पंजाब निकाय चुनाव: क्या 2027 की सत्ता की चाबी दलित मतदाताओं के हाथ में है?

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photo courtesy social media

-निकाय चुनाव परिणामों ने दिए महत्वपूर्ण संकेत

-देवेंद्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

पंजाब में वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। वर्ष 2022 में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर पहली बार आम आदमी पार्टी ने अपनी सरकार बनाई थी। वर्तमान में राज्य में स्थानीय निकाय चुनाव चल रहे हैं और अब तक आए परिणामों में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी अन्य दलों की तुलना में बढ़त बनाए हुए दिखाई दे रही है।

इन निकाय चुनाव परिणामों की समीक्षा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय जनता पार्टी पश्चिम बंगाल की तरह पंजाब में भी पहली बार अपनी सरकार बनाने का सपना देख रही है। वहीं कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल सत्ता में वापसी की कोशिश कर रहे हैं। निकाय चुनाव के परिणाम संकेत दे रहे हैं कि पंजाब में फिलहाल आम आदमी पार्टी का जनाधार कांग्रेस और अकाली दल पर भारी पड़ता नजर आ रहा है। भाजपा की स्थिति पर फिलहाल अधिक चर्चा करना उचित नहीं होगा, क्योंकि पंजाब की राजनीति में लंबे समय तक कांग्रेस और अकाली दल का ही वर्चस्व रहा है। वर्ष 2022 में आम आदमी पार्टी ने पहली बार इन दोनों दलों को पराजित कर सत्ता हासिल की थी।

2027 का रास्ता क्या निकाय चुनाव तय करेंगे?

निकाय चुनाव के परिणाम कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर रहे हैं। क्या आम आदमी पार्टी 2027 में भी अपनी सरकार बरकरार रख पाएगी? क्या कांग्रेस या अकाली दल सत्ता में वापसी करेंगे? और क्या भाजपा पंजाब में पहली बार सरकार बनाने में सफल होगी? इन सभी सवालों का जवाब काफी हद तक पंजाब के दलित मतदाताओं पर निर्भर करेगा। पंजाब में दलित मतदाताओं की संख्या लगभग 32 प्रतिशत है। राज्य की 117 विधानसभा सीटों में से 32 सीटें अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित हैं। इसके अलावा लगभग 50 विधानसभा सीटों पर दलित मतदाता चुनावी परिणामों को निर्णायक रूप से प्रभावित करते हैं।

कांग्रेस और दलित समर्थन का पुराना रिश्ता

पंजाब में कांग्रेस लंबे समय तक सत्ता में इसलिए भी बनी रही क्योंकि उसे दलित मतदाताओं का मजबूत समर्थन प्राप्त था।वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद को लेकर कांग्रेस के भीतर जबरदस्त खींचतान चली थी। उस समय राहुल गांधी ने चुनाव से ठीक पहले पंजाब के प्रमुख दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया था। हालांकि चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा और आम आदमी पार्टी सत्ता में आ गई। इसके बावजूद, वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने पंजाब में आठ लोकसभा सीटें जीतीं और चरणजीत सिंह चन्नी स्वयं भी लोकसभा चुनाव जीतने में सफल रहे। इससे यह स्पष्ट हुआ कि चन्नी का जनाधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

क्या कांग्रेस ने अपने दलित नेतृत्व की उपेक्षा की?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि पंजाब में बड़ी दलित आबादी होने के बावजूद कांग्रेस निकाय चुनावों में अपेक्षित प्रदर्शन क्यों नहीं कर सकी? क्या पंजाब कांग्रेस के गैर-दलित नेतृत्व ने पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, दलित कार्यकर्ताओं और दलित मतदाताओं की उपेक्षा की? क्या इसका असर निकाय चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन पर पड़ा? दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी के प्रभाव वाले क्षेत्रों में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया, जबकि राज्य के कई अन्य क्षेत्रों में पार्टी पीछे रह गई।

राहुल गांधी की फटकार का असर क्यों नहीं दिखा?

निकाय चुनाव से पहले लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पंजाब गए थे। उन्होंने एक जनसभा में मंच पर मौजूद पंजाब कांग्रेस के नेताओं को कार्यकर्ताओं के सामने कड़ी फटकार लगाई थी और स्पष्ट संदेश दिया था कि सभी नेताओं को एकजुट होकर काम करना चाहिए। लेकिन निकाय चुनाव के परिणाम यह सवाल खड़ा करते हैं कि राहुल गांधी की उस अपील और फटकार का वास्तविक असर कितना हुआ। परिणामों से तो यही लगता है कि पंजाब कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

क्या पंजाब कांग्रेस में केवल एक नहीं, कई ‘सिद्धू’ हैं?

राजनीतिक विश्लेषक अक्सर नवजोत सिंह सिद्धू को अत्यधिक महत्वाकांक्षी नेता बताते हुए पंजाब कांग्रेस की कमजोरियों के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराते हैं। लेकिन वास्तविकता शायद इससे कहीं अधिक जटिल है। पंजाब कांग्रेस में केवल एक नवजोत सिंह सिद्धू नहीं हैं, बल्कि कई ऐसे नेता हैं जिनकी प्राथमिकता संगठन से अधिक व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षा दिखाई देती है। कांग्रेस को मजबूत करने के बजाय यदि नेता केवल सत्ता और पद की राजनीति में उलझे रहें, तो पार्टी को नुकसान होना स्वाभाविक है। राहुल गांधी को यह समझना होगा कि पंजाब में चुनावी सफलता का रास्ता केवल नेतृत्व परिवर्तन से नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों को साधने से होकर गुजरता है। विशेष रूप से दलित मतदाता आज भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

चरणजीत सिंह चन्नी पर भरोसा बढ़ाने की जरूरत

राहुल गांधी ने वर्ष 2022 में पंजाब की सामाजिक और राजनीतिक वास्तविकताओं को समझते हुए चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया था। लेकिन सत्ता से बाहर होने के बाद कांग्रेस ने न तो राज्य स्तर पर और न ही राष्ट्रीय स्तर पर चन्नी को कोई बड़ी संगठनात्मक जिम्मेदारी दी। आलोचकों का मानना है कि पंजाब कांग्रेस के स्थानीय नेतृत्व और प्रदेश प्रभारी भूपेश बघेल ने भी चन्नी को वह राजनीतिक महत्व नहीं दिया, जिसके वे हकदार थे। यदि यह धारणा दलित समाज में मजबूत होती है कि कांग्रेस उनके नेतृत्व की उपेक्षा कर रही है, तो वर्ष 2027 में पार्टी की सत्ता में वापसी और भी कठिन हो सकती है।

निकाय चुनाव का सबसे बड़ा संदेश

निकाय चुनाव के परिणामों से एक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है कि चरणजीत सिंह चन्नी आज भी पंजाब में कांग्रेस के लोकप्रिय और प्रभावशाली नेताओं में शामिल हैं। जिन क्षेत्रों में उनका प्रभाव है, वहां कांग्रेस का प्रदर्शन अपेक्षाकृत बेहतर रहा है। ऐसे में यदि कांग्रेस 2027 में सत्ता में वापसी का सपना देख रही है, तो उसे दलित नेतृत्व को केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वास्तविक राजनीतिक महत्व देना होगा।

चन्नी जैसे नेताओं पर अधिक भरोसा जताना होगा

पंजाब की राजनीति में दलित मतदाता निर्णायक शक्ति हैं। आम आदमी पार्टी की मौजूदा बढ़त, कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी और दलित नेतृत्व की उपेक्षा जैसे मुद्दे आने वाले विधानसभा चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। यदि कांग्रेस को 2027 में सत्ता में वापसी करनी है, तो उसे चरणजीत सिंह चन्नी जैसे नेताओं पर अधिक भरोसा जताना होगा, दलित समाज के साथ अपने संबंधों को मजबूत करना होगा और संगठनात्मक एकजुटता सुनिश्चित करनी होगी। अन्यथा निकाय चुनावों के ये संकेत भविष्य में और भी बड़े राजनीतिक संदेश में बदल सकते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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