असम में ‘फ्रेंडली फाइट’ की रणनीति, निशाने पर भाजपा का वोट बैंक

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असम विधानसभा चुनाव 2026 में झारखंड मुक्ति मोर्चा का अलग चुनाव लड़ना पहली नजर में विपक्षी एकता में दरार जैसा दिखता है, लेकिन गहराई से देखने पर यह एक सोची-समझी रणनीति भी हो सकती है। खासकर चाय बागान और आदिवासी बहुल क्षेत्रों में झामुमो की मौजूदगी भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगा सकती है।

-देवेंद्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

असम में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा, 2026 के विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी या प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस को नुकसान पहुंचाएगी या फायदा करेगी। झारखंड मुक्ति मोर्चा ने असम चुनाव में अपने 21 उम्मीदवार मैदान में उतारकर राजनीतिक गलियारों और मीडिया में चर्चा का माहौल बना दिया है। अब यह सवाल उठ रहा है कि इंडिया गठबंधन के घटक दल झारखंड मुक्ति मोर्चा ने असम विधानसभा चुनाव में अपने अलग 21 उम्मीदवार क्यों उतारे। क्या असम में इंडिया गठबंधन टूट गया है। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कांग्रेस झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ सत्ता में है।

चर्चा यह भी है कि असम कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गौरव गोगोई, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से असम विधानसभा चुनाव को लेकर मिलने गए थे। दोनों के बीच क्या बातचीत हुई, यह स्पष्ट नहीं हो पाया। मगर खबर यह रही कि हेमंत सोरेन असम में आठ विधानसभा सीटें कांग्रेस से मांग रहे थे। क्या कांग्रेस ने यह मांग ठुकरा दी, या फिर दोनों नेताओं के बीच भारतीय जनता पार्टी को लगातार तीसरी बार जीत से रोकने की कोई रणनीति बनी। इसी रणनीति के तहत हेमंत सोरेन ने 21 उम्मीदवार मैदान में उतारे।

हेमंत सोरेन ने असम के जिन चाय बागान क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार उतारे हैं, वहां भारतीय जनता पार्टी की स्थिति कांग्रेस से अधिक मजबूत मानी जाती है। ऐसे में यदि कांग्रेस झारखंड मुक्ति मोर्चा को आठ सीटें भी दे देती, तो उसे सीधा लाभ नहीं होता। बल्कि नुकसान की स्थिति बनी रहती और भारतीय जनता पार्टी संभवतः 2021 के अपने परिणाम को दोहरा सकती थी। शायद यही वजह है कि कांग्रेस ने झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ 21 सीटों पर फ्रेंडली फाइट को स्वीकार किया।

असम के चाय बागान क्षेत्रों में प्रवासी मतदाताओं की संख्या अधिक है और इनमें से ज्यादातर मतदाता अब तक सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में झुकाव रखते रहे हैं। यहां बड़ी संख्या में वे आदिवासी मतदाता भी हैं, जो रोजगार के लिए बाहर से आकर बसे हैं, जिनमें झारखंड मूल के लोगों की संख्या अधिक है। माना जा रहा है कि ये मतदाता देश के प्रभावशाली आदिवासी नेता हेमंत सोरेन के प्रभाव में आकर भाजपा के बजाय झारखंड मुक्ति मोर्चा की ओर रुख कर सकते हैं।

यदि झारखंड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार जीतते हैं और असम में कांग्रेस की सरकार बनती है, तो झारखंड की तरह यहां भी झारखंड मुक्ति मोर्चा को सत्ता में हिस्सेदारी मिल सकती है। संभव है कि दोनों दलों के बीच यही समझ बनी हो। इसी के तहत यह रणनीति तैयार की गई हो कि दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ते हुए भी भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से बाहर करने की कोशिश करें।

असम में कांग्रेस छह दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ रही है। सत्ता में वापसी के लिए पार्टी के वरिष्ठ चुनावी रणनीतिकार और कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवाकुमार पूरी ताकत से जुटे हैं। जहां तक झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा 21 सीटों पर चुनाव लड़ने का सवाल है, इससे कांग्रेस को अपेक्षाकृत कम नुकसान और भाजपा को अधिक नुकसान होने की संभावना जताई जा रही है। अब तक हिंदुत्व के मुद्दे पर आदिवासी मतदाता भारतीय जनता पार्टी के साथ रहे हैं, लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा के मैदान में उतरने से इन मतों का विभाजन हो सकता है।

हालांकि एक अहम सवाल अब भी बना हुआ है। क्या 21 सीटों के अलावा बाकी सीटों पर हेमंत सोरेन असम में कांग्रेस उम्मीदवारों के समर्थन में प्रचार करेंगे। यदि ऐसा होता है, तो इसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है। कुल मिलाकर, झारखंड मुक्ति मोर्चा जितनी भी सीटें जीतेगा, उससे कांग्रेस को कम और भारतीय जनता पार्टी को अधिक नुकसान होने की संभावना है, क्योंकि जिन सीटों पर झारखंड मुक्ति मोर्चा मजबूत दिख रहा है, वहां पहले से भाजपा का कब्जा रहा है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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