
राजस्थान की एक राज्यसभा सीट ने कांग्रेस के भीतर सियासी हलचल तेज कर दी है। विधानसभा गणित के चलते भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के हिस्से में आने वाली इस अकेली सीट पर कई दावेदार मैदान में हैं। राहुल गांधी की बढ़ती भूमिका, अशोक गहलोत का बदलता प्रभाव और अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व की मांग—इन सबके बीच यह चुनाव सिर्फ एक सीट नहीं, बल्कि कांग्रेस की राजनीतिक दिशा और संदेश तय करने वाला माना जा रहा है।
-देवेन्द्र यादव-

राजस्थान से राज्यसभा की तीन सीटें जल्द खाली होने जा रही हैं, जिन पर होने वाले चुनाव ने सियासी हलचल तेज कर दी है। मौजूदा विधानसभा गणित के आधार पर यह लगभग तय माना जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी दो सीटों पर बढ़त में रहेगी, जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के हिस्से में एक सीट आ सकती है। यही एक सीट कांग्रेस के भीतर सबसे बड़ी राजनीतिक जंग का केंद्र बनती दिख रही है।
राजधानी जयपुर से लेकर दिल्ली तक, कांग्रेस के कई बड़े नेता इस एक सीट के लिए सक्रिय हो चुके हैं। पार्टी के अंदरूनी हलकों में इसे “एक अनार सौ बीमार” वाली स्थिति कहा जा रहा है। खास बात यह है कि सिर्फ राजस्थान के नेता ही नहीं, बल्कि दिल्ली से जुड़े वे चेहरे भी इस सीट पर नजर गड़ाए हुए हैं, जो लंबे समय से संगठन में सक्रिय हैं लेकिन फिलहाल किसी पद पर नहीं हैं।
दरअसल, पिछले वर्षों में अशोक गहलोत के नेतृत्व में राजस्थान से राज्यसभा भेजे गए कई नेताओं का संबंध दिल्ली की राजनीति से रहा है। इसे गहलोत की संगठनात्मक रणनीति के रूप में देखा गया, जिसके जरिए उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व के साथ अपने समीकरण मजबूत किए। हालांकि अब परिस्थितियां कुछ बदली हुई नजर आ रही हैं।
कांग्रेस के भीतर निर्णय प्रक्रिया में राहुल गांधी की सक्रियता बढ़ी है, और टिकट चयन में उनका सीधा हस्तक्षेप भी माना जा रहा है। साथ ही मल्लिकार्जुन खड़गे के नेतृत्व में संगठनात्मक संतुलन साधने की कोशिशें भी जारी हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि राजस्थान की इस सीट पर अंतिम मुहर किस नाम पर लगती है—और उसमें किस गुट या रणनीति की झलक मिलती है।
इस पूरे समीकरण में एक अहम सवाल अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व का भी उभरकर सामने आया है। राजस्थान में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या और उनका चुनावी प्रभाव कई सीटों पर निर्णायक माना जाता है। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता—चाहे वे गहलोत खेमे से हों या अन्य गुटों से—मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन से ही चुनावी सफलता हासिल करते रहे हैं। इसके बावजूद, वर्तमान में राज्य से संसद में मुस्लिम प्रतिनिधित्व लगभग नगण्य है।
इसी को आधार बनाकर पार्टी के भीतर और बाहर यह मांग उठ रही है कि इस बार कांग्रेस राज्यसभा की सीट पर किसी मुस्लिम नेता को मौका दे। इसे न केवल प्रतिनिधित्व के नजरिए से, बल्कि राजनीतिक संदेश के तौर पर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
दावेदारों की सूची लंबी है, लेकिन कुछ नाम संगठन के भीतर चर्चा में हैं। इनमें राजस्थान अल्पसंख्यक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष एमडी चौपदार का नाम भी लिया जा रहा है, जिन्हें युवा, सक्रिय और संगठन से जुड़े चेहरे के तौर पर देखा जाता है। हालांकि, पार्टी के अंदर गुटबाजी—खासतौर पर गहलोत और सचिन पायलट खेमे के बीच—कई नेताओं के रास्ते में बाधा भी बन सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के लिए यह फैसला सिर्फ एक सीट भरने का मामला नहीं है, बल्कि 2028 के विधानसभा चुनावों की तैयारी का हिस्सा भी है। राज्य में नए राजनीतिक समीकरण बन रहे हैं और अल्पसंख्यक वोट बैंक को साधे रखना पार्टी के लिए जरूरी चुनौती बना हुआ है। इस संदर्भ में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन और उसके नेता असदुद्दीन ओवैसी की संभावित सक्रियता को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, भले ही फिलहाल उनकी जमीनी मौजूदगी सीमित हो।
कुल मिलाकर, राजस्थान की यह एक राज्यसभा सीट कांग्रेस के लिए “पद” से कहीं ज्यादा “संदेश” तय करने वाली साबित हो सकती है। क्या पार्टी अनुभव को तरजीह देगी या युवा चेहरे को आगे बढ़ाएगी? क्या क्षेत्रीय संतुलन साधा जाएगा या सामाजिक प्रतिनिधित्व को प्राथमिकता मिलेगी? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में साफ होंगे, लेकिन फिलहाल इतना तय है कि इस एक सीट ने कांग्रेस के भीतर सियासी तापमान बढ़ा दिया है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं।)

















