-मनु वाशिष्ठ-

एक मित्र कार का ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने गए, सामने लंबी कतार देख घबरा कर लौट आए।बोले, अरे भाई बहुत लंबी लाइन थी खड़े रहता तो दो घंटे भी नंबर नहीं आना था। कहने लगे आप को तो बहुत लोग जानते हैं, आपका कोई #जुगाड़ है क्या? हमने इंकार में सिर हिलाया नहीं भाई हमारा कोई जुगाड़ नहीं है। कहीं जाना हो तो ट्रेन में रिजर्वेशन के लिए जुगाड़, नौकरी में इंटरव्यू से लेकर गैस सिलेंडर तक के लिए जुगाड़ में रहते हैं कुछ लोग, उनका काम बिना जुगाड़ के चल ही नहीं सकता। इस जुगाड़ से उन्हें एक प्रकार की आनंद की अनुभूति होती है।
हमारे पड़ौसी शर्मा जी बारिश को देख कर बोले, अरे यार लॉन में स्टैंड वाला आउटडोर गार्डन छाता लगवाना है, जिससे बारिश में चाय पीने का आनंद ले सकें। हमने कहा खरीद लेते हैं तो तुरंत बोले, नहीं भाई खरीद कर नहीं, कुछ जुगाड़ करते हैं पैसे खर्च कर लगवाने में मजा नहीं है, फलां की एजेंसी है … फलां से बात करता हूं आदि आदि… माना कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है, इस बात को सब अच्छी तरह जानते हैं, लेकिन हर छोटी बड़ी चीज के लिए भी जुगाड़ की कहां जरूरत है। आपके पास कुछ उपलब्ध नहीं है, तो भी किसी इच्छित वस्तु से किस तरह लाभ प्राप्त किया जाए, इस प्रक्रिया में जुगाड़ प्रबंधन में हम भारतीयों का कोई सानी है। जुगाड़ का मतलब है, हींग लगे ना फिटकरी रंग चोखा, किसी कठिन ना हो सकने वाले कार्य को येन केन प्रकरेण करने की युक्ति। जुगाड़ कई रूपों में देख सकते हैं, कई बार मेहनत से बचने के लिए जुगाड़ तो कई बार मेहनत से नई अविष्कार।
बचपन में दूरदर्शन पर “एक, अनेक और एकता पर संदेश देता एक गाना आता था।
एक चिड़िया अनेक चिड़ियां …
एक चिड़िया अनेक चिड़ियां… एक एक करके दाना चुगने बैठ गई थीं।
वहां पर व्याध (शिकारी) ने जाल बिछाया…
व्याध? व्याध कौन ? फिर क्या हुआ?
क्या व्याध ने चिड़ियों को पकड़ लिया?
नहीं…
सब हो गए एक, बन गई ताकत…
अगर सब एक हो जाएं
तो बड़ा काम कर सकते हैं?
हां हां क्यों नहीं …
पर कोई #जुगत/जुगाड़ लगानी होगी
और सब चिड़ियां जाल को लेकर उड़ गईं…
इससे आगे क्या हुआ सब जानते हैं, चिड़ियां किस तरह आजाद हो गईं। ये तो थी बच्चों को समझाने वाली कहानी। लेकिन ये #जुगत/जुगाड़ हम भारतीयों के मानस, डी एन ए में अच्छी तरह मिला हुआ है। अभी कुछ समय पहले जुगाड़ पर अमृत पाल के भागने की फोटो वायरल हुई तो याद आया जुगाड़! मुझे भी बचपन में यू पी, राजस्थान में जुगाड़ शब्द सुनने में आया, उस समय (जुगाड़/जौंगा, कई लोग जौंगा भी बोलते थे) पूछने पर पता चला कि कबाड़ मोटरसाइकिल या पंपिंग सेट इंजन के प्रयोग से बनी सस्ती गाड़ी जुगाड़ के नाम से जानी जाती है, जो गांवों, कस्बों आदि में माल ढोने सवारियों के आवागमन आदि के लिए प्रयोग की जाती है। कई बार हादसों के लिए भी जिम्मेदार होती हैं ये जुगाड़ गाड़ी। फिर भी दाद देनी चाहिए इन दिमाग की। अब कहीं पर देसी जुगाड़ से बाइक एंबुलेंस से मरीज दिखाना आसान हो रहा है, तो कहीं मोटरसाइकिल पर ट्रॉली लगाकर सब्जी/सामान बेची जा रही है, ये सब आम बातें हैं। घरों में मम्मियां भी कम जुगाड़ू नहीं होती, पुरानी साड़ियों से दरी/चादर बनवाना भी जुगाड़ ही है। ये मिक्सी का ढक्कन नहीं होने पर प्लेट लगा कर चलाने का जुगाड़ बखूबी जानती हैं। इन्हीं मम्मियों का कार के टायर से सिटिंग मुड्ढा #पफी बना देना या उनमें सब्जियां, फूल खिला देने का जुगाड़ भी प्रशंसनीय है। हमारे देश में जुगाड़ू लोगों की कमी नहीं है जो हर काम को आसान करने के लिए अपने दिमाग से ऐसे ऐसे प्रयोग करते रहते हैं कि टेक्नोलॉजी भी चकित रह जाए कि यह हुआ कैसे? कबाड़ टाटा नैनो से जुगाड़ हैलीकॉप्टर बना दिया जाय तो आश्चर्य होगा ही। ये जुगाड़ू बिना किसी डिग्री डिप्लोमा के बड़े काम के आविष्कार कर जाते हैं, अभी नेट पर देखा एक व्यक्ति इलेक्ट्रिक स्कूटर नहीं खरीद सका तो उसने सोलर साइकिल बना ली।
जुगाड़ कला भी है और विज्ञान भी, कला इसलिए कि प्रथम जुगाड़ जुटाना फिर लगाना, किस काम में क्या जुगाड़ लगेगा यह सारी प्रक्रिया किसी रचनात्मक क्रिया से कम नहीं है, और विज्ञान इसलिए कि जो कार्य और किसी भी तरकीब से संभव नहीं है वह एक झटके में जुगाड़ से हो जाता है। जहां सब कुछ विफल हो जाए वहीं जुगाड़ काम आता है। मेरे हिसाब से जुगाड़ भी तीन तरह का होता है, एक तो किसी का वाचिक सहयोग (जान पहचान का फायदा लेना), दूसरा अर्थ यानि धन राशि देकर अपना काम निकलवाना (सेवाभाव, वस्तु या अर्थ यानि धन का विनिमय संभव हो), जिससे मुट्ठी चुपके से गर्म की जा सके, तीसरा है बेकार चीजों से नव निर्माण करना।
इसके अलावा जुगाड़ का साधारण जीवन में किसी चीज के अभाव में बिना उसे खरीदे उसका इस्तेमाल करना है जैसे कि कान साफ करने हेतु तीली या हेयर पिन का इस्तेमाल, पुराने फ्रिज को किताबों के रखने की अलमीरा बना देना, टीशर्ट से गाड़ी साफ करना, पुरानी शर्ट से छोटा ड्रेस बना देना, चप्पल की पट्टी बटन टूटने पर सेफ्टी पिन का प्रयोग। ये सब जुगाड़ की पराकाष्ठा हैं। कुल मिलाकर हमारे जीवन में सुबह से शाम तक जुगाड़ ही जुगाड़ है। कार्य साधन का मार्ग, व्यवस्था बिठाने का नाम है जुगाड़। ऐसे सभी जुगाड़ुओं को एक सैल्यूट तो बनता है।
__ मनु वाशिष्ठ, कोटा जंक्शन राजस्थान

















