जमीनी कार्यकर्ताओं पर भरोसा, राहुल गांधी से बढ़ीं उम्मीदें

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photo courtesy social media
अब कांग्रेस के सामने साफ चुनौती है। उसे पुराने ढर्रे से बाहर निकलना होगा।पार्टी अगर जमीनी कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाने की अपनी लाइन पर कायम रहती है, तो आने वाले समय में उसे इसका फायदा मिल सकता है। अब नजर इस बात पर है कि राहुल गांधी राजस्थान और मध्य प्रदेश में क्या फैसला लेते हैं।

-देवेन्द्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

राहुल गांधी ने गत दिनों संपन्न हुए राज्यसभा चुनाव में जिस तरह कांग्रेस के जमीनी और साधारण कार्यकर्ताओं को चुनाव मैदान में उतारा, उससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा और उनके प्रति विश्वास भी मजबूत हुआ कि वे जो कहते हैं, उसे करके भी दिखाते हैं। हरियाणा, हिमाचल, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और तमिलनाडु के बाद अब राजस्थान और मध्य प्रदेश के कार्यकर्ता भी उम्मीद कर रहे हैं कि आने वाले राज्यसभा चुनाव में राहुल गांधी पहले की तरह साधारण कार्यकर्ताओं को ही मौका देंगे। राजस्थान से राज्यसभा में जाने के लिए लंबे समय से मुस्लिम समुदाय के कार्यकर्ता और नेता इंतजार कर रहे हैं, वहीं मध्य प्रदेश में पिछड़ी जाति के कार्यकर्ता और नेता अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।

कांग्रेस के लिए मध्य प्रदेश और राजस्थान महत्वपूर्ण राज्य हैं। दोनों ही जगह पार्टी कमजोर हुई है, लेकिन खत्म नहीं हुई है। यदि रणनीतिकार बेहतर रणनीति बनाएं और पार्टी के नेता आपसी तालमेल दिखाएं, तो 2028 के विधानसभा चुनाव में वापसी संभव है। इसके लिए कांग्रेस को अभी से ठोस योजना बनानी होगी। साथ ही, राज्यसभा चुनाव में किसे या किस समुदाय के नेता को प्रत्याशी बनाया जाए, इस पर भी ध्यान देना होगा।

राजस्थान में मुस्लिम समुदाय आज भी कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक है और कई विधानसभा सीटों पर उसका प्रभाव है। इसके बावजूद कांग्रेस की ओर से राजस्थान से संसद में मुस्लिम समुदाय का कोई भी प्रतिनिधि न राज्यसभा में है और न ही लोकसभा में। ऐसे में 2028 के चुनाव को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस को इस समुदाय के नेता को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाना चाहिए।

मध्य प्रदेश की बात करें तो यहां कांग्रेस न तो कमजोर है और न ही खत्म हुई है। लेकिन उसकी सबसे बड़ी कमजोरी उसका हाईकमान रहा है, जो समय रहते साधारण कार्यकर्ताओं को बड़ा नेता नहीं बना पाया और लंबे समय से सत्ता और संगठन पर काबिज नेताओं पर ही भरोसा करता रहा है।

मध्य प्रदेश में एक समय पंडित रविशंकर शुक्ल और पी.सी. सेठी जैसे नेता प्रभावशाली थे। बाद में कांग्रेस ने समय के अनुसार अर्जुन सिंह और फिर दिग्विजय सिंह को आगे बढ़ाया। आज फिर सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस को नए नेतृत्व की जरूरत नहीं है, जो पार्टी को मजबूत कर सके और सत्ता में वापसी करा सके।

राहुल गांधी खुद कहते हैं कि अब डाटा महत्वपूर्ण है। अगर इसी आधार पर देखें, तो मध्य प्रदेश में होने वाले राज्यसभा चुनाव में पिछड़ी जाति के नेता को मौका देना जरूरी है, क्योंकि उनका फोकस जातीय भागीदारी पर है। राज्य में यादव के अलावा बघेल जाति भी प्रभावशाली है। इस प्रभाव को सबसे पहले बहुजन समाज पार्टी ने पहचाना था और दतिया विधानसभा सीट से राधेलाल बघेल को उम्मीदवार बनाया था। वे चुनाव जीते और बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए। इसके बावजूद कांग्रेस ने अब तक बघेल समुदाय के किसी नेता को पर्याप्त अवसर नहीं दिया, जबकि मायावती ने उन्हें मौका देकर सफलता हासिल की।

कांग्रेस लंबे समय से मध्य प्रदेश की सत्ता से बाहर है। 2018 में पार्टी ने वापसी की थी और कमलनाथ मुख्यमंत्री बने थे। उस समय ज्योतिरादित्य सिंधिया 2019 का गुना लोकसभा चुनाव हार गए थे। बाद में वे राज्यसभा जाना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह को टिकट दे दिया। इसके बाद सिंधिया ने पार्टी छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए, जिससे एक साल के भीतर ही कांग्रेस सरकार गिर गई।

आंतरिक खींचतान ने पार्टी को कमजोर किया है। 2018 में 114 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 2023 में 66 सीटों पर सिमट गई। इस स्थिति में पार्टी को आत्ममंथन की जरूरत है। दिग्विजय सिंह मेहनत करते हैं, लेकिन उनकी मेहनत पर असर क्यों नहीं दिखता, इस पर भी विचार होना चाहिए। राहुल गांधी को खासकर मध्य प्रदेश में पिछड़ी जाति के किसी साधारण कार्यकर्ता को राज्यसभा भेजने पर ध्यान देना चाहिए, जैसा हरियाणा और हिमाचल में किया गया।

अब कांग्रेस को मध्य प्रदेश में परंपरागत राजनीति से ऊपर उठकर नया नेतृत्व खोजना होगा। जैसे 90 के दशक में ब्राह्मण राजनीति से आगे बढ़कर अर्जुन सिंह और दिग्विजय सिंह को आगे लाया गया था, उसी तरह आज भी नए चेहरों को मौका देने की जरूरत है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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