” मिलेगी दूर तक राहों में तुमको खूब हरियाली, अभी गुजरा यहाँ से झूमता गाता हुआ सावन”

श्रावणी अमावस्या पर दूरस्थ परिवारजनों और प्रिय के घर लौटने की कामना के साथ यह उत्सवधर्मिता प्रारंभ होती है, तो फिर तीज,रक्षाबंधन, कृष्ण जन्माष्टमी गणेश चतुर्थी,अनंत चतुर्दशी, श्राद्ध पक्ष, नवरात्रि,विजयादशमी को मनाती हुई दीवाली के बड़े त्यौहार में परिवर्तित हो जाती है

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दशहरा मेला फाइल फोटो अखिलेश कुमार

-डॉ.रामावतार सागर-

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डॉ.रामावतार “सागर”

भारत एक उत्सव प्रिय देश है। यहाँ की माटी में ही मन और मौसम के अनुकूल आनंदित होने के लिए तीज-त्यौहारों का सृजन करने की अद्भुत परंपरा है।कृष्ण जन्माष्टमी से राम नवमी तक समय लोकोत्सवधर्मिता का समय रहता है।वर्षा ऋतु के आगमन से जन मानस में सुखद हिलोरें जन्म लेने लगती है तो उसका प्रकटीकरण उत्सव के रूप में होता है।सावन के महीने में छायी चहुँओर हरियाली मन को भी हरा-भरा कर देती है।मस्ती भरा मन उत्सव मनाने को झूम उठता है और सृजित कर लेता है ऐसे तीज-त्यौहार जो जीवन के आनंद को द्विगुणित कर देतें हैं। इस दौरान पूरे भारत में ही उत्सव का वातावरण रहता है। श्रावणी अमावस्या पर दूरस्थ परिवारजनों और प्रिय के घर लौटने की कामना के साथ यह उत्सवधर्मिता प्रारंभ होती है, तो फिर तीज,रक्षाबंधन, कृष्ण जन्माष्टमी गणेश चतुर्थी,अनंत चतुर्दशी, श्राद्ध पक्ष, नवरात्रि,विजयादशमी को मनाती हुई दीवाली के बड़े त्यौहार में परिवर्तित हो जाती है।जिस प्रकार वर्षों ऋतु में नदी-नाले छलक कर बह उठते है अंततः बड़ी नदी में जाकर विश्राम पाते है उसी प्रकार छोटे-छोटे पर्वों की यह श्रृंखला दीपावली की दीप-मालिका में विसर्जित हो जाती है।दीपावली के दीये मानो एक-एक पर्व का प्रतिनिधित्व कर रहे हो।फसल की बुवाई से लेकर कटाई तक प्रत्येक अवसर पर उत्साहित मानव-मन गीत गाता है ,उन गीतों पर झूमता है,नाचता है। अनहद नाद की ऐसी अनवरत श्रृंखला एक बड़े त्यौहार में परिवर्तित हो झूम उठती है। चौमासा बड़े आराम से कट जाता है। प्राचीन काल में जब नदी-नाले उफान पर होते थे तो आवागमन बाधित हो जाता था। इसीलिए चौमासे के पहले ही सारी व्यवस्थाएं चाक-चौबंद करनी होती थी। चौमासे में साधू-संत, ऋषि- मुनि एक ही स्थान पर रह चौमासा व्यतीत करते थे। गीत-संगीत और भजन-भाव की सुर लहरियाँ संपूर्ण वातावरण को दिव्य बनाए रखती थी। किसान खेतों में लहलहाती फसलों को देखकर प्रसन्न होते। यह प्रसन्नता आनंद के साथ रागात्मक संबंध बना उत्सव में परिणीत हो जाती है और फिर प्रारंभ हो जाता है तीज-त्यौहारों का ऐसा अनहद नाद जो लोक को आनंदित कर प्रकृति के साथ झूमने लगता है। ग़ज़ल के एक शे’र से अपनी बात समाप्त करता हूँ।
” मिलेगी दूर तक राहों में तुमको खूब हरियाली
अभी गुजरा यहाँ से झूमता गाता हुआ सावन”

डॉ.रामावतार सागर
सहायक आचार्य हिंदी
9414317171
ramavtar.gbc@gmail.com

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Neelam
Neelam
3 years ago

मिलेगी दूर तक राहों में तुमको खूब हरियाली
अभी गुजरा यहाँ से झूमता गाता हुआ सावन”
वाह क्या बात है।