
अब नजरें 4 मई को आने वाले चुनाव परिणामों पर टिकी हैं। यह साफ है कि कांग्रेस इस बार पहले से ज्यादा गंभीर है। चुनावी सभाओं और रोड शो में उमड़ती भीड़ यह संकेत दे रही है कि पार्टी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। बंगाल में अभी भी कांग्रेस को चाहने वाले लोग मौजूद हैं, बस उन्हें भरोसा दिलाने की जरूरत है।
-देवेंद्र यादव-

कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने के लिए विधानसभा चुनाव 2026 में पूरी ताकत झोंक दी है। देर से ही सही, लेकिन राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व को यह समझ आ गया है कि अगर बंगाल में वापसी करनी है, तो अपने दम पर सभी सीटों पर चुनाव लड़ना ही होगा। इसी रणनीति के तहत कांग्रेस ने सभी विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे हैं।
अब सवाल उठता है कि राहुल गांधी को अकेले चुनाव लड़ने का यह भरोसा कहां से मिला? इसकी एक बड़ी वजह मानी जा रही है जम्मू-कश्मीर से विधायक और बंगाल के प्रभारी बनाए गए गुलाम अहमद मीर। गांधी परिवार के करीबी मीर ने कम समय में वह काम कर दिखाया, जो कई वरिष्ठ नेता लंबे समय तक जिम्मेदारी निभाने के बावजूद नहीं कर सके। उनकी रणनीति ने बंगाल में कांग्रेस संगठन को फिर से सक्रिय करने की कोशिश की है।
गुलाम अहमद मीर के साथ राहुल गांधी ने अपने विश्वस्त नेताओं को भी अहम जिम्मेदारियां दी हैं। अमेठी के सांसद किशोरी लाल शर्मा और पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव को भी बंगाल चुनाव में उतारा गया है। खास बात यह रही कि राहुल गांधी ने दिल्ली के तथाकथित स्वयंभू नेताओं की भीड़ को बंगाल जाने से रोका और केवल प्रभावशाली चेहरों को ही जिम्मेदारी सौंपी।
बंगाल की सामाजिक बनावट को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस ने बिहार और झारखंड के नेताओं को भी प्रचार में उतारा है। पप्पू यादव, जो युवाओं के बीच खासे लोकप्रिय माने जाते हैं, और झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी को मैदान में उतारना इसी रणनीति का हिस्सा है। पप्पू यादव की पहचान केवल बिहार तक सीमित नहीं है, उनकी पकड़ राष्ट्रीय स्तर पर भी है, जिसका फायदा कांग्रेस को मिल सकता है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे खुद चुनाव की कमान संभाले हुए हैं और लगातार जनसभाएं कर रहे हैं। उनकी सक्रियता यह संकेत देती है कि पार्टी इस बार बंगाल को लेकर गंभीर है और अपनी खोई जमीन वापस लेने के लिए पूरी कोशिश कर रही है।
वर्तमान स्थिति में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ खास नहीं है, लेकिन पाने के लिए काफी कुछ है। एक समय बंगाल की सत्ता में रह चुकी कांग्रेस आज विधानसभा में शून्य पर है। अगर पार्टी इस चुनाव में अपना वोट बैंक बढ़ाने में सफल रहती है, तो इसका सीधा फायदा 2029 के लोकसभा चुनाव में मिल सकता है।
राज्य में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और मुख्य विपक्षी भाजपा के बीच जारी तीखी राजनीतिक लड़ाई भी कांग्रेस के लिए अवसर बन सकती है। दोनों दल एक-दूसरे पर लगातार हमले कर रहे हैं, जिससे तीसरे विकल्प के रूप में कांग्रेस के लिए जगह बनती दिख रही है।
अब नजरें 4 मई को आने वाले चुनाव परिणामों पर टिकी हैं। यह साफ है कि कांग्रेस इस बार पहले से ज्यादा गंभीर है। चुनावी सभाओं और रोड शो में उमड़ती भीड़ यह संकेत दे रही है कि पार्टी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। बंगाल में अभी भी कांग्रेस को चाहने वाले लोग मौजूद हैं, बस उन्हें भरोसा दिलाने की जरूरत है।
दो दशक से सत्ता से बाहर रहने के कारण कांग्रेस के पास मजबूत स्थानीय नेतृत्व का अभाव जरूर है, लेकिन जमीन पूरी तरह खाली नहीं हुई है। सवाल यही है कि क्या राहुल गांधी का “मैं हूं ना” वाला भरोसा जनता को फिर से कांग्रेस के साथ जोड़ पाएगा? इसका जवाब आने वाले नतीजे ही देंगे।
















