कांग्रेस नेताओं की भी होगी परीक्षा

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17 जून को कोटा से शुरू होने जा रहा राहुल गांधी का भाजपा विरोधी जनआंदोलन केवल केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ राजनीतिक संघर्ष नहीं, बल्कि कांग्रेस संगठन और उसके नेताओं की सक्रियता की भी बड़ी परीक्षा है। आंदोलन से पहले कार्यकर्ताओं में उत्साह दिख रहा है, लेकिन पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं की मैदान में अनुपस्थिति सवाल खड़े कर रही है।

-देवेंद्र यादव-

devendra yadav
देवेन्द्र यादव

17 जून को राजस्थान की शिक्षा नगरी कोटा से कांग्रेस और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का सत्तारूढ़ भाजपा की नीतियों के खिलाफ प्रस्तावित जनआंदोलन कांग्रेस के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक अभियान माना जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि लंबे समय से राजनीतिक गलियारों और मीडिया में यह सवाल उठता रहा है कि यदि भाजपा सरकार की नीतियों में कमियां हैं, तो कांग्रेस और राहुल गांधी जनता के मुद्दों को लेकर सड़कों पर बड़े आंदोलन क्यों नहीं करते।

राहुल गांधी पर यह आरोप भी लगाया जाता रहा है कि वे भाजपा सरकार के खिलाफ अपनी बात मुख्य रूप से सोशल मीडिया और मीडिया मंचों के माध्यम से रखते हैं, लेकिन जनता के बीच जाकर बड़े पैमाने पर आंदोलन नहीं करते। संभवतः इसी धारणा को बदलने के लिए राहुल गांधी ने बड़ा कदम उठाते हुए केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ 17 जून से कोटा से देशव्यापी आंदोलन शुरू करने का फैसला किया है।

राहुल गांधी के लिए राजनीतिक रूप से अहम अभियान

यह आंदोलन राहुल गांधी के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संसद से लेकर सड़क तक भाजपा के खिलाफ संघर्ष करते हुए अक्सर वे अकेले ही दिखाई देते हैं। कांग्रेस के भीतर लंबे समय से बड़े पदों पर बैठे कई नेताओं को लेकर यह धारणा बनी रही है कि वे राहुल गांधी के अभियानों में अपेक्षित सक्रियता नहीं दिखाते। कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि कांग्रेस में बड़े-बड़े नेता मौजूद होने के बावजूद भाजपा के खिलाफ सीधी राजनीतिक लड़ाई में राहुल गांधी ही सबसे आगे खड़े नजर आते हैं। ऐसे में यह आंदोलन कांग्रेस संगठन के भीतर सक्रियता और प्रतिबद्धता को परखने का भी अवसर बन सकता है।

क्या इंडिया गठबंधन के नेता भी देंगे साथ?

भाजपा की नीतियों के खिलाफ राहुल गांधी का यह अभियान केवल कांग्रेस नेताओं ही नहीं, बल्कि इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों के नेताओं के लिए भी एक परीक्षा साबित हो सकता है। यह देखने वाली बात होगी कि राहुल गांधी के इस आंदोलन में गठबंधन के अन्य दलों के नेता कितनी सक्रिय भूमिका निभाते हैं और कितनी संख्या में मौजूद रहते हैं।

कोटा में तैयारियों की रफ्तार पर सवाल

राहुल गांधी कोटा से अपने बड़े अभियान की शुरुआत करने जा रहे हैं। हालांकि 15 जून तक स्थिति यह है कि 17 जून को होने वाले कार्यक्रम की तैयारियों का जायजा लेने के लिए राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के बड़े नेताओं की सक्रिय मौजूदगी कोटा में दिखाई नहीं दी है। राजस्थान कांग्रेस के प्रभारी सुखविंदर सिंह रंधावा भी अभी तक कोटा में नजर नहीं आए हैं। हाड़ौती संभाग की सह-प्रभारी पूनम पासवान जरूर लगातार क्षेत्र में सक्रिय दिखाई दे रही हैं। वे कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं से मुलाकात कर आंदोलन को सफल बनाने की रणनीति पर चर्चा कर रही हैं।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की सक्रियता पर निगाह

यही कारण है कि यह आंदोलन राहुल गांधी के लिए कांग्रेस के भीतर बड़े पदों पर बैठे नेताओं की सक्रियता को परखने का अवसर भी बन गया है। हाड़ौती संभाग में कांग्रेस के कई विधायक हैं और राजस्थान कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में गिने जाने वाले शांति कुमार धारीवाल भी कोटा से ही आते हैं, लेकिन उनकी सक्रियता अभी तक विशेष रूप से दिखाई नहीं दी है।

इसी तरह कांग्रेस संगठन और चुनावी प्रबंधन में दक्ष माने जाने वाले प्रमोद जैन भाया भी अभी तक कार्यक्रम की तैयारियों में प्रमुख रूप से नजर नहीं आए हैं। जबकि चुनावी समय में टिकट वितरण और संगठनात्मक गतिविधियों में यही नेता सबसे अधिक सक्रिय दिखाई देते हैं। ऐसे में राहुल गांधी के लिए यह समझने का भी अवसर है कि पार्टी के कौन-कौन से नेता और पदाधिकारी वास्तव में जनसंघर्ष के समय मैदान में उतरते हैं और कौन केवल चुनावी राजनीति तक सीमित रहते हैं।

कार्यकर्ताओं में दिख रहा उत्साह

हालांकि नेताओं की सक्रियता को लेकर सवाल उठ रहे हैं, लेकिन राहुल गांधी के 17 जून को कोटा में होने वाले आंदोलन को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह और जोश स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। कार्यकर्ता इसे भाजपा सरकार के खिलाफ कांग्रेस के नए संघर्ष की शुरुआत के रूप में देख रहे हैं और बड़ी संख्या में कार्यक्रम को सफल बनाने की तैयारियों में जुटे हुए हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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