़ना
बेरुख़ी*नाराज़गी
हसरते-दीद*दर्शन की इच्छा
सहर* सुबह
पर्दा ए दीदार*दर्शन का पर्दा
शकूर अनवर
9460851271

















