सप्तपर्णी …सात पत्तों का साथ जीवन के अर्थ का प्रकाश

सप्तपर्णी सुकून देती है वह अपनी ओर ध्यान आकृष्ट करती है। पत्तों में एक स्निग्ध सी सौंदर्य रचना होती है कि बस देखते रह जाएं। यह पौधे से पेड़ बहुत जल्द ही हो जाता। चार पांच साल में तो सप्तपर्णी की घनघोर छाया अलग से ही ध्यान खींचने लगती है। यह अपने ढंग से अपनी और बुलाती है।

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-विवेक कुमार मिश्र-

सप्तपर्णी, सात पत्तों के साथ फूटती है। हर पत्ता इस तरह से हो जैसे कि जीवन कथा कह रहा हो। एक एक पत्ते पर विचार करते चलें और अपने होने को, अपने अस्तित्व को सात जन्मों तक जीते चलें। सात पत्ते सात जन्मों तक चलें जाते हैं, इतिहास में ले जाते हैं। सभ्यता और संस्कृति में ले जाते हैं तो मां … प्रकृति मां किस तरह से हमारा संरक्षण करती हैं, यह सप्तपर्णी के इन हरित पत्तों को देखकर अनुभव में लाते हुए, जीवन जीने के क्रम में महसूस किया जा सकता है। एक साथ… सात पत्तों का साथ। कितना अर्थ भरा सात पत्तों का साथ होता। इसे तो वही जानेंगे जो सप्तपर्णी की छाया में बैठे होंगे घड़ी दो घड़ी।

डॉ. विवेक कुमार मिश्र

सप्तपर्णी सुकून देती है वह अपनी ओर ध्यान आकृष्ट करती है। पत्तों में एक स्निग्ध सी सौंदर्य रचना होती है कि बस देखते रह जाएं। यह पौधे से पेड़ बहुत जल्द ही हो जाता। चार पांच साल में तो सप्तपर्णी की घनघोर छाया अलग से ही ध्यान खींचने लगती है। यह अपने ढंग से अपनी और बुलाती है। एक साहित्यिक मित्र हैं कि चलते – चलते एक – एक पेड़ को दिखाते जाएंगे और उनके आगे पीछे की कहानी इस तरह सुनाएंगे कि पेड़ों के साथ उनका जन्म जन्मांतर का कोई गहरा रिश्ता हो। वैसे भी हमारी संस्कृति में पेड़ों के साथ जीवन कथा व जीवन बोध की अनंत कथाएं गुथी हुई हैं। जब सप्तपर्णी की बात करते हैं तो मानवीय रिश्तो में सात जन्मों की कथा चल पड़ती है। पति – पत्नी के रिश्ते में सात फेरों से सात जन्मों की कथा, सप्तपर्णी के साथ पत्तों से की जाती है। सात पत्ते और जीवन है न दिलचस्प। जीवन कथाएं इसी तरह चलती रहती हैं। साहित्यिक मित्र शशि प्रकाश चौधरी पेड़ों के पत्ते, छाल, गंध और रंग को लेकर बराबर जीवंत व्याख्या करते रहते हैं। वैसे भी देखा जाए तो साहित्य और जीवन जीवंत व्याख्या की ही मांग करते हैं। जीवन को ठस व्याख्या से नहीं समझा जा सकता। ठस व्याख्या रूकी होती है वह आगे बढ़ती ही नहीं। नये के लिए वहां जगह ही नहीं होती जबकि जीवन हर पल नये पन से प्रकाशित होता रहता है। ठस व्याख्या से जीवन की गतियां जीवन की नाड़ियां अवरुद्ध हो जाती हैं और एक ठहरा हुआ जीवन कहीं नहीं ले जाता । अंततः वह जीवन से राग से दूर करता है। जब आपके पास जीवन की जीवंत व्याख्या हो तो जीवन के बहुतेरे अर्थ खुलते हैं। उन्हीं पदार्थों से जीवन में खुशियां आती हैं जो आपके आसपास होती हैं। खुशी के लिए कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं होती। तमाम खुशियां आसपास होती हैं। आसपास की प्रकृति को देखें, विचार करें, थोड़ा ठहर कर चीजों को, संसार को देखें फिर आगे बढ़े। प्रकृति ने जाने कितने रहस्यों से भरी हुई है पर जब देखेंगे ही नहीं, यूं ही भागते रहेंगे तो जो संसार आपके पास होगा वह आपके ही हारे थके मन का संकेत होगा । इस तरह न दुनिया चलती है न आप स्वयं चलते हैं । संसार को समझने के लिए अपने आसपास के संसार को देखने और जीवंत छवि के रूप में जीने की जरूरत महसूस होती है और जो भी इस तरह संसार को, जीवन को देखता है और जीता है वहीं सही मायने में जीवन को जीता है । चलते चलते आसपास , प्रकृति और प्रकृति के उन तमाम चिन्ह और संकेत की व्याख्या करते चलें। फिर जीवन के बहुतेरे अर्थ जीवंत छवियां आंखों के आगे तैरने लगती हैं। इसी तरह साहित्य को भी रूढ़ शब्दों से निकाल कर जब जीवंत छवियों में अर्थ को ढूंढते हैं तो नया संदर्भ और नया अर्थ प्रकाशित होता है ।

सप्त पतियों की यह श्रृंखला जीवन की भी श्रृंखला होती है

बात सप्तपर्णी की चल रही है तो सप्तपर्णी को देखें हर शाखा के साथ जो पत्तियां फूटती हैं वो सात पत्ती फूटती है । सप्त पतियों की यह श्रृंखला जीवन की भी श्रृंखला होती है और यह सात पत्तियां जीवन की शुभता की ओर , जीवन की नवता की ओर संकेत करती हैं । चौधरी जी भी सप्तपर्णी को दिखाते हुए यही कहते हैं कि देखिए विवेक जी यह सप्तपर्णी एक साथ सात पत्तों के संग सात जन्मो तक रहने की सीख देता है। पेड़ हमारी संस्कृति में रिश्तो की ऐसी पाठशाला है जहां से जीवन के अनुभव की पाठशाला को हम सब पढ़ते रहते हैं। सप्तपर्णी शांत, सील और सहज है। सुबह की सुनहरी धूप जब सप्तपर्णी पर पड़ती है तो हरित और सुनहरी आभा के साथ एक नई दुनिया ही चल पड़ती है। इसे तो बस देखते रहिए और मन से जीते रहिए। इसकी छाया इतनी शीतल होती है कि मन और आत्मा को एक साथ शीतल कर देती है।

सप्तपर्णी जब खिलती है तो अपने आसपास के संसार को जीवन से महक से सौंदर्य से भर देती है

सप्तपर्णी की चर्चा अज्ञेय अपनी कहानियों में उपन्यासों में खासकर ‘नदी के दीप’ में बहुत मन से करते हैं। मानवीय संबंधों के लिए राग के जीवन संसार के लिए स्नेह के बंधन में बंधे संबंधों की आंख में सप्तपदी की छाया देखते ही बनती है। आज शरद की शाम में सप्तपर्णी कुछ इस तरह ध्यान खींचती है कि सप्तपर्णी तो जाने कहां गुम हो गई और चारों तरफ बस फूलों के गुच्छे ही गुच्छे दिख रहे हैं। फूलों के इन गुच्छों को देखते कभी गुलदस्ते तो कभी फूलगोभी तो कभी फूल ही फूल जीवन की धरा पर फूटते दिखाई देते हैं। फूलों के इस वैभव को देखते ही जीवन की सप्तपर्णी के खिलने का भान होता है। सप्तपर्णी जब खिलती है तो अपने पूरे आसपास के वातावरण में एक मादक महक अपनी ओर खींचने वाली महक के रूप में ध्यान खींच लेती है। इन फूलों की महक इतनी तेज होती है कि आपको यह भी लग सकता है कि आम में जब बौर आते हैं तो बाग के आसपास जाते ही बौर की महक और मिठास से जहां मन भर जाता है ठीक उसी तरह सप्तपर्णी जब खिलती है तो अपने आसपास के संसार को जीवन से महक से सौंदर्य से और जीवन प्रियता से गमक से एकसाथ भर देती है। सप्तपर्णी बस इसी तरह खिलती रहो । जीवन पथ पर मानवी उस्मा की सुगंध बरसाती सप्तपर्णी अपने साथ-साथ मन यात्रा पर चली जा रही है । यह समय सप्तपर्णी के खिलने का , गमकने का , महकने का है । आप भी सप्तपर्णी के आसपास से गुजरते हुए इस अनुभव को महसूस करते चलें । सप्तपर्णी बस इसी तरह खिलती रहो।

(एसोसिएट प्रोफेसर हिंदी)

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