उत्तर प्रदेश कांग्रेस के लिए नई उम्मीद या नई परीक्षा?

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photo courtesy social media

-राजेंद्र पाल गौतम के पहले दौरे ने जगाई उम्मीद, लेकिन असली चुनौती संगठनात्मक एकजुटता की

-देवेन्द्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

1 जुलाई को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के नवनियुक्त राष्ट्रीय प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम प्रभारी बनने के बाद पहली बार नई दिल्ली से सड़क मार्ग के जरिए उत्तर प्रदेश पहुंचे। उनका यह दौरा केवल औपचारिक नहीं था, बल्कि कांग्रेस को फिर से मजबूत करने के मिशन की शुरुआत के रूप में देखा गया। दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों तक उनका जगह-जगह भव्य स्वागत हुआ। माहौल ऐसा था मानो कांग्रेस कार्यकर्ता इस बदलाव को उत्तर प्रदेश में पार्टी के लगभग चार दशक पुराने राजनीतिक सूखे को समाप्त करने की दिशा में एक नई शुरुआत मान रहे हों।

राहुल गांधी ने भी संभवतः इसी सोच के साथ राजेंद्र पाल गौतम को देश के सबसे बड़े राज्य की जिम्मेदारी सौंपी है। गौतम ने भी अपने पहले ही दौरे में यह संदेश देने का प्रयास किया कि उनका लक्ष्य केवल संगठन का नेतृत्व करना नहीं, बल्कि कांग्रेस को नए सिरे से खड़ा करना है।

राजेंद्र पाल गौतम के पहले दौरे को लेकर कार्यकर्ताओं में जबरदस्त उत्साह दिखाई दिया। वहीं लखनऊ में आयोजित स्वागत कार्यक्रम के मंच पर प्रदेश कांग्रेस के प्रमुख नेताओं ने भी एकजुटता का प्रदर्शन किया। सभी नेता एक साथ नजर आए, जिससे संगठन में सकारात्मक संदेश गया।

हालांकि, बड़ा सवाल यही है कि क्या यह एकता केवल स्वागत मंच तक सीमित रहेगी या आगे भी कायम रहेगी? उत्तर प्रदेश में कांग्रेस तभी अपने लंबे राजनीतिक वनवास को समाप्त कर सकती है, जब उसके सभी वरिष्ठ नेता व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर संगठनात्मक एकता बनाए रखें।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस चार दशक से अधिक समय से सत्ता से बाहर है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रदेश में कांग्रेस की राजनीतिक जमीन पूरी तरह समाप्त हो गई है। आज भी बड़ी संख्या में ऐसे कार्यकर्ता और समर्थक मौजूद हैं, जो कांग्रेस की विचारधारा में विश्वास रखते हैं। समस्या कार्यकर्ताओं की कमी नहीं, बल्कि उनके विश्वास को बनाए रखने की है।

अक्सर देखने में आया है कि जिन नेताओं पर कार्यकर्ता भरोसा करते हैं, वही नेता अपने राजनीतिक हितों के लिए दूसरे दलों से समझौते कर लेते हैं। इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटता है और वे सक्रिय राजनीति से दूर हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस की कमजोरी का यह एक बड़ा कारण रहा है, जिस पर कांग्रेस नेतृत्व और राहुल गांधी को गंभीरता से विचार करना होगा।

राजेंद्र पाल गौतम के पहले उत्तर प्रदेश दौरे ने यह भी साबित किया कि कांग्रेस का जमीनी कार्यकर्ता आज भी सक्रिय है। जगह-जगह उमड़ी भीड़ और कार्यकर्ताओं का उत्साह इस बात का संकेत था कि संगठन में ऊर्जा की कमी नहीं है। राहुल गांधी ने भी अपनी सभाओं, रोड शो और भारत जोड़ो यात्रा के दौरान यही उत्साह देखा था। इसी कार्यकर्ता शक्ति का असर 2024 के लोकसभा चुनाव में भी देखने को मिला, जब कांग्रेस ने 99 सीटें जीतकर उल्लेखनीय वापसी की।

इससे स्पष्ट है कि कांग्रेस का कार्यकर्ता आज भी देशभर में मौजूद है। जरूरत केवल उसे भरोसा देने, नेतृत्व पर विश्वास कायम करने और संगठनात्मक दिशा देने की है।

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर प्रदेश कांग्रेस के नेतृत्व के बीच तालमेल का है। राहुल गांधी ने अपने भरोसेमंद नेता राजेंद्र पाल गौतम को राष्ट्रीय प्रभारी बनाया है, लेकिन उनकी सफलता काफी हद तक प्रदेश अध्यक्ष के साथ समन्वय पर भी निर्भर करेगी।

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पूर्व राष्ट्रीय प्रभारी अविनाश पांडे और प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के कार्यकाल में संगठनात्मक ढांचा पूरी तरह खड़ा नहीं हो सका। प्रदेश कांग्रेस कमेटी का गठन अधूरा रहा, जिला अध्यक्षों की नियुक्तियां भी समय पर नहीं हो सकीं और जिन नियुक्तियों की घोषणा हुई, वे भी विवादों में घिर गईं। यह विवाद आज तक पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

राजेंद्र पाल गौतम की सबसे बड़ी पहचान उनकी संगठनात्मक क्षमता मानी जाती है। कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलना, नेताओं के बीच समन्वय स्थापित करना और संगठन को मजबूत बनाना उनकी कार्यशैली का हिस्सा रहा है। उनके पहले उत्तर प्रदेश दौरे में इसकी शुरुआती झलक भी दिखाई दी।

अब देखना यह होगा कि शुरुआती उत्साह को वह स्थायी संगठनात्मक मजबूती में बदल पाते हैं या नहीं। यदि प्रदेश नेतृत्व और राष्ट्रीय प्रभारी के बीच बेहतर तालमेल बना रहता है तथा वरिष्ठ नेता व्यक्तिगत राजनीति से ऊपर उठकर संगठन को प्राथमिकता देते हैं, तो उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए नई संभावनाओं के द्वार खुल सकते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेख उनके निजी विचार हैं।)

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