असम में कांग्रेस की वापसी की चुनौती: क्या प्रियंका–गौरव की जोड़ी बदलेगी समीकरण?

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-प्रवासी मतदाताओं को साधना बड़ी चुनौती, रणनीति में नए चेहरों को शामिल करने की उठी मांग

अब देखना यह होगा कि प्रियंका गांधी की अगुवाई में कांग्रेस की चुनावी रणनीति असम में कितना असर दिखा पाती है और क्या गौरव गोगोई के नेतृत्व में पार्टी एक बार फिर राज्य की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता बना पाती है।

-देवेंद्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

असम विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। पार्टी के लिए यह चुनाव काफी अहम माना जा रहा है। इसी का संकेत इस बात से मिलता है कि कांग्रेस नेतृत्व ने चुनाव से पहले ही स्क्रीनिंग कमेटी की कमान प्रियंका गांधी को सौंप दी। प्रियंका गांधी को यह जिम्मेदारी मिलने के कुछ ही दिनों बाद कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा से पहले ही अपने 43 उम्मीदवारों की पहली सूची भी जारी कर दी।

एक दशक से सत्ता से दूर कांग्रेस

असम में कांग्रेस पिछले करीब एक दशक से सत्ता से बाहर है। कभी राज्य की राजनीति में मजबूत पकड़ रखने वाली कांग्रेस को 2021 के विधानसभा चुनाव में बड़ा झटका लगा था। 126 सीटों वाली विधानसभा में पार्टी को सिर्फ 29 सीटों पर ही जीत मिल सकी थी। असम में लंबे समय तक कांग्रेस की राजनीति का चेहरा रहे तरुण गोगोई के बाद पार्टी की पकड़ कमजोर हुई और भाजपा ने राज्य की सत्ता पर कब्जा कर लिया। इसके बाद से कांग्रेस लगातार वापसी की कोशिश कर रही है।

गौरव गोगोई पर संगठन की जिम्मेदारी

अब पार्टी की उम्मीदें गौरव गोगोई पर टिकी हैं। गौरव गोगोई को हाल ही में असम कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। लोकसभा में कांग्रेस के उप नेता के रूप में सक्रिय गोगोई राज्य में संगठन को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रियंका गांधी की चुनावी रणनीति और गौरव गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस असम में वापसी कर पाएगी?

प्रवासी मतदाता बन सकते हैं गेम चेंजर

असम की राजनीति में प्रवासी मतदाताओं की भूमिका काफी अहम मानी जाती है। खास तौर पर राजस्थान और बिहार से जाकर बसे लोगों का बड़ा वोट बैंक है। पहले यह वर्ग कांग्रेस का पारंपरिक समर्थक माना जाता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने इस वर्ग में भी अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस को असम में मजबूत वापसी करनी है तो उसे प्रवासी मतदाताओं को फिर से अपने पक्ष में लाने की रणनीति बनानी होगी।

भंवर जितेंद्र सिंह के जिम्मे संगठन

कांग्रेस ने असम की जिम्मेदारी भंवर जितेन्द्र सिंह को दे रखी है। वे पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव होने के साथ-साथ असम कांग्रेस के प्रभारी भी हैं। हालांकि यह भी सच है कि उनकी मौजूदगी में ही कांग्रेस ने 2021 का चुनाव लड़ा था और तब पार्टी को सिर्फ 29 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या इस बार पार्टी अपनी रणनीति में कुछ नया करेगी।

बिहार मूल के मतदाताओं को साधने की चुनौती

असम में बिहार मूल के लोगों की संख्या काफी ज्यादा बताई जाती है। कई क्षेत्रों में इनका प्रभाव चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी है कि कांग्रेस को इन मतदाताओं को साधने के लिए बिहार के प्रभावशाली नेताओं को मैदान में उतारना चाहिए। कुछ कांग्रेस नेताओं का मानना है कि पार्टी को इस वर्ग से संवाद बढ़ाने के लिए मजबूत चेहरों को जिम्मेदारी देनी चाहिए, ताकि प्रवासी मतदाताओं के बीच भरोसा फिर से बनाया जा सके।

पप्पू यादव को जिम्मेदारी देने की चर्चा

इसी संदर्भ में पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव का नाम भी चर्चा में है। पप्पू यादव बिहार में युवाओं और छात्रों के बीच लोकप्रिय नेता माने जाते हैं। हाल ही में पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई की जीत में भी उनके प्रभाव की चर्चा रही थी। कुछ नेताओं का मानना है कि यदि कांग्रेस असम में बिहार मूल के मतदाताओं को साधना चाहती है तो पप्पू यादव जैसे नेताओं को चुनावी अभियान में सक्रिय भूमिका दी जा सकती है।

कांग्रेस के सामने बड़ी परीक्षा

कुल मिलाकर असम विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए एक बड़ी राजनीतिक परीक्षा साबित होने जा रहा है। पार्टी नेतृत्व की नजर इस चुनाव पर खास तौर पर टिकी हुई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि कांग्रेस को असम में मजबूत वापसी करनी है तो उसे स्थानीय नेतृत्व के साथ-साथ प्रवासी मतदाताओं की राजनीति को भी समझना होगा। अब देखना यह होगा कि प्रियंका गांधी की अगुवाई में कांग्रेस की चुनावी रणनीति असम में कितना असर दिखा पाती है और क्या गौरव गोगोई के नेतृत्व में पार्टी एक बार फिर राज्य की सत्ता तक पहुंचने का रास्ता बना पाती है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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