अब ऐसे जनप्रतिनिधि कहां…

मैं लखावत जी को नाम और कृतित्व से जानता था—इतिहास के विद्वान, वकील, राजनेता और भाजपा संगठन में अहम भूमिका निभाने वाले व्यक्तित्व के रूप में। लेकिन व्यक्तिगत मुलाकात कभी नहीं हुई थी। पंचोली जी ने राहुल जी और मुझे उनसे मिलने का प्रस्ताव दिया। चुनौती थी—सोमवार सुबह सात बजे, सर्दी और कोहरे के बीच।

whatsapp image 2026 01 05 at 19.09.24

— एक पत्रकार की डायरी 

-शैलेश पाण्डेय-

जीवन में कुछ मुलाक़ातें ऐसी होती हैं, जो खबर से आगे जाकर स्मृति बन जाती हैं। आप उनसे इसलिए नहीं जुड़ते कि वे किसी पद पर हैं, बल्कि इसलिए कि उनके व्यक्तित्व में सादगी, विद्वता और मानवीय गरिमा का दुर्लभ संतुलन होता है। ऐसे ही लोगों से मिलकर यह सवाल मन में उठता है—अब ऐसे जनप्रतिनिधि कहां हैं?
वरिष्ठ पत्रकार धीरेन्द्र राहुल, पुरुषोत्तम पंचोली और मैं—रविवार की रात तेज सर्दी और घने कोहरे के बीच अपने चाय के ठिये पर बैठे थे। परिजनों की चिंता और मौसम की चेतावनी के बावजूद यह बैठक हुई। उस समय किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यह चाय एक यादगार सुबह की भूमिका बन जाएगी। पंचोली जी के मोबाइल पर राजस्थान विरासत संरक्षण एवं संवर्धन प्राधिकरण के अध्यक्ष ओंकार सिंह लखावत का एक वीडियो आया—कोटा हाड़ौती ट्रैवल मार्ट के समापन समारोह का। उसी क्षण बातचीत ने दिशा बदली।

00
मैं लखावत जी को नाम और कृतित्व से जानता था—इतिहास के विद्वान, वकील, राजनेता और भाजपा संगठन में अहम भूमिका निभाने वाले व्यक्तित्व के रूप में। लेकिन व्यक्तिगत मुलाकात कभी नहीं हुई थी। पंचोली जी ने राहुल जी और मुझे उनसे मिलने का प्रस्ताव दिया। चुनौती थी—सोमवार सुबह सात बजे, सर्दी और कोहरे के बीच। शर्त एक ही थी—रामपुरा में शंभू जी की दूध-जलेबी।
सोमवार सुबह, जब हम भाजपा नेता एल.एन. शर्मा के साथ उम्मेद भवन पैलेस होटल पहुंचे, तो लखावत जी पहले से प्रतीक्षा में थे। आठ बजे जयपुर रवाना होना था, लेकिन बातचीत ने समय को जैसे थाम लिया। यह कोई औपचारिक साक्षात्कार नहीं था, बल्कि विचारों का सहज संवाद था। विद्वता ऐसी कि हर उत्तर के पीछे अध्ययन और शोध झलकता था, और विनम्रता ऐसी कि सामने बैठे सामान्य पत्रकार को भी बराबरी का सम्मान।
लखावत जी ने स्वयं कहा कि अपने शिक्षाकाल में जितना समय उन्होंने पुस्तकों को नहीं दिया, उससे अधिक इतिहास आर्काइव में राजस्थान की विरासत के तथ्य जुटाने में लगाया। यह कथन आत्मप्रशंसा नहीं था—उनकी बातों से यह साफ झलक रहा था। कृष्ण गमन पथ, राजस्थान की धरोहर, कोटा में पर्यटन की संभावनाएं, मथुराधीशजी कॉरिडोर, पैनोरमा और 1857 के क्रांतिकारियों तक—हर विषय पर तैयारी और स्पष्ट दृष्टि।

हम तीनों ने सवालों की झड़ी लगा दी। वे मुस्कुराते रहे और एक-एक प्रश्न का उत्तर देते चले गए। कहीं भी बचाव नहीं, कहीं भी टालमटोल नहीं—बल्कि ऐसा प्रत्युत्तर कि असहमति की गुंजाइश कम रह जाए। पहली बार ऐसा लगा कि सामने बैठा व्यक्ति साक्षात्कार को भी उतना ही एंजॉय कर रहा है, जितना हम। इसी बातचीत में उनका नाश्ता छूट गया, लेकिन हमें चाय पिलाना नहीं भूले।

उस सुबह का ज्ञान और आनंद रामपुरा में शंभू जी की गर्मागर्म दूध-जलेबी ने और गाढ़ा कर दिया। राहुल जी और पंचोली जी—दोनों अपनी-अपनी विधा के सिद्ध पत्रकार—साथ हों तो सीख अपने आप मिलती है। उनकी खिंचाई, अनुभव और दृष्टि किसी भी पत्रकार के लिए प्रशिक्षण जैसी होती है। अंता चुनाव की रिपोर्टिंग में यह पहले भी महसूस किया था।
इस पूरी मुलाकात ने एक बात फिर याद दिला दी—राजनीति में आज भी ऐसे लोग हैं, जो सत्ता से पहले संस्कार को महत्व देते हैं। लेकिन सच यह भी है कि ऐसे जनप्रतिनिधि अब उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। शायद इसी कमी के कारण ऐसी मुलाकातें खबर नहीं, कॉलम बन जाती हैं।

Advertisement
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments