स्टार किड्स की जिंदगी अभिशप्त होती है!

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प्रतीकात्मक फोटो
-दिलीप कुमार-
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सिनेमा में चकाचैंध की दुनिया लोगों को खूब आकर्षित करती है. जाहिर है! ग्लैमर आदमी को अपनी तरफ खींचता है. वहीँ कोई गरीब बच्चा सामान्य जीवन का ख्वाब देखता है, तो समान्य जीवन के बच्चों में एक कमतरी का भाव होता है, हमेशा से ही सामान्य बच्चों में स्टार किड्स की ज़िन्दगी का एक ग़ज़ब का मनोवैज्ञानिक खिंचाव होता है, वो खिंचाव लाइमलाइट, अनावश्यक रूप से भौतिक सुखों को लेकर एक आर्कषण होता है. वहीँ इस आकर्षण का अध्ययन करने पर पाते हैं, कि स्टार किड्स का जीवन अभिशाप ही होता है, उनके पास निजी जैसा कुछ नहीं होता. बड़े माता पिता के बच्चों में भौतिक सुख के अलावा कोई दूसरी चीज़ नहीं होती, जिसको असलियत में सुख कहा जाए !! सुख की अपनी जरूरतें भी होती हैं किसी को कुछ चाहिए तो किसी को कुछ चाहिए… वैसे तो किसी को मुक्कमल जहां नहीं मिलता.
मैंने हमेशा गौर किया है, शाहरुख खान का बेटा हमेशा से ही मीडिया से दूर भागता है, बातेँ नहीं करना चाहता, लेकिन आम लड़कों में प्रसिद्धी की ग़ज़ब भूख होती हैं, लोकप्रियता के लिए सोशल मीडिया पर तरह तरह के प्रयोग करते हैं..वहीँ आज ऐसे करोड़ों लड़के हीरो बनने का ख्वाब रखते होंगे.. उनके पिता इतने प्रभावशाली होते तो शायद कोई भी लड़का हीरो बनने के लिए लॉन्च हो चुका होता, शाहरुख के बेटे के चेहरे पर तमाम उलझने दिखती हों, वैसे भी शाहरुख खान का बेटा जिस दौर से गुजरा है, कोई साधारण पिता का बेटा होता तो, शायद आत्महत्या कर लेता या, पागल हो जाता… या फिर सिस्टम के हाथो शहीद हो जाता, लेकिन उसे पता है कि वो शाहरुख खान का बेटा है, इसलिए उसने बड़े बाप का बेटा होने की कीमत अदा की.. फिर भी वो पिता की राह पर हीरो बनने के मामले में समझदार लगा, उसने ऐक्टिंग न करने का निर्णय लिया है.. उसने कहा है “मैं कितना बड़ा हीरो बन जाऊँ, मुझे हमेशा मेरे पापा के साथ कंपेयर किया जाएगा… लेकिन मुझे लगता है कि मैं उनसे बड़ा हीरो नहीं बन सकता, इसलिए मुझे अपना दूसरा रास्ता तलाशना चाहिए.
बड़े बाप के बच्चों में हमेशा से ही शिष्ट आचरण करने की जिम्मेदारी होती है.. आज देश की पीढ़ी बदल रही है, बदल ही गई है, वहीँ स्टार किड्स पर दबाव होता है, उन्हें समझाने से ज्यादा नसीहतों का बोझ मिलता है, कि आपको मीडिया के सामने झुककर प्रस्तुत होना हैं, अब वो लड़का /लड़की अपनी छोटी सी उम्र सम्भाले या बड़े माता पिता का स्टारडम… क्योंकि वो भौतिक सुख की कीमत चुका रहा है..
समाज़ में अपने आसपास देखते हैं, बाप कोई रसूखदार भी न हो.. कोई राजनेता न हो, कोई बहुत बड़ा प्रभावशाली भी न हो, वहीँ उसका पिता कोई अच्छी नौकरी में हो, तो, अधिकांश बच्चे बदगुमान हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि उनकी लाइफस्टाइल अमीरी वाली है, वो इसलिए कि आम लोगों का भी बिहेवियर बदल ही जाता है, कुछ लोगों को छोड़कर हम सब ऐसे ही होते हैं…बदगुमानी का आलम ऐसा कि समाज एक – दूसरे से कटा हुआ है, हम भले ही अपने थोड़ा कमज़ोर रिश्तेदारों को अपनी पार्टी में न बुलाते हों, वहीँ हमें कोई सेलिब्रिटी इग्नोर कर दे तो हम उसे घमंड कहने लगते हैं. हम कंही आईना देखते ही नहीं है कि हमने अपने से कमज़ोर लोगों को कब इज्ज़त दी है? हम सभी को खुद से पूछना चाहिए.
आम तौर पर हमारे माता पिता कितने ही उदारवादी क्यों न हों लेकिन उन्होंने कभी – न कभी हमें ज़िन्दगी की सच्चाईयों से अवगत कराने के लिए कभी न कभी बोला ही होगा, और बोलते ही हैं, कि हम नहीं होंगे तो तुम्हारा क्या होगा?
आम तौर पर समाज में हम सब माता – पिता की ऐसी नसीहतों को अपने लिए उनके संस्कार, तालीम मानते हैं, लेकिन यही बात स्टार माता पिता अपने बच्चों बोलते होंगे, और कोई भी माता पिता ऐसा नहीं होता जो बच्चों को ऐसे कभी – कभार सच्चाई न दिखाता हो !! जब स्टार किड्स यह अपवाद स्वरुप अपने माता पिता से यह कड़वी सच्चाई सुनते होंगे तो ज़िन्दगी की उल्लास मर जाती होगी, और बचपन से ही मिल रहे ताने चस्पा कर जाते होंगे, कि हम किसी लायक नहीं हैं..
आम तौर पर आम जनजीवन जिया न भी जाए तो उसे नजदीक से देखने समझने की जरूरत होती है, बहुत सी बातेँ किताबों, फ़िल्मों से समझ नहीं आती, वहीँ स्टार किड्स बेचारे लग्ज़री लाइफ जीने के आदि कहिए या ज़िन्दगी के प्रोटोकॉल, इनके कारण दुनिया भी नहीं देख पाते… दुनिया देखने के नाम पर क्लब, पार्टी से ज्यादा कोई अनुभव नहीं होता.. संघर्ष नाम की चीज़ पता नहीं होती.. होते होंगे कोई अपवाद स्वरुप जिन्हें ज़िन्दगी जीने, से ज्यादा समझने की जरूरत होती होगी, तो प्रोटोकॉल तोड़ते भी होंगे, लेकिन 98% स्टार किड्स को ज़िन्दगी के असल सच पता नहीं होते, मै समझता हूं इसमें उनकी कोई गलती नहीं होती है!
हम सब का लॉक डाउन अभी हाल के सालों में हुआ था, तो ज़िन्दगी से तंग आ गए थे, लेकिन स्टार किड्स का लॉक डाउन कभी खत्म ही नहीं होता. उनकी ज़िन्दगी हमेशा से ही नसीहतों, एवं प्रोटोकॉल में गुज़रती है.. ज़िन्दगी में हम सब परिवारवादी होते हैं, माता – पिता की संपत्ति पर हम सब अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं, जन्म, शिक्षा, व्यपार, बिजनैस, आदि सभी क्षेत्रों में अवसरवाद, रिश्वत का खूब बोलबाला होता है.. वहीँ स्टार किड्स पर हम सख्त हो जाते हैं.. कोई भी स्टार किड्स आसानी से प्लेटफॉर्म तो पा लेता है, लेकिन उसे खुद को स्थपित करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने होते हैं, वहीँ समीक्षक बहुत सख्त होते हैं. सच कहा जाए तो स्टार किड्स की ज़िन्दगी अभिशाप होती है, वहीँ भौतिक सुख के अलावा ऐसा कुछ नहीं है, जो असल सुख कहा जाए !! वहीँ इन भौतिक सुखों के लिए महँगी कीमत चुकानी पड़ती है, मेरा कहना है कि किसी का मूल्यांकन कुंठित होकर नहीं किया जा सकता.. कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अधिकांश स्टार किड्स माता – पिता की परछाई से निकल ही नहीं पाते ! वैसे कोई भी पूरी तरह से अपनी नाकामियों का बोझ सिस्टम, भ्रष्टाचार, परिवारवाद आदि पर डालता है तो, वो मुझे सबसे ज्यादा कुंठित समझ आता है. जीवन बहुत क्रूर होता है.. हम जितना समझते हैं वह सच नहीं होता.. बहुत कुछ समझने की दरकार है..
(देवेन्द्र सुरजन की वाल से साभार)
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