-मनु वाशिष्ठ-

वैसे तो आलू, छोटे बड़े, गरीब अमीर सभी भारतीयों को पसंद है, लेकिन उत्तर भारत में आलू सबकी विशेष पसंदीदा सब्जी है। सर्दियां आते ही नए आलू का इंतजार सभी को रहता है। बचपन में मां, पिताजी से हमेशा पहाड़ी आलू की ही मांग रखतीं, कहतीं लोकल आलू की बजाय पहाड़ी आलू का स्वाद अच्छा होता है। सबकी रसोई में आलू की उपस्थिति हर वक्त मौजूद रहती है, इसके खराब होने का डर जो नहीं होता। आलू सब सब्जियों का महाराजा समझिए, इसकी महिमा अपरम्पार। घर में माता, बहनों को जब डिनर में कुछ सब्जी समझ ना आए तो आलू जिंदाबाद! किसी के लिए #आलू का दही वाला झोल, तो किसी के लिए #दम आलू की शान है, हां! आलू हर रसोई की जान है। आलू की रोज नई नई सब्जी बन सकती है, उत्तरी भारत की महिलाएं ये हुनर खूब जानती हैं, किसी भी सब्जी में आलू मिला दीजिए नई सब्जी तैयार। हमारे समय में तो स्कूल के टिफिन में आलू फ्राई और परांठे, अधिकतर बच्चों के टिफिन में मुख्य नाश्ता हुआ करता था। कहीं यात्रा में बाहर जाना हो, कोई रिश्तेदार घर आ जाएं तो खाने में, एक आलू की सब्जी तो फिक्स ही समझिए। दादी व्रत में आलू का हलुआ बना लेती हैं तो दादाजी को आलू के परांठे/ कचौड़ी/ बटाटाबड़ा पसंद है, मां चिप्स पापड़ तैयार कर लेती हैं, तो पोता में फ्रेंच फ्राइज/ फिंगर चिप्स पसंद करता है। छुटकी की चाट (टिक्की/भल्ले) में तो मुख्य इंग्रीडिएंट ही आलू है, जो हर किसी को पसंद है। बिहार यूपी में कई जगह पर लोग इसे गर्म राख/बालू रेत में भून कर ऐसे ही या कई लोग चटपटा बनाकर भी खाते हैं। गरीब अमीर, छोटे बड़े, बच्चे बुजुर्ग, घर की महिला हो या हलवाई सबको आलू की सब्जी खूब भाई।
घर में दादी हमेशा सीख देती रहती हैं, सीखो कुछ आलू से, आलू की तरह बनो। किसी भी सब्जी में मिला दो, स्वाद बढ़ा देता है। सब में मिक्स हो जाता है। ऐसे ही घुलमिल कर रहना सीखो। एक दिन गुरूजी के यहां जाना हुआ, तो उन्होंने कहा आलू मत बनो, कि हर कोई आपको इस्तेमाल कर सके। अपनी आइडेंटिटी नहीं खोनी चाहिए। अब समझ नहीं आ रहा क्या करूं? आलू जैसे बनें या ना बनें, अब यह आपके विवेक पर निर्भर करता है, पर आलू है तो सब्जियों का बादशाह ही, यह तो मानना ही पड़ेगा।
__ मनु वाशिष्ठ, कोटा जंक्शन राजस्थान


















आलू जैसे मत बनो लेकिन आलू बनाओ जरूर
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क्या बात है।आलूमय पोस्ट।????????
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