यदापि पोष मातरं पुत्ररू प्रभुदितो धयान्। इतदगे अनृणो भवाम्यहतौ पितरौ ममां॥

old age
photo courtesy pixabay.com

-एडवोकेट किशन भावनानी-

यह समझने की जरूरत है कि वरिष्ठ नागरिक, वृद्धजन, बड़े बुजुर्ग हमारे समाज की अनमोल विरासत होते हैं। उन्होंने अपने समाज और देश को बहुत कुछ दिया है। वह हमारी धरोहर हैं, अनुभवों का एक ख़जाना है, जो किसी भी देश की उन्नति के लिए मूल्यवान मंत्र है। जिसका सही दिशा में उपयोग किया जाए तो उस देश को सामाजिक-आर्थिक नैतिक संपन्नता से नवाज़ने से कोई नहीं रोक सकता क्योंकि उनके अनुभवों के साथ उनका आशीर्वाद भी काम करता है। बचपन से ही हमें घर में शिक्षा दी जाती है कि बड़ो का सम्मान करना चाहिए। लेकिन आज के समय में ये मात्र औपचारिकता रह गई है। प्रति वर्ष 1 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस मनाया जाता है। फिलहाल अब हालात काफी बदल गए हैं। कई मामलों में वृद्धजनों को अपनी संतानों द्वारा मुश्किलें और दिक्कतें झेलते देखा गया है, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस के जरिए बुजुर्गों को सम्मान दिलाए जाने के लिए जागरुकता अभियान चलाए जाते हैं।

किशन सनमुखदास भावनानी

एक पेड़ जितना ज्यादा बड़ा होता है, वह उतना ही अधिक झुका हुआ होता है, यानें वह उतना ही विनम्र और दूसरों को फल देने वाला होता है। यही बात समाज के उस वर्ग के साथ भी लागू होती है, जिसे आज की तथाकथित युवा तथा उच्च शिक्षा प्राप्त पीढ़ी बूढ़ा कहकर वृद्धाश्रम में छोड़ देती है। वह लोग भूल जाते हैं कि अनुभव का कोई दूसरा विकल्प दुनिया में है ही नहीं। अनुभव के सहारे ही दुनिया भर में बुजुर्ग लोगों ने अपनी अलग दुनिया बना रखी है। जिस घर को बनाने में एक इंसान अपनी पूरी जिंदगी लगा देता है, वृद्ध होने के बाद उसे उसी घर में एक तुच्छ वस्तु समझ लिया जाता है। बड़े बूढ़ों के साथ यह व्यवहार देखकर लगता है जैसे हमारे संस्कार ही मर गए हैं। बुजुर्गों के साथ होने वाले अन्याय के पीछे एक मुख्य वजह सामाजिक प्रतिष्ठा मानी जाती है। सब जानते हैं कि आज हर इंसान समाज में खुद को बड़ा दिखाना चाहता है और दिखावे की आड़ में बुजुर्ग लोग उसे अपनी सुंदरता पर दाग़ दिखते हैं। यही रुढ़िवादी सोच उच्च वर्ग से मध्यम वर्ग की तरफ चली आती है।
हम भारत में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के लिए भरण पोषण और कल्याण (संशोधन) विधेयक 2019 की करें तो यह 11 दिसंबर 2019 को लोकसभा में पेश किया गया था, सामाजिक न्याय और अधिकारिता संबंधी स्थाई समिति की रिपोर्ट 29 जनवरी 2021 को लोकसभा में प्रस्तुत की गई थी अभी मानसून सत्र में शेड्यूल किया गया था। इसमें वृद्धजनों का जीवन सुरक्षित करने संबंधी अनेक प्रकार के प्रावधान हैं जिसमें बच्चों की परिभाषा में बदलाव, नाबालिक बच्चों का शामिल करना, माता पिता की परिभाषा में सांस सुर, दादा दादी, नाना नानी को शामिल करना, भरण पोषण में स्वास्थ्य देखभाल बचाव और सुरक्षा को शामिल करना है ताकि गरिमापूर्ण जीवन जी सकें इत्यादि अनेक सुधार इस संशोधन के माध्यम से किए गए हैं।
बुजुर्गावस्था हर इंसान के जीवन का एक पड़ाव है। इस समय में व्यक्ति को प्यार सम्मान और अपनेपन की सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है। जिन लोगों पर बुजुर्गों का साया होता है वे लोग बहुत भाग्यशाली होते हैं। बुजुर्ग ही हमें जीवन जीने का सही मार्ग सिखाते हैं। उनके अनुभव और सीख से जीवन में हम किसी भी कठिनाई को पार करने में सक्षम होते हैं।
हमारे शास्त्रों में भी बुजुर्गों का सम्मान करने की राह दिखलायी गई है। यजुर्वेद का निम्न मंत्र संतान को अपने माता-पिता की सेवा और उनका सम्मान करने की शिक्षा देता है-
यदापि पोष मातरं पुत्ररू प्रभुदितो धयान्।
इतदगे अनृणो भवाम्यहतौ पितरौ ममां॥
अर्थात् जिन माता-पिता ने अपने अथक प्रयत्नों से पाल पोसकर मुझे बड़ा किया है, अब मेरे बड़े होने पर जब वे अशक्त हो गये हैं तो वे श्जनक-जननीश् किसी प्रकार से भी पीड़ित न हों, इस हेतु मैं उसी की सेवा सत्कार से उन्हें संतुष्ट कर अपा आनृश्य (ऋण के भार से मुक्ति) कर रहा हूँ।
वृद्धजन दिवस के इतिहास की करें तो, सन् 1990 में अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस मनाने की शुरुआत की गई थी। बुजुर्गों के साथ होने वाले दुर्व्यव्हार और अन्याय पर रोकथाम के लिए यह दिवस मनाने का निर्णय किया गया था। 14 दिसंबर सन् 1990 में 1 अक्टूबर के दिन हर वर्ष अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस या अंर्तराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस मनाने का फैसला किया गया। 1 अक्टूबर सन 1991 में पहली बार अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस मनाया गया। इस दिवस की शुरुआत के बाद सन् 1999 को बुजुर्ग वर्ष के रुप में मनाया गया।

-संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी 

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