
पांच राज्यों के चुनाव परिणामों के बाद बदली रणनीति
-देवेंद्र यादव-

क्या कांग्रेस के भीतर वर्षों से कुंडली मारकर बैठे नेताओं को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी मार्गदर्शक मंडल में भेजने की तैयारी कर रहे हैं? पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद राहुल गांधी जिस प्रकार के फैसले लेते नजर आ रहे हैं, उन्हें देखकर लगता है कि कांग्रेस को मजबूत करने के लिए उन्होंने “अभी नहीं तो कभी नहीं” की रणनीति अपनाते हुए संगठन में व्यापक बदलाव का मन बना लिया है।
लंबे समय बाद केरल में मिली जीत के बाद राहुल गांधी ने के.सी. वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री नहीं बनाकर वी.डी. सतीशन को मुख्यमंत्री बनाया। वेणुगोपाल लंबे समय से कांग्रेस के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री के पद पर कार्यरत हैं। केरल विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि यदि कांग्रेस सत्ता में आती है तो वेणुगोपाल मुख्यमंत्री बनेंगे। उनके नाम की चर्चा तब तक चलती रही, जब तक राहुल गांधी ने सतीशन के नाम की घोषणा नहीं कर दी।
कर्नाटक में भी बदलाव के संकेत
दक्षिण भारत के एक अन्य महत्वपूर्ण राज्य कर्नाटक, जहां कांग्रेस की सरकार है, वहां लंबे समय से यह चर्चा चल रही थी कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की जगह डी.के. शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। हालांकि यह चर्चा लंबे समय तक केवल अटकलों तक ही सीमित रही। अब राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन हो सकता है। मुख्यमंत्री पद के लिए डी.के. शिवकुमार का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। इसके साथ ही यह भी चर्चा है कि क्या कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया को राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी भूमिका दी जाएगी।
राजनीतिक चर्चाओं में यह संभावना भी व्यक्त की जा रही है कि यदि सिद्धारमैया कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनते हैं तो वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे कर्नाटक की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं। वहीं, यदि सिद्धारमैया राज्यसभा जाते हैं तो वे राज्यसभा में विपक्ष के नेता की भूमिका भी संभाल सकते हैं। हालांकि फिलहाल यह सब राजनीतिक अटकलों के दायरे में है।
कार्यकर्ताओं को लंबे समय से था बड़े फैसले का इंतजार
केरल में वेणुगोपाल की जगह सतीशन को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद कांग्रेस के भीतर जमे हुए नेताओं की धड़कनें भले न बढ़ी हों, लेकिन कर्नाटक में नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाओं ने निश्चित रूप से कई नेताओं को सोचने पर मजबूर किया है।
कांग्रेस का आम कार्यकर्ता लंबे समय से यह अपेक्षा कर रहा था कि राहुल गांधी संगठन को मजबूत करने के लिए कुछ बड़े और कठोर फैसले लें। हाल के घटनाक्रमों को देखकर कार्यकर्ताओं को यह संदेश मिला है कि कांग्रेस नेतृत्व अब संगठनात्मक बदलावों के प्रति गंभीर है।
क्या राहुल गांधी अपने फैसलों पर कायम रहेंगे?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी अपने फैसलों पर अंत तक कायम रहेंगे? कांग्रेस के भीतर अक्सर यह धारणा रही है कि राहुल गांधी के आसपास मौजूद कुछ रणनीतिकार उन्हें उनकी मूल राजनीतिक दिशा से भटका देते हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वे अपने वर्तमान रुख पर कायम रहते हुए राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी लंबे समय से प्रभाव बनाए हुए नेताओं को नई भूमिकाओं में भेजने का साहस दिखाएंगे।
क्या कोर कमेटियां ही भविष्य का मार्गदर्शक मंडल हैं?
राहुल गांधी शायद अघोषित रूप से मार्गदर्शक मंडल की अवधारणा पर पहले ही काम शुरू कर चुके हैं। अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक विभागों की कोर कमेटियों में कई वरिष्ठ नेताओं को शामिल किया गया है। इन समितियों में उन्हें सम्मानजनक भूमिका देने का प्रयास दिखाई देता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भविष्य में यही समितियां कांग्रेस के मार्गदर्शक मंडल का स्वरूप ग्रहण करेंगी?
दक्षिण भारत से शुरू हुआ कांग्रेस का ‘सफाई अभियान’
यदि कांग्रेस हाईकमान ने संगठनात्मक बदलावों का अभियान दक्षिण भारत से शुरू किया है, तो इसके पीछे भी राजनीतिक कारण हैं। इतिहास गवाह है कि जब-जब कांग्रेस पर बड़ा राजनीतिक संकट आया, तब-तब कृष्णा और कावेरी के क्षेत्र ने पार्टी का साथ दिया। संकट के दौर में श्रीमती इंदिरा गांधी ने चिकमगलूर से चुनाव लड़ा, श्रीमती सोनिया गांधी बेल्लारी से सांसद बनीं और राहुल गांधी तथा प्रियंका गांधी ने भी केरल के वायनाड से राजनीतिक जुड़ाव रखा।
वर्तमान में कांग्रेस जिन चार राज्यों में सत्ता में है, उनमें से तीन—केरल, कर्नाटक और तेलंगाना—दक्षिण भारत के राज्य हैं। तमिलनाडु में भी कांग्रेस गठबंधन सरकार का हिस्सा है।
2029 की रणनीति और दक्षिण भारत की भूमिका
ऐसा माना जा रहा है कि राहुल गांधी की नजर 2029 के लोकसभा चुनाव में दक्षिण भारत की 129 सीटों पर है। इसकी एक बड़ी वजह यह भी मानी जाती है कि दक्षिण भारत के कांग्रेस नेता पार्टी और गांधी परिवार के प्रति अपेक्षाकृत अधिक अनुशासित और प्रतिबद्ध रहे हैं। यही कारण है कि केरल और कर्नाटक में लिए गए फैसलों को वहां के नेताओं ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या उत्तर भारत के कांग्रेस नेता भी दक्षिण भारत के नेताओं की तरह संगठन के हित में त्याग का परिचय देंगे?
राजस्थान पर टिकी हैं निगाहें
कर्नाटक के घटनाक्रम के बाद राजनीतिक विश्लेषकों की नजर राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर भी है।सवाल यह है कि क्या गहलोत कांग्रेस के व्यापक हित में कोई बड़ा त्याग करेंगे? यह चर्चा इसलिए भी होती है क्योंकि 2022 के राजनीतिक संकट के दौरान राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन नहीं हो पाया था। इसके बाद 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। यही कारण है कि कांग्रेस के भीतर यह मत भी उभर रहा है कि राहुल गांधी को नेताओं की पावर पॉलिटिक्स और भ्रमजाल में उलझने के बजाय संगठनात्मक सुधारों को लगातार आगे बढ़ाना चाहिए।
कठोर फैसलों की निरंतरता ही असली परीक्षा
राहुल गांधी अक्सर कहते हैं कि भाजपा के कई नेता अंदर से खोखले हैं और उनमें वैचारिक दम नहीं है। यदि वे इस तर्क को कांग्रेस के भीतर भी लागू करते हैं, तो उन्हें यह समझना होगा कि केवल पदों पर लंबे समय तक बने रहना राजनीतिक शक्ति का प्रमाण नहीं होता। कांग्रेस को पुनर्जीवित करने के लिए राहुल गांधी को व्यक्तियों के बजाय संगठन को प्राथमिकता देनी होगी। यदि वे केरल और कर्नाटक की तरह अन्य राज्यों में भी कठिन लेकिन साहसिक निर्णय लेते हैं, तभी कांग्रेस में वास्तविक पीढ़ीगत बदलाव संभव हो पाएगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















