कर्नाटक मॉडल से कांग्रेस को क्या सीखना चाहिए?

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photo courtesy social media

-राज्यों में सुरजेवाला जैसे प्रभारियों की जरूरत

 राहुल गांधी को राज्यों में राष्ट्रीय प्रभारी के रूप में पूर्व मुख्यमंत्रियों की बजाय रणदीप सिंह सुरजेवाला जैसे पूर्णकालिक, संगठनात्मक समझ रखने वाले और राजनीतिक रूप से कुशल नेताओं को जिम्मेदारी देनी चाहिए। कर्नाटक का हालिया अनुभव इस मॉडल की सफलता का संकेत देता है।

-देवेंद्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

कर्नाटक में कांग्रेस हाईकमान और राहुल गांधी ने सिद्धारमैया की जगह डी.के. शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाया है। राजनीतिक गलियारों में राहुल गांधी की इस रणनीति की खूब चर्चा हो रही है। कहा जा रहा है कि राहुल गांधी को पहली बार इतने कठोर और निर्णायक फैसले लेते हुए देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि उनके ऐसे फैसलों से कांग्रेस मजबूत होगी, क्योंकि पार्टी का आम कार्यकर्ता लंबे समय से इसी तरह के निर्णयों की अपेक्षा कर रहा था।

लेकिन कर्नाटक के घटनाक्रम से राहुल गांधी और कांग्रेस के लिए एक और महत्वपूर्ण संदेश निकलकर सामने आया है, जिस पर राजनीतिक विश्लेषकों और पंडितों की नजर अपेक्षाकृत कम गई है। वह यह कि कांग्रेस को राज्यों में रणदीप सिंह सुरजेवाला जैसे अनुभवी, सुलझे हुए और राजनीतिक रणनीतिकार प्रभारियों की आवश्यकता है। उनके प्रयासों से लंबे समय से चल रहा मुख्यमंत्री पद का विवाद सुलझा और राहुल गांधी को एक व्यवस्थित समाधान मिला।

सत्ता और संगठन में एक साथ बदलाव

कांग्रेस के लिए यह बड़ी उपलब्धि है कि कर्नाटक में सत्ता और संगठन, दोनों में एक साथ और बिना किसी बड़े विवाद के बदलाव हो गया। डी.के. शिवकुमार कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने, वहीं बी.के. हरिप्रसाद को कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया और पूर्व मुख्यमंत्री तथा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया को कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) का सदस्य बनाया गया। तीनों नेताओं के नामों की घोषणा 3 जून को एक ही दिन की गई। अब कर्नाटक की तरह अन्य राज्यों में भी कांग्रेस कार्यकर्ता यह इंतजार कर रहे हैं कि उनके राज्यों में भी राहुल गांधी इसी प्रकार के बड़े और निर्णायक फैसले लें। इसके लिए राज्यों में रणदीप सिंह सुरजेवाला जैसे प्रभावी प्रभारियों की आवश्यकता है।

पूर्व मुख्यमंत्रियों को प्रभारी बनाने का अनुभव

मैंने पहले भी अपने ब्लॉग में लिखा था कि राहुल गांधी को राज्यों में पूर्व मुख्यमंत्रियों को प्रभारी बनाकर नहीं भेजना चाहिए। अक्सर देखा गया है कि पूर्व मुख्यमंत्रियों का ध्यान अपने राज्य की राजनीति पर अधिक रहता है और प्रभार वाले राज्यों पर अपेक्षित फोकस नहीं हो पाता। उनकी प्राथमिकता यह भी रहती है कि अपने राज्य में वे दोबारा मुख्यमंत्री कैसे बनें। यह भी देखा गया है कि कई बार पूर्व मुख्यमंत्री अपने प्रभार वाले राज्यों में कांग्रेस के भीतर चल रही गुटबाजी को समाप्त करने के बजाय उसे और उलझा देते हैं।

पंजाब का उदाहरण

इसका सबसे बड़ा उदाहरण पंजाब है। 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को पंजाब का प्रभारी बनाया था। उस समय पंजाब में कांग्रेस की सरकार थी और कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री थे।विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री पद को लेकर पंजाब कांग्रेस में बड़ा विवाद खड़ा हो गया। कांग्रेस हाईकमान ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर राज्य के प्रमुख दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन इससे विवाद समाप्त नहीं हुआ। अंततः नेताओं की गुटबाजी ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया।

भूपेश बघेल भी नहीं सुलझा पाए गुटबाजी

पंजाब में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं और कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को राज्य का प्रभारी बना रखा है। लंबा समय बीत जाने के बाद भी वे पंजाब कांग्रेस के भीतर नेताओं की गुटबाजी को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाए हैं। इसका असर हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों के परिणामों में भी दिखाई दिया, जहां कांग्रेस अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकी।

गुजरात में कांग्रेस का अनुभव

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को कांग्रेस हाईकमान ने 2017 और 2022 के गुजरात विधानसभा चुनावों में मुख्य पर्यवेक्षक बनाकर भेजा था। 2017 में कांग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में दिखाई दे रही थी, लेकिन सत्ता तक नहीं पहुंच सकी। उसी चुनाव में राहुल गांधी ने भाजपा सरकार के खिलाफ “गब्बर सिंह टैक्स” का नारा दिया था। इसके बाद 2022 में गुजरात चुनाव में एक बार फिर रघु शर्मा और अशोक गहलोत की जोड़ी राष्ट्रीय प्रभारी और मुख्य पर्यवेक्षक के रूप में मैदान में उतरी, लेकिन कांग्रेस को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा।

राजस्थान का राजनीतिक सवाल

गुजरात में कांग्रेस 2017 में सरकार नहीं बना सकी, लेकिन 2018 में राजस्थान में कांग्रेस सत्ता में आ गई और अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने। यह सवाल राजनीतिक रूप से अक्सर उठता है कि क्या गुजरात में मिली हार के बावजूद गहलोत को राजस्थान में नेतृत्व का अवसर मिला, जबकि मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सचिन पायलट भी प्रमुख दावेदार थे। 2018 में कांग्रेस ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्ता में वापसी की थी। इनमें राजस्थान ही ऐसा राज्य था, जहां कांग्रेस को 200 में से केवल 100 सीटें मिली थीं। इसके बावजूद पार्टी ने सरकार बनाई और उसे पांच वर्ष तक बनाए रखा।

मध्य प्रदेश में कांग्रेस को अपेक्षाकृत अधिक बहुमत मिलने के बावजूद भाजपा सरकार बनाने में सफल रही, जबकि राजस्थान में पूर्ण बहुमत से कम संख्या होने के बावजूद भाजपा मध्य प्रदेश की तरह सत्ता परिवर्तन नहीं करा सकी। यह राजनीतिक विश्लेषण का विषय है कि राजस्थान में भाजपा का तथाकथित “ऑपरेशन लोटस” सफल क्यों नहीं हो पाया और अशोक गहलोत पूरे पांच वर्ष तक सरकार चलाने में कैसे सफल रहे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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