
-मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव ने खड़े किए बड़े सवाल
-देवेंद्र यादव-

कांग्रेस का जमीनी कार्यकर्ता तो मजबूत है, मगर संगठन में बड़े-बड़े पदों पर बैठे नेता कमजोर नजर आते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के दौरान देखने को मिला, जहां कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रभारी हरीश चौधरी राजनीतिक रणनीति, समझ और परिपक्वता के मामले में असफल दिखाई दिए।
हरीश चौधरी लंबे समय से विभिन्न राज्यों के प्रभारी बनते रहे हैं। यदि उनके प्रभार वाले राज्यों का राजनीतिक रिकॉर्ड देखा जाए, तो उपलब्धियों की तुलना में कांग्रेस को अधिक निराशा ही हाथ लगी है।
मीनाक्षी नटराजन का पर्चा खारिज, भाजपा निर्विरोध विजयी
पंजाब के बाद हरीश चौधरी को मध्य प्रदेश का राष्ट्रीय प्रभारी बनाया गया था। मध्य प्रदेश में राज्यसभा की तीन सीटों पर चुनाव होना था। इनमें से एक सीट पर कांग्रेस आराम से जीत दर्ज कर सकती थी, लेकिन कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र खारिज हो गया और भाजपा निर्विरोध चुनाव जीत गई।
कांग्रेस ने भाजपा पर सीट “चोरी” करने का आरोप लगाया तथा चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक न्याय की गुहार लगाई, लेकिन अंततः उसे निराशा ही हाथ लगी।
यहां सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस के भीतर बड़े पदों पर बैठे नेताओं में राजनीतिक रणनीतिक समझ और परिपक्वता का अभाव है? क्या कांग्रेस नेतृत्व भाजपा के रणनीतिकारों की चालों का पूर्वानुमान लगाने में सक्षम नहीं है? यदि ऐसा होता, तो शायद मीनाक्षी नटराजन का नामांकन पत्र खारिज होने जैसी स्थिति पैदा नहीं होती।
इंदौर से राज्यसभा तक, क्या कांग्रेस ने सबक नहीं लिया?
मध्य प्रदेश में कांग्रेस पहले भी ऐसा राजनीतिक घटनाक्रम देख चुकी है। इंदौर लोकसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी ने नामांकन वापस ले लिया था और भाजपा उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो गया था।
भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय तब भी सक्रिय रणनीतिकार थे और आज भी हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि मध्य प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व और राष्ट्रीय प्रभारी हरीश चौधरी, एक बार फिर कैलाश विजयवर्गीय की राजनीतिक रणनीति को समझने में नाकाम रहे।
बड़े राज्यों में छोटे नेताओं को प्रभारी बनाने की रणनीति पर सवाल
यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि जिन राज्यों में कांग्रेस के भीतर बड़े और कद्दावर नेता मौजूद हों, वहां अपेक्षाकृत कम अनुभव वाले नेताओं को प्रभारी बनाकर भेजना आखिर किस राजनीतिक सोच और रणनीति का हिस्सा है?
कांग्रेस को इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करना होगा कि राज्यों की राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप ही नेतृत्व और प्रभारियों का चयन किया जाए।
बिहार में बदलाव का प्रयोग भी नहीं आया काम
पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बिहार में बुरी तरह पराजित हुई। चुनाव से ठीक पहले पार्टी ने वरिष्ठ नेता मोहन प्रकाश को प्रभारी पद से हटाकर युवा नेता कृष्णा अल्लावरु को बिहार कांग्रेस का राष्ट्रीय प्रभारी बनाया था।
हालांकि इस बदलाव से कांग्रेस को कोई राजनीतिक लाभ नहीं मिला और पार्टी चुनाव में अपेक्षित प्रदर्शन करने में विफल रही।
कांग्रेस संगठन में पदाधिकारियों की बढ़ती संख्या भी चिंता का विषय
मैं अपने ब्लॉग में कई बार लिख चुका हूं कि कांग्रेस के भीतर रोज-रोज होने वाली नियुक्तियों पर विराम लगना चाहिए और संगठन में एकमुश्त व्यापक फेरबदल किया जाना चाहिए।
यदि कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी पर नजर डालें, तो शायद पार्टी के गौरवशाली इतिहास में कभी इतनी बड़ी संख्या में राष्ट्रीय पदाधिकारी नहीं रहे होंगे। आज लगभग 70 राष्ट्रीय सचिव और सह-सचिव हैं। यह संख्या इतनी अधिक है कि संभवतः कई राष्ट्रीय पदाधिकारी एक-दूसरे को न तो जानते होंगे और न ही पहचानते होंगे।
राष्ट्रीय कार्यकारिणी को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो किसी छोटे संगठन या ब्लॉक स्तर की इकाई का विस्तार कर दिया गया हो। नियुक्तियों की प्रक्रिया भी कई बार ऐसी दिखाई देती है जैसे किसी गली-मोहल्ले की संस्था में पद बांटे जा रहे हों।
राहुल गांधी को संगठनात्मक सर्जरी की जरूरत
समय आ गया है कि राहुल गांधी सबसे पहले कांग्रेस की वर्तमान राष्ट्रीय कार्यकारिणी को भंग कर नई कार्यकारिणी का गठन करें। नई टीम में केवल मजबूत, अनुभवी और चुनिंदा नेताओं को स्थान दिया जाए।
साथ ही, रोज-रोज की जाने वाली नियुक्तियों की परंपरा पर विराम लगाकर संगठन को अधिक प्रभावी, जवाबदेह और परिणामोन्मुख बनाया जाए। यदि कांग्रेस को भविष्य में भाजपा जैसी संगठित राजनीतिक मशीनरी का मुकाबला करना है, तो उसे पहले अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करना होगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

















