कांग्रेस में एकजुटता या बिखराव, फैसला चुनावी नतीजे करेंगे

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photo courtesy social media

-हाड़ौती में प्रहलाद गुंजल की सक्रियता से बदला राजनीतिक माहौल

-देवेंद्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

कोटा में कांग्रेस एकजुट हुई है या बिखर गई है, इसका वास्तविक आकलन तो 2028 के विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद ही हो सकेगा। हालांकि, इतना तय है कि कोटा संसदीय क्षेत्र से भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आए और लोकसभा चुनाव लड़ने वाले प्रहलाद गुंजल, चुनाव हारने के बावजूद लगातार सक्रिय बने हुए हैं। उनकी सक्रियता भविष्य में लगातार तीसरी बार सांसद बने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के लिए राजनीतिक चुनौती खड़ी कर सकती है। कोटा संभाग में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की सक्रियता पहले इतनी दिखाई नहीं देती थी, जितनी अब प्रहलाद गुंजल के नेतृत्व में नजर आ रही है। गुंजल की बढ़ती सक्रियता से केवल भाजपा ही नहीं, बल्कि कांग्रेस के वे नेता भी असहज हैं, जो लंबे समय से संगठन में जमे हुए हैं।

क्या कांग्रेस हाईकमान की नजर गुंजल पर है?

कांग्रेस का सामान्य कार्यकर्ता भी प्रहलाद गुंजल की सक्रियता का समर्थक दिखाई देता है। इसके बावजूद सवाल यह है कि क्या कांग्रेस हाईकमान ने अभी तक उन्हें पूरी तरह स्वीकार किया है? यदि हाईकमान की पूरी नजर गुंजल पर होती, तो उन्हें संगठन में बड़ी जिम्मेदारी मिल चुकी होती, जिसके वे अब हकदार माने जा रहे हैं।

हाड़ौती भाजपा का गढ़ क्यों बनी?

हाड़ौती संभाग को जनसंघ के दौर से ही भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। लेकिन क्या कांग्रेस ने कभी गंभीरता से यह समीक्षा की कि आखिर भाजपा यहां इतनी मजबूत क्यों है? हाड़ौती में दलित, आदिवासी, ओबीसी और मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी संख्या है और ये वर्ग परंपरागत रूप से कांग्रेस के समर्थक रहे हैं। इसके बावजूद कांग्रेस ने कभी इन वर्गों के नेताओं को प्रदेश या राष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया।

रामनारायण मीणा का उदाहरण

कोटा संसदीय क्षेत्र, जो लंबे समय तक भाजपा का गढ़ माना जाता रहा, वहां कांग्रेस ने आदिवासी नेता रामनारायण मीणा को लोकसभा टिकट दिया था। उन्होंने भाजपा को हराकर जीत दर्ज की। रामनारायण मीणा पांच बार सामान्य सीट से विधायक भी रहे, लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें प्रदेश या राष्ट्रीय स्तर पर कभी बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी।हाड़ौती में दलित और आदिवासी कार्यकर्ताओं की कमी नहीं है, लेकिन प्रदेश और राष्ट्रीय नेतृत्व उन्हें वह स्थान नहीं दे पाया, जिसके वे हकदार थे। यही कारण है कि इस क्षेत्र में भाजपा अपेक्षाकृत अधिक मजबूत बनी रही।

संगठन और सत्ता में उपेक्षा का आरोप

हाड़ौती में कांग्रेस के बड़े नेताओं पर दलित, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम समुदाय के कार्यकर्ताओं की लगातार उपेक्षा करने के आरोप लगते रहे हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण स्वयं रामनारायण मीणा हैं, जो पांच बार विधायक रहने के बावजूद कांग्रेस सरकारों में मंत्री नहीं बनाए गए। दूसरी ओर, कांग्रेस संगठन में ऐसे नेताओं को बड़े पद दिए गए हैं, जिनका प्रभाव अपने वार्ड तक सीमित माना जाता है। यही वजह है कि हाड़ौती में कांग्रेस भाजपा की तुलना में कमजोर नजर आती है।

गुंजल-मीणा की जोड़ी बदल सकती है समीकरण

यदि कांग्रेस हाड़ौती में भाजपा से मुकाबले की गंभीर रणनीति बनाए, तो यहां बड़ा राजनीतिक समीकरण बन सकता है। प्रहलाद गुंजल पहले से सक्रिय हैं। यदि कांग्रेस पूर्व सांसद और पूर्व विधानसभा उपाध्यक्ष रामनारायण मीणा को भी बड़ी जिम्मेदारी देकर सक्रिय करे, तो गुंजल और मीणा की जोड़ी 2028 के विधानसभा और 2029 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को फायदा पहुंचा सकती है। हाड़ौती में मीणा और गुर्जर समुदाय के मतदाताओं की बड़ी संख्या है। रामनारायण मीणा लोकसभा सदस्य रह चुके हैं और पांच बार सामान्य सीट से विधायक भी चुने गए। वहीं प्रहलाद गुंजल भी क्षेत्र में मजबूत जनाधार वाले नेता माने जाते हैं। दोनों नेताओं की राजनीतिक यात्रा में एक समानता यह भी रही कि उन्हें राजनीतिक नुकसान बाहरी विरोधियों से कम और अपनों की राजनीति से अधिक हुआ। ओम बिरला के खिलाफ चुनाव में कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी भी एक बड़ा कारण मानी गई।

कांग्रेस के पास मजबूत आदिवासी नेतृत्व की कमी

राजस्थान में कांग्रेस के पास मजबूत आदिवासी नेतृत्व की कमी महसूस की जाती है। जो नेता जमीन पर प्रभाव रखते हैं, उन्हें प्रदेश या राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी जिम्मेदारियां नहीं मिल पातीं। रामनारायण मीणा कांग्रेस के वरिष्ठ आदिवासी नेताओं में गिने जाते हैं। वे एक बार सांसद और पांच बार सामान्य सीट से विधायक रह चुके हैं। इससे उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता का अंदाजा लगाया जा सकता है। रामनारायण मीणा गांधी परिवार, विशेषकर सोनिया गांधी के करीबी आदिवासी नेताओं में माने जाते हैं। इसके बावजूद राजस्थान कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें वह राजनीतिक सम्मान नहीं दिया, जिसके वे हकदार थे। यदि कांग्रेस हाईकमान ऐसे नेताओं को उचित जिम्मेदारी दे, तो इसका लाभ पार्टी को भविष्य में मिल सकता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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