
-दूसरी बार राज्यसभा प्रत्याशी बनने के मायने क्या हैं?
-देवेंद्र यादव-

इसी महीने जून में होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है। प्रत्याशियों के नाम घोषित होने से पहले कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता पवन खेड़ा के नाम की काफी चर्चा थी। हालांकि कांग्रेस ने पवन खेड़ा को राजस्थान की बजाय कर्नाटक से राज्यसभा भेजने का फैसला किया है। वहीं, राजस्थान से लगातार दूसरी बार दलित नेता और वर्तमान राज्यसभा सांसद नीरज डांगी को उम्मीदवार बनाया गया है।
राजस्थान से लगातार दूसरी बार नीरज डांगी को प्रत्याशी बनाए जाने के पीछे कांग्रेस क्या राजनीतिक संदेश देना चाहती है, इसका स्पष्ट संकेत आने वाले दिनों में मिलेगा। लेकिन इतना तय है कि नीरज डांगी पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के करीबी नेताओं में गिने जाते हैं। राजस्थान एनएसयूआई और युवक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष से लेकर पहली बार राज्यसभा तक पहुंचने में अशोक गहलोत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या दूसरी बार भी नीरज डांगी को राज्यसभा का प्रत्याशी बनाने के पीछे अशोक गहलोत की निर्णायक भूमिका रही है? और यदि ऐसा है, तो इसके पीछे उनकी राजनीतिक रणनीति क्या है?
क्या राजस्थान कांग्रेस में बदलाव की तैयारी है?
राजस्थान विधानसभा चुनाव 2028 से पहले प्रदेश कांग्रेस संगठन में बदलाव की चर्चाएं लंबे समय से चल रही हैं। वर्तमान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा को इस पद पर रहते हुए काफी समय हो चुका है। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या कांग्रेस राजस्थान में किसी दलित नेता को प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपने पर विचार कर रही है? और यदि ऐसा होता है तो क्या नीरज डांगी इस पद के प्रमुख दावेदार हो सकते हैं?
नीरज डांगी संगठनात्मक रूप से मजबूत नेता माने जाते हैं। वे छात्र राजनीति से लेकर युवक कांग्रेस तक में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। इसके अलावा वे प्रदेश कांग्रेस कमेटी में लंबे समय तक महासचिव भी रहे हैं। संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है।
नीरज डांगी एक समर्पित कांग्रेसी नेता हैं और गांधी परिवार के प्रति उनकी निष्ठा भी जगजाहिर है। उनके पिता दिनेश डांगी भी विधायक और मंत्री रह चुके हैं, जिससे उन्हें राजनीतिक विरासत का भी लाभ मिला है।
क्या यह सचिन पायलट को संतुलित करने की रणनीति है?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नीरज डांगी को दूसरी बार राज्यसभा का प्रत्याशी बनवाने में अशोक गहलोत की भूमिका रही है? और क्या भविष्य में उन्हें राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया जा सकता है?
यदि नीरज डांगी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाता है, तो राजनीतिक विश्लेषक इसे राजस्थान कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन की रणनीति के रूप में भी देख सकते हैं। यह भी चर्चा का विषय रहेगा कि क्या ऐसा कदम सचिन पायलट के प्रभाव को संतुलित करने की दिशा में उठाया जा सकता है। हालांकि इन सभी सवालों के जवाब आने वाले समय में ही मिलेंगे।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि कांग्रेस राजस्थान से अपने राज्यसभा प्रत्याशी को निर्वाचित कराने की स्थिति में है और नीरज डांगी का लगातार दूसरी बार राज्यसभा पहुंचना लगभग तय माना जा रहा है।
बड़े नामों के बीच नीरज डांगी को मिली प्राथमिकता
राजस्थान से राज्यसभा जाने की दौड़ में कई बड़े नाम चर्चा में थे। इनमें विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष सी.पी. जोशी, कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह, पवन खेड़ा और यहां तक कि अशोक गहलोत का नाम भी शामिल था। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व ने अंततः नीरज डांगी के नाम पर मुहर लगाई।
जहां तक नीरज डांगी को प्रत्याशी बनाए जाने का सवाल है, कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र गौतम की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बताया जाता है कि उन्होंने भी डांगी की उम्मीदवारी के समर्थन में सक्रिय प्रयास किए।
दलित नेतृत्व को आगे बढ़ाने की कांग्रेस की कोशिश
राहुल गांधी और राजेंद्र गौतम दोनों ही कांग्रेस के पारंपरिक सामाजिक आधार को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। पार्टी का प्रयास दलित, पिछड़े और वंचित वर्गों के बीच अपनी पकड़ को फिर से मजबूत करना है। इसी रणनीति के तहत संगठन और सत्ता में दलित नेताओं को अधिक प्रतिनिधित्व देने पर जोर दिया जा रहा है।
नीरज डांगी को दूसरी बार राज्यसभा का प्रत्याशी बनाए जाने को भी इसी व्यापक राजनीतिक रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा सकता है। डांगी को कांग्रेस का मजबूत, समर्पित और संगठननिष्ठ नेता माना जाता है, जिसके कारण पार्टी नेतृत्व ने उन पर दोबारा भरोसा जताया है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

















