
ग़ज़ल
शकूर अनवर
तुलूए-सुबह* का पैकर* अलग है।
वही है आसमाॅं मंज़र* अलग है।।
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अभी तो दूर है मंज़िल भी यारो।
फिर आगे रास्ता बंजर अलग है।।
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है उसकी ऑंख में ग़ुस्सा ग़ज़ब* का।
फिर उसके हाथ में पत्थर अलग है।।
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तुझे सुनना ही होगा ऐ सितम गर*।
शिकायत का कहीं दफ़्तर अलग है।।
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तुम्हारे सामने तो चुप ही अच्छे।
तुम्हारा इक इशारा सर अलग है।।
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ॲंधेरे साॅंप जैसे लग रहे हैं।
फिर इस पर साॅंप का भी डर अलग है।।
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हमारी चाल शतरंजी* न समझो।।
हमारा बाॅंकपन “अनवर” अलग है।।
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पैकर*शक्ल, चेहरा, बिम्ब
तुलूए-सुबह*प्रात: काल होने का समय
मंज़र*दृश्य
ग़ुस्सा ग़ज़ब का*बहुत तेज़ क्रोध
सितमगर*ज़ुल्म करने वाला प्रेमिका
शतरंजी*शतरंज की तरह
शकूर अनवर
9460851271

















