पटना यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव: बिहार में कांग्रेस के लिए नई राजनीतिक धुरी

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बिहार में भाजपा नीत सरकार के खिलाफ जो आवाज सबसे मुखर रूप से सुनाई देती है, उसमें पप्पू यादव अग्रणी दिखते हैं। कांग्रेस यदि उन्हें राजनीतिक स्पेस और संगठनात्मक जिम्मेदारी देती है, तो राज्य में पार्टी का ढांचा अधिक सशक्त हो सकता है।
-देवेन्द्र यादव-
devendra yadav
देवेन्द्र यादव
बिहार की राजनीति में प्रतीकात्मक घटनाएँ अक्सर बड़े बदलावों का संकेत देती हैं। इंडियन नेशनल कांग्रेस को पटना यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ चुनाव में मिली जीत को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। यह केवल एक विश्वविद्यालयी चुनाव की सफलता नहीं, बल्कि उस दल के लिए मनोवैज्ञानिक और संगठनात्मक ऊर्जा का स्रोत है जो लगभग चार दशक से बिहार में अपने अस्तित्व के संघर्ष से जूझ रहा है।
हाल के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। संगठनात्मक शिथिलता, नेतृत्व की अस्पष्टता और गठबंधन राजनीति की सीमाओं ने उसकी स्थिति को और कमजोर किया। ऐसे समय में छात्र राजनीति के इस गढ़ में मिली जीत पार्टी के लिए एक राजनीतिक ऑक्सीजन की तरह है। यह संकेत है कि यदि सही रणनीति और जमीनी हस्तक्षेप हो, तो कांग्रेस अब भी वैचारिक और संगठनात्मक पुनर्निर्माण की क्षमता रखती है।
पप्पू यादव की सक्रियता और राजनीतिक संदेश
इस सफलता के पीछे यदि किसी एक चेहरे की भूमिका रेखांकित करनी हो, तो वह हैं राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव 2024 के लोकसभा चुनाव से पूर्व उन्होंने अपनी पार्टी जाप का कांग्रेस में विलय किया और पूर्णिया से कांग्रेस टिकट की दावेदारी की। गठबंधन समीकरणों के चलते उन्हें टिकट नहीं मिला, और उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा तथा जीत दर्ज की। इसके बावजूद वे कांग्रेस के प्रति सार्वजनिक रूप से प्रतिबद्ध रहे।
पूर्णिया से सांसद बनने के बाद पप्पू यादव ने छात्र मुद्दों को आक्रामकता से उठाया। विश्वविद्यालयों में अव्यवस्था, बेरोजगारी, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और छात्रवृत्ति संबंधी प्रश्नों पर उन्होंने सड़क से लेकर संसद तक आवाज बुलंद की। छात्र आंदोलनों के समर्थन में उन्हें जेल भी जाना पड़ा। यह सक्रियता छात्र समुदाय में उनकी विश्वसनीयता को मजबूत करती गई। पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में कांग्रेस की सफलता इसी निरंतर संवाद और सक्रिय हस्तक्षेप का प्रतिफल मानी जा रही है।
नेतृत्व और संगठन पर सवाल
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने हाल में पंजाब के बरनाला में पार्टी नेताओं को स्पष्ट संदेश दिया कि प्रदर्शन ही टीम में स्थान सुनिश्चित करेगा। यह टिप्पणी केवल पंजाब तक सीमित नहीं मानी जानी चाहिए। बिहार जैसे राज्य में, जहाँ कांग्रेस लंबे समय से परिधि पर है, वहाँ संगठनात्मक पुनर्संरचना अनिवार्य है।
प्रश्न यह है कि क्या बिहार में भी कांग्रेस नेतृत्व प्रदर्शन आधारित पुनर्गठन का साहस दिखाएगा। क्या वे उन नेताओं को प्राथमिकता देंगे जो जमीनी संघर्ष में सक्रिय हैं, या पारंपरिक गुटबाजी ही निर्णयों को प्रभावित करेगी। छात्रसंघ चुनाव का परिणाम इस बहस को और प्रासंगिक बना देता है।
2029 की तैयारी का अवसर
2029 के विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, पर राजनीति में समय तेजी से बीतता है। पटना विश्वविद्यालय की जीत को यदि केवल एक प्रतीकात्मक उपलब्धि मानकर छोड़ दिया गया, तो उसका लाभ क्षणिक रहेगा। पर यदि इसे संगठन विस्तार, युवाओं की भागीदारी और मुद्दा आधारित राजनीति के आधार के रूप में विकसित किया गया, तो यह कांग्रेस के लिए निर्णायक मोड़ बन सकता है।
बिहार में भाजपा नीत सरकार के खिलाफ जो आवाज सबसे मुखर रूप से सुनाई देती है, उसमें पप्पू यादव अग्रणी दिखते हैं। कांग्रेस यदि उन्हें राजनीतिक स्पेस और संगठनात्मक जिम्मेदारी देती है, तो राज्य में पार्टी का ढांचा अधिक सशक्त हो सकता है।
अंततः यह जीत कांग्रेस के लिए चेतावनी और अवसर दोनों है। चेतावनी इसलिए कि जनता और युवा केवल नारों से प्रभावित नहीं होते। अवसर इसलिए कि जमीनी संघर्ष और विश्वसनीय नेतृत्व के सहारे पार्टी अब भी पुनर्जीवन पा सकती है। बिहार में कांग्रेस की नई कहानी लिखनी है तो उसे नए खिलाड़ियों पर भरोसा करना होगा और प्रदर्शन को ही राजनीति का पैमाना बनाना होगा।
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