
राजस्थान से नीरज डांगी को लगातार दूसरी बार राज्यसभा भेजे जाने और पवन खेड़ा को कर्नाटक से उम्मीदवार बनाए जाने के बाद कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति पर नए सवाल खड़े हो गए हैं। क्या यह सब अशोक गहलोत की राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है, या फिर पार्टी नेतृत्व की कोई व्यापक सोच? यही सवाल इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में है।
-देवेंद्र यादव-

राजस्थान कांग्रेस में चर्चा की शुरुआत नीरज डांगी को लगातार दूसरी बार राज्यसभा का प्रत्याशी बनाए जाने से हुई थी, लेकिन अब यह चर्चा पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत के हालिया बयान पर आकर अटक गई है। हालांकि, अपने इस ब्लॉग में मैं चर्चा की शुरुआत इसी सवाल से करूंगा कि आखिर कांग्रेस ने राज्यसभा सांसद नीरज डांगी को लगातार दूसरी बार राजस्थान से उम्मीदवार क्यों बनाया?
क्या नीरज डांगी को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रत्याशी बनवाया, या फिर यह अशोक गहलोत की वही राजनीतिक शैली है, जिसके चलते वे अपने खास सिपहसालार नीरज डांगी को दूसरी बार राज्यसभा भेजने में सफल रहे?
राजस्थान से राज्यसभा जाने के लिए प्रदेश और प्रदेश से बाहर के लगभग एक दर्जन नेता उम्मीद लगाए बैठे थे कि पार्टी हाईकमान उन्हें उम्मीदवार बनाएगा। इनमें कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता पवन खेड़ा और पूर्व केंद्रीय मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह जैसे नाम प्रमुख थे। माना जा रहा था कि राहुल गांधी पवन खेड़ा को राजस्थान से राज्यसभा भेजना चाहते हैं, लेकिन पवन खेड़ा, जो स्वयं राजस्थान से संबंध रखते हैं, उन्हें कर्नाटक से राज्यसभा का प्रत्याशी बनाया गया। वहीं, राजस्थान से नीरज डांगी को दोबारा मौका मिला।
यह सवाल स्वाभाविक है कि पवन खेड़ा को राजस्थान की बजाय कर्नाटक से उम्मीदवार क्यों बनाया गया? आखिर उन्हें राजस्थान से उम्मीदवार बनने से कौन रोक सकता था, जबकि उन्हें राहुल गांधी की पसंद माना जाता है। क्या पवन खेड़ा को कर्नाटक से उम्मीदवार बनवाने में मल्लिकार्जुन खड़गे की भूमिका रही, क्योंकि वे स्वयं कर्नाटक से आते हैं? या फिर यह भी कांग्रेस के “चाणक्य” कहे जाने वाले अशोक गहलोत की कोई राजनीतिक रणनीति है?
केसी वेणुगोपाल की भूमिका भी चर्चा में
पवन खेड़ा को कर्नाटक और नीरज डांगी को राजस्थान से राज्यसभा प्रत्याशी घोषित करने में कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल की क्या भूमिका रही, यह भी राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय है। वेणुगोपाल को अशोक गहलोत का करीबी माना जाता है और लंबे समय से यह धारणा रही है कि गहलोत अपने राजनीतिक हितों को साधने में उनकी मदद लेते रहे हैं।
एक और दिलचस्प सवाल यह है कि राहुल गांधी की उत्तराखंड और अंडमान-निकोबार यात्रा के दौरान ही राज्यसभा प्रत्याशियों की घोषणा क्यों की गई? अक्सर देखा गया है कि जब टिकटों के महत्वपूर्ण फैसले होते हैं, तब राहुल गांधी दिल्ली से बाहर होते हैं और उम्मीदवारों की घोषणा हो जाती है।
गहलोत की राजनीति को समझने के लिए 2018 का उदाहरण
यूं ही नहीं अशोक गहलोत राजस्थान कांग्रेस के बड़े-बड़े कद्दावर नेताओं को राजनीतिक मात देकर तीन बार मुख्यमंत्री बने। दिलचस्प बात यह है कि उनके नेतृत्व में कांग्रेस कई बार सत्ता से बाहर हुई, लेकिन जब भी पार्टी सत्ता में लौटी, मुख्यमंत्री की कुर्सी अंततः गहलोत को ही मिली। इसके पीछे की राजनीतिक शैली को न तो अधिकांश राजनीतिक पंडित पूरी तरह समझ पाए और न ही विश्लेषक।
इसे समझने के लिए 2018 के विधानसभा चुनाव का उदाहरण पर्याप्त है। राहुल गांधी ने कांग्रेस की सत्ता में वापसी के लक्ष्य के साथ सचिन पायलट को राजस्थान कांग्रेस का प्रदेशाध्यक्ष बनाया था। उस समय अशोक गहलोत के कई करीबी नेता पायलट के खेमे में चले गए। सचिन पायलट को यह विश्वास था कि जो नेता गहलोत को छोड़कर उनके साथ आए हैं, वे उनके साथ बने रहेंगे।
इन नेताओं को टिकट दिलाने में भी पायलट की महत्वपूर्ण भूमिका रही। लेकिन चुनाव जीतने के बाद इनमें से कई नेता फिर अशोक गहलोत के साथ खड़े दिखाई दिए। परिणाम यह हुआ कि मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सचिन पायलट पीछे रह गए और अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बन गए।
यही वह राजनीतिक शैली है, जिसके कारण अशोक गहलोत ने समय-समय पर कांग्रेस के कई प्रभावशाली नेताओं को पीछे छोड़ते हुए अपनी स्थिति मजबूत बनाए रखी।
नीरज डांगी की उम्मीदवारी भी उसी रणनीति का हिस्सा?
कुछ इसी अंदाज में अशोक गहलोत अपने पसंदीदा नेता और राज्यसभा सांसद नीरज डांगी को लगातार दूसरी बार राज्यसभा का उम्मीदवार बनवाने में सफल होते दिखाई देते हैं। नीरज डांगी के नामांकन के दौरान भी अशोक गहलोत सबसे आगे नजर आए। इससे राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई कि डांगी को टिकट दिलाने के पीछे किसकी भूमिका रही होगी।
इसी तरह यह सवाल भी बना हुआ है कि पवन खेड़ा को कर्नाटक से टिकट कैसे मिला और राजस्थान की सीट आखिर डांगी के हिस्से में क्यों गई?
गहलोत के बयान से कांग्रेस में नया सियासी तूफान
अब बात अशोक गहलोत के उस बयान की, जिसने कांग्रेस के भीतर नई बहस छेड़ दी है। इसे भी गहलोत की राजनीतिक शैली का हिस्सा माना जा रहा है। अक्सर देखा गया है कि जब विधानसभा चुनाव नजदीक आते हैं, तब वे अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर इसी प्रकार के राजनीतिक हमले करते हैं।
परसराम मदेरणा, डॉ. गिरिजा व्यास, डॉ. सी.पी. जोशी और सचिन पायलट सहित कांग्रेस के कई ऐसे नेता रहे हैं, जिन्हें कभी मुख्यमंत्री पद का मजबूत दावेदार माना जाता था। इनमें से कई नेता प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी रहे, लेकिन अंततः अशोक गहलोत अपनी राजनीतिक रणनीति के दम पर उनसे आगे निकलते रहे।
2028 की तैयारी अभी से?
राजस्थान में अगला विधानसभा चुनाव 2028 में होना है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि अशोक गहलोत ने अपनी पुरानी राजनीतिक शैली का इस्तेमाल करते हुए अभी से अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि राहुल गांधी इस राजनीतिक बिसात को किस नजर से देखते हैं और क्या वे अशोक गहलोत की इस रणनीति के प्रभाव में आते हैं या कोई अलग रास्ता अपनाते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















