रणनीति की चूक या नेतृत्व की कमजोरी? क्यों पिछड़ रही है कांग्रेस

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photo courtesy social media
कांग्रेस को चुनाव में सफल होने के लिए तीन बड़े बदलाव करने होंगे—रणनीति को गोपनीय रखना, स्थानीय कार्यकर्ताओं पर भरोसा बढ़ाना और संगठन को दिखावे की बजाय प्रभावशाली बनाना। तभी पार्टी दोबारा मजबूत स्थिति में लौट सकती है।

-देवेंद्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

कांग्रेस चुनाव में सफल क्यों नहीं हो पा रही और भाजपा क्यों लगातार जीत रही है? यदि इसका राजनीतिक विश्लेषण किया जाए तो सबसे बड़ा फर्क चुनावी रणनीति के तरीके में नजर आता है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता और रणनीतिकार चुनावी मैदान में उतरने से पहले ही अपनी रणनीति का सार्वजनिक रूप से बखान करने लगते हैं, जबकि भारतीय जनता पार्टी अपने चुनावी दांव-पेच आखिरी समय तक गोपनीय रखती है।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण विभिन्न राज्यों में मुख्यमंत्री चयन को लेकर देखा जा सकता है। भाजपा चुनाव के अंत तक यह नहीं बताती कि सत्ता में आने पर मुख्यमंत्री कौन होगा। चुनाव के दौरान केवल अटकलें ही लगती रहती हैं और जब पार्टी हाईकमान अंतिम फैसला करता है तो तमाम राजनीतिक विश्लेषकों की भविष्यवाणियां गलत साबित हो जाती हैं। दूसरी ओर कांग्रेस चुनाव की घोषणा से पहले ही अपनी रणनीति को सार्वजनिक कर देती है, जिसका सीधा नुकसान उसे चुनाव परिणामों में उठाना पड़ता है।
कांग्रेस हाईकमान चुनावी राज्यों में सबसे पहले वार रूम बनाता है, सर्वे कराए जाते हैं और प्रत्याशियों के चयन की बातें खुले तौर पर चर्चा में आ जाती हैं। कहने को सर्वे गोपनीय बताए जाते हैं, लेकिन टिकट के इच्छुक कार्यकर्ताओं को भी यही कहा जाता है कि अपने क्षेत्र में सक्रिय रहो, सर्वे चल रहा है। सवाल यह है कि क्या कभी भाजपा की ओर से इस तरह की बातें खुले तौर पर सामने आती हैं? शायद ही कभी।
यही कारण है कि चुनाव के समय कांग्रेस के भीतर गुटबाजी और अंदरूनी विरोध खुलकर सामने आता है। जब रणनीति पहले ही सार्वजनिक हो जाती है तो विरोधी दल सतर्क हो जाता है और उसी के अनुसार अपनी रणनीति तैयार कर लेता है। भाजपा कांग्रेस की कमजोर नस पहचानकर चुनावी रणनीति बनाती है और सफल भी होती है। कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी उसके नेताओं का बड़बोलापन बन गया है।
2014 में सत्ता से बाहर होने के बाद भी कांग्रेस के कई नेता अब तक उसी भ्रम में जी रहे हैं कि जनता उन्हें वापस सत्ता में लाने के लिए तैयार बैठी है। चाहे लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव, कांग्रेस के कुछ नेता चुनाव से पहले ही जीत मानकर चलते हैं। यही मानसिकता पार्टी को लगातार नुकसान पहुंचा रही है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार मेहनत कर रहे हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन जब चुनाव परिणाम आते हैं तो ऐसा लगता है कि वह अकेले ही पार्टी को खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि बाकी कई नेता अभी भी राजनीतिक भ्रम में जी रहे हैं।
कांग्रेस को यदि वास्तव में चुनाव में सफल होना है तो उसे सबसे पहले अपनी रणनीति को गोपनीय रखना होगा। बयानबाजी करने वाले नेताओं से दूरी बनानी होगी और प्रत्याशियों के चयन के लिए केवल सर्वे पर निर्भर रहने के बजाय ब्लॉक और जिला स्तर पर मजबूत और ईमानदार कार्यकर्ताओं की टीम बनानी होगी।
2014 के बाद संगठन में बड़े पैमाने पर बदलाव जरूर किए गए, लेकिन जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी कार्यकारिणियां बन गईं। इनमें ऐसे पदाधिकारी भी बड़ी संख्या में दिखाई देते हैं जिनका अपने क्षेत्र या समाज में कोई प्रभाव नहीं है। ऐसे ही लोग यह भ्रम फैलाते हैं कि भाजपा कमजोर हो रही है और कांग्रेस सत्ता में लौट रही है।
राहुल गांधी ने लखनऊ में कांशीराम जन्मशताब्दी कार्यक्रम के मंच से कहा था कि कांग्रेस को मजबूत करने के लिए हजारों नहीं, बल्कि सौ ईमानदार और मजबूत कार्यकर्ता ही काफी हैं। बात बिल्कुल सही है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसकी झलक अभी दिखाई नहीं देती।
चुनाव की घोषणा होते ही कांग्रेस की ओर से पर्यवेक्षक और कोऑर्डिनेटर बनाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। सवाल यह है कि जिन नेताओं का उस राज्य में कोई राजनीतिक आधार ही नहीं है, वे वहां जाकर क्या भूमिका निभाते हैं? चुनावी राज्यों में स्थानीय कार्यकर्ता कम और बाहरी नेता अधिक नजर आते हैं। इसका फायदा पार्टी को नहीं, बल्कि नुकसान ही होता है।
स्थानीय कार्यकर्ता खुद को उपेक्षित महसूस करता है और धीरे-धीरे सक्रियता कम कर देता है। कांग्रेस को यदि मजबूत होना है तो दिल्ली से नेताओं को भेजने की बजाय स्थानीय नेतृत्व पर भरोसा करना होगा। जिम्मेदारी भी स्थानीय कार्यकर्ताओं को ही देनी होगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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