क्या राहुल गांधी की गैरमौजूदगी में कांग्रेस के बड़े फैसले होते हैं?

whatsapp image 2026 07 06 at 07.43.16
photo courtesy social media

-क्या संगठन पर राहुल गांधी का पूरा नियंत्रण है या निर्णय कहीं और से होते हैं?

-देवेंद्र यादव-

devendra yadav
देवेन्द्र यादव

कांग्रेस के भीतर एक सवाल बार-बार उठता है कि जब भी राहुल गांधी दिल्ली से बाहर किसी राज्य के दौरे पर या विदेश यात्रा पर होते हैं, तभी संगठन में बड़े फैसले और महत्वपूर्ण नियुक्तियां क्यों होती हैं? क्या इन फैसलों में राहुल गांधी की सहमति होती है, या फिर उन्हें सीमित जानकारी देकर यह संदेश देने की कोशिश की जाती है कि कांग्रेस में उनका नियंत्रण केवल औपचारिक है, जबकि वास्तविक निर्णय उन नेताओं के हाथ में हैं जो लंबे समय से संगठन के भीतर प्रभाव बनाए हुए हैं?

मैं लंबे समय से अपने ब्लॉग में इस विषय पर लिखता रहा हूं कि राहुल गांधी के दिल्ली से बाहर रहने के दौरान ही बड़े संगठनात्मक फैसले और नियुक्तियां क्यों होती हैं। यह सिलसिला केवल राहुल गांधी के दौर तक सीमित नहीं है, बल्कि श्रीमती सोनिया गांधी के समय से भी देखा जाता रहा है। हालांकि दोनों दौर में एक महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है।

सोनिया गांधी और राहुल गांधी के नेतृत्व शैली का अंतर

सोनिया गांधी जब किसी दौरे से लौटती थीं, तो उनकी अनुपस्थिति में लिए गए फैसलों और नियुक्तियों की समीक्षा करती थीं। यही कारण था कि संगठनात्मक निर्णयों को लेकर कार्यकर्ताओं और नेताओं में न तो व्यापक नाराजगी दिखाई देती थी और न ही बड़े विवाद सामने आते थे। इससे यह संदेश जाता था कि कांग्रेस संगठन और उसके नेताओं पर सोनिया गांधी का पूरा नियंत्रण है।

इसके विपरीत, राहुल गांधी के नेतृत्व में स्थिति अलग दिखाई देती है। ऐसा प्रतीत होता है कि कई नेता यह मानकर चलते हैं कि राहुल गांधी निर्णयों और नियुक्तियों की उसी प्रकार समीक्षा नहीं करेंगे जैसी सोनिया गांधी करती थीं। यही कारण है कि संगठन के भीतर विवाद और असंतोष अधिक खुलकर सामने आने लगे हैं।

क्या यही कांग्रेस की कमजोरी का कारण है?

यह भी एक बड़ा प्रश्न है कि 2014 के बाद कांग्रेस लगातार कमजोर क्यों होती गई? वह विधानसभा चुनावों में अपेक्षित सफलता क्यों नहीं हासिल कर पा रही है और केंद्र की सत्ता में वापसी का रास्ता क्यों नहीं बना पा रही?

चाहे विधानसभा और लोकसभा चुनाव में प्रत्याशियों के चयन की बात हो या उम्मीदवारों की घोषणा की, कई बार यह देखा गया है कि राहुल गांधी के दिल्ली से बाहर रहने के दौरान अचानक उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी जाती है। इसके बाद कई राज्यों में असंतोष पैदा होता है और कांग्रेस संभावित जीत को हार में बदल देती है।

जिला अध्यक्षों की नियुक्ति और कार्यकर्ताओं की नाराजगी

कांग्रेस ने संगठन सृजन अभियान के तहत अधिकांश राज्यों में जिला अध्यक्षों की नियुक्तियां कीं। लेकिन इन नियुक्तियों के बाद कई राज्यों में कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष खुलकर सामने आया।

यह स्थिति इस सवाल को जन्म देती है कि क्या राहुल गांधी को संगठन के भीतर बैठे प्रभावशाली नेता वास्तविक स्थिति से पूरी तरह अवगत कराते हैं? जिला अध्यक्षों की नियुक्ति के बाद उठे विवादों पर गंभीर समीक्षा करने के बजाय, नव-नियुक्त जिला अध्यक्षों के प्रशिक्षण शिविर आयोजित किए गए, जिनमें राहुल गांधी स्वयं शामिल हुए और 30 से 50 जिला अध्यक्षों को संबोधित करने विभिन्न राज्यों में पहुंचे।

सवाल यह है कि क्या यह राहुल गांधी को वास्तविक संगठनात्मक स्थिति से दूर रखने की रणनीति थी, या फिर उन्होंने स्वयं इस पर पर्याप्त मंथन नहीं किया? यदि गंभीर समीक्षा होती, तो नियुक्तियों को लेकर उठे विवादों पर संबंधित नेताओं से विस्तृत चर्चा भी होती।

क्या प्रशिक्षण के बाद संगठन में बदलाव दिखाई दिया?

यह भी विचारणीय है कि जिन जिला अध्यक्षों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया, क्या वे अपने-अपने जिलों में कांग्रेस को मजबूत करने के लिए सक्रिय हुए? क्या उन्होंने राहुल गांधी के मुद्दों और पार्टी के अभियानों को जन-जन तक प्रभावी ढंग से पहुंचाया? इन सवालों के जवाब संगठन की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

पंजाब कांग्रेस फिर चर्चा के केंद्र में

इन दिनों राजनीतिक गलियारों में पंजाब कांग्रेस की चर्चा भी इसी संदर्भ में हो रही है। एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि राहुल गांधी के विदेश दौरे या दिल्ली से बाहर रहने के दौरान ही बड़े संगठनात्मक फैसले क्यों लिए जाते हैं?

पंजाब कांग्रेस की गुटबाजी समाप्त करने के उद्देश्य से राहुल गांधी ने कांग्रेस के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष अजय माकन के नेतृत्व में तीन सदस्यीय टीम पंजाब भेजी थी। टीम ने कार्यकर्ताओं और नेताओं से बातचीत कर अपनी रिपोर्ट तैयार की, लेकिन उसकी सिफारिशें सार्वजनिक नहीं हुईं।

हालांकि यह स्पष्ट हो गया कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को नहीं बदला जाएगा। वहीं, जो नेता प्रदेश अध्यक्ष बनने की इच्छा रखते थे, उन्हें आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए चुनाव अभियान समिति, घोषणा-पत्र समिति और अन्य महत्वपूर्ण समितियों का अध्यक्ष बना दिया गया।

अब सवाल उठता है कि क्या ये नियुक्तियां राहुल गांधी की सहमति से हुईं या उनकी अनुपस्थिति में निर्णय लेकर बाद में उन्हें केवल जानकारी दी गई? इसका उत्तर संभवतः राहुल गांधी के विदेश दौरे से लौटने के बाद ही मिल सकेगा, यदि वे सोनिया गांधी की तरह इन निर्णयों की समीक्षा करते हैं।

तमिलनाडु में सही फैसला, लेकिन देर से?

तमिलनाडु में कांग्रेस नेतृत्व द्वारा मणिकम टैगोर को प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाना सकारात्मक निर्णय माना जा सकता है। हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि यदि यह फैसला विधानसभा चुनाव से पहले लिया जाता, तो कांग्रेस को वहां बेहतर राजनीतिक लाभ मिल सकता था।

फिर भी, टैगोर की नियुक्ति से 2029 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को फायदा मिलने की संभावना जताई जा रही है।

दक्षिण भारत में कांग्रेस की नई ताकत

दक्षिण भारत में कांग्रेस की स्थिति पिछले कुछ वर्षों में अपेक्षाकृत मजबूत हुई है। कर्नाटक में डी.के. शिवकुमार का प्रभाव, केरल में वी.डी. सतीशन का नेतृत्व, तेलंगाना में रेवंत रेड्डी का मुख्यमंत्री बनना और अब तमिलनाडु में मणिकम टैगोर की नियुक्ति कांग्रेस के लिए सकारात्मक संकेत माने जा रहे हैं।

यदि पार्टी इस राजनीतिक बढ़त को संगठनात्मक मजबूती में बदलने में सफल रहती है, तो 2029 के लोकसभा चुनाव में दक्षिण भारत कांग्रेस के लिए निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेख उनके निजी विचार हैं।)

Advertisement
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted