अमेरिका से मिली नसीहत

-सर्वमित्रा सुरजन-

अब की बार ट्रंप सरकार का नारा अमेरिका में लगा कर आने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दो साल बाद फिर से बाइडेन सरकार के कार्यकाल में अमेरिका जाने वाले हैं। जून में उनकी यात्रा अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के निमंत्रण पर होने वाली है। प्रधानमंत्री मोदी 21 जून को न्यूयॉर्क में एक योग कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। और 22 जून को अमेरिकी राष्ट्रपति और उनकी पत्नी ने भारतीय प्रधानमंत्री के सम्मान में भोज का आयोजन किया है। यह राजनैतिक शिष्टाचार है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी को विश्व का सबसे प्रभावशाली नेता साबित करने में लगे लोग इसे भी वाहवाही के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। इसे प्रधानमंत्री के मित्र बराक और डोनाल्ड के बाद जो का मित्रवत भोज निमंत्रण कह सकते हैं। वैसे अमेरिकी राष्ट्रपतियों से प्रधानमंत्री की गहरी दोस्ती के किस्से गढ़े जाने से पहले एक नजर उस नसीहत पर डाल लेना उचित होगा, जो अमेरिका से एक रिपोर्ट के तौर पर आई है।

अमेरिका दुनिया भर में धार्मिक स्थिति का दस्तावेजीकरण करते हुए अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अपनी वार्षिक रिपोर्ट जारी करता है। अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता की वर्ष 2022 की रिपोर्ट में भारत के लिए जो विचार अमेरिका ने रखे हैं, वो चिंता उपजाने वाले हैं कि हमारी छवि किस तरह दागदार हो रही है। अमेरिकी गृह मंत्री एंथनी ब्लिंकन ने सोमवार को इस रिपोर्ट को जारी किया, जिसमें साफ तौर पर कहा जा रहा है कि भारत में धार्मिक समुदायों को निशाना बनाया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि अमेरिका ने पहली बार इस रिपोर्ट में भारत का जिक्र किया है। पिछले चार सालों से इस रिपोर्ट में किसी न किसी तरह भारत में धार्मिक स्वतंत्रता में आ रही गिरावट को रेखांकित किया गया है। लेकिन मोदी सरकार इसे खारिज करती आई है। इस साल की रिपोर्ट में भी रूस, चीन, सऊदी अरब समेत कई देशों में धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर चिंता जतलाई गई है और इसमें भारत का भी नाम है।

अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता कार्यालय के राजदूत रशद हुसैन ने रिपोर्ट के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि भारत के हरिद्वार में धार्मिक समुदायों के नेताओं ने मुसलमानों के खिलाफ अत्यधिक नफरत फैलाने वाला भाषण दिया। इस घटना का जिक्र करते हुए भारत को बहुलतावाद और सहिष्णुता की अपनी ऐतिहासिक परंपराओं को बनाए रखने का आह्वान किया गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के कई राज्यों में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ सरकारी एजेंसियां दमन और जुल्म का अभियान चला रही हैं। 2022 में ऐसी कई रिपोर्ट सामने आई है। गुजरात में सादी वर्दी में पुलिस ने सार्वजनिक रूप से अक्टूबर में एक त्योहार के दौरान चार मुस्लिम लोगों को पीटा। मध्यप्रदेश सरकार ने अप्रैल में खरगोन में सांप्रदायिक हिंसा के बाद मुस्लिमों के घरों और दुकानों पर बुलडोजर चला दिया। रिपोर्ट में संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान का जिक्र करते हुए कहा गया है कि 2021 में भागवत ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि देश में हिंदुओं और मुसलमानों के साथ धर्म के आधार पर अलग व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए और गोहत्या के लिए गैर-हिंदुओं को मारना हिंदू धर्म के खिलाफ एक कृत्य है। लेकिन जैसा कि बताया गया है कि मुसलमानों के साथ जो घटनाएं होती हैं वो इन बयानों को झुठला देती हैं।

रिपोर्ट में 2022 की घटनाओं पर चिंता जतलाई गई है, जबकि 2023 के पांच महीनों में द केरला स्टोरी से लेकर बजरंग बली की जय वाला प्रचार अभियान, रामनवमी पर हिंसा, भिवानी में गौ रक्षा के नाम पर जुनैद और नासिर की हत्या जैसी कई बड़ी घटनाएं देश में हो चुकी हैं। अगले पांच-छह महीनों में हालात कैसे रहने वाले हैं, कुछ कहा नहीं जा सकता, क्योंकि वक्त चुनावों का है। मोदी सरकार चाहे तो अपनी सुविधा देखते हुए रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया दे, वैसे पहले की रिपोर्ट्स तो नकार दी गई हैं।

हालांकि कई बार अपना चेहरे की गड़बड़ियां खुद को समझ नहीं आती, उसके लिए या तो आईना देखना पड़ता है या फिर दूसरों की राय सुननी पड़ती है। अमेरिका ने तो शायद मित्रवत व्यवहार में आईना ही दिखाया है। क्योंकि अमेरिका आर्थिक, सामरिक, कूटनीतिक कई तरीकों से भारत का निकट सहयोगी बन रहा है। जी-20, क्वाड जैसे संगठनों में अमेरिका और भारत साथी हैं। चीन की साम्राज्यवादी नीतियों और महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा पर अंकुश लगाने की जितनी जरूरत भारत को है, उतनी ही अमेरिका को भी है। आतंकवाद के भुक्तभोगी दोनों देश रहे हैं और इस वैश्विक समस्या से निपटने के लिए दोनों देशों को एक-दूसरे की जरूरत है। इसलिए मोदी सरकार इस रिपोर्ट को अगर इस बार भी नकारती है, तो ऐसा करने से पहले एक बार उसे सारे बिंदुओं पर गंभीरता से सोचना चाहिए।

भारत की छवि दुनिया में हमेशा से उदार और प्रगतिशील विचारों वाले देश की रही है। हमारे देश के ही गांधीजी थे, जिन्होंने द.अफ्रीका में नस्लभेद के खिलाफ आवाज़ उठाई थी और आगे चलकर जब जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने गांधीजी से मिलना चाहा, तो उन्होंने इंकार कर दिया। क्योंकि हिटलर ने नस्ल और वर्ण की शुद्धता के नाम पर अमानवीय अत्याचार की आग में जर्मनी को झोंका था। अगर भारत में धार्मिक स्वतंत्रता के संविधानप्रदत्त अधिकार के बावजूद अल्पसंख्यकों को किसी न किसी तरह निशाने पर लिया जाएगा, तो देश ही नहीं, दुनिया में सरकार पर सवाल उठेंगे। अमेरिका ने जो नसीहत अपनी रिपोर्ट के जरिए भारत सरकार को दी है, उस पर विचार करने की जरूरत है।

(देवेन्द्र सुरजन की फेसबुल वाल से साभार)

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