
असम विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए सिर्फ एक राज्य की लड़ाई नहीं, बल्कि उसकी राष्ट्रीय राजनीतिक प्रासंगिकता की परीक्षा बन गया है। भाजपा और झारखंड मुक्ति मोर्चा के बीच संतुलन साधते हुए बेहतर प्रदर्शन करना कांग्रेस के लिए जरूरी भी है और कठिन भी। यहां का परिणाम न केवल असम, बल्कि झारखंड की राजनीति और कांग्रेस के गठबंधन भविष्य को भी प्रभावित कर सकता है।
-देवेंद्र यादव-

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के लिए सबसे खास और चुनौतीपूर्ण राज्य असम है। असम में कांग्रेस को सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले हर हाल में बेहतर प्रदर्शन करना होगा। असम में कांग्रेस का भाजपा से बेहतर प्रदर्शन करना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही बड़ी राजनीतिक चुनौती भी है। असम में कांग्रेस के सामने चुनौती केवल सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ही नहीं, बल्कि झारखंड मुक्ति मोर्चा भी है, जो विधानसभा चुनाव 2026 में 21 सीटों पर चुनाव लड़ रहा है। कांग्रेस के लिए भाजपा और झारखंड मुक्ति मोर्चा दोनों से बेहतर प्रदर्शन करना बड़ी चुनौती है।
असम चुनाव कांग्रेस के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा की नजर असम के साथ-साथ झारखंड पर भी होगी। यदि असम में भाजपा और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने कांग्रेस से बेहतर प्रदर्शन किया, तो कांग्रेस के लिए झारखंड में अपने गठबंधन और सत्ता में भागीदारी को बचाए रखना मुश्किल हो जाएगा। संभवतः भारतीय जनता पार्टी की रणनीति भी इसी पर केंद्रित है कि असम चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा का प्रदर्शन कैसा रहता है। यदि उसका प्रदर्शन कांग्रेस से बेहतर रहा, कांग्रेस असम की सत्ता से दूर रही और भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, लेकिन वह सबसे बड़ा दल बनकर उभरी, तो उसकी नजर झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रदर्शन के साथ-साथ झारखंड की राजनीति पर भी रहेगी, जहां कांग्रेस फिलहाल झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ गठबंधन में सरकार चला रही है।
यदि भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें, तो यह स्पष्ट होता है कि उसने उन राज्यों में, जहां कभी कांग्रेस की सरकारें हुआ करती थीं, क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर या अंदरूनी समर्थन देकर कांग्रेस को सत्ता से दूर रखा है। पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और उत्तर प्रदेश इसके प्रमुख उदाहरण हैं, जहां कांग्रेस को पहले सत्ता से बाहर किया गया और बाद में धीरे-धीरे हाशिये पर पहुंचा दिया गया।
मैंने अपने ब्लॉग में कई बार कांग्रेस को आगाह किया है कि राहुल गांधी को यह समझना चाहिए कि कांग्रेस ही वह पार्टी है जिसे सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी से सीधे संघर्ष कर सत्ता में आना है। राहुल गांधी और कांग्रेस को इस गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए कि क्षेत्रीय दल स्थायी रूप से उनके साथ हैं। क्षेत्रीय दल तब तक कांग्रेस के साथ रहते हैं, जब तक कांग्रेस मजबूत रहती है और उनका पारंपरिक वोट पूरी तरह क्षेत्रीय दलों में स्थानांतरित नहीं हो जाता, तथा वे अपने-अपने राज्यों की सत्ता में बने रहते हैं। सत्ता में बने रहने के लिए क्षेत्रीय दलों को भाजपा से भी परहेज नहीं होता।
आंध्र प्रदेश को लेकर सोशल मीडिया पर वोट चोरी के आरोप भी सामने आए हैं। इससे कांग्रेस और राहुल गांधी को यह समझना होगा कि भाजपा, कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने के लिए राज्यों में किस तरह की रणनीतियां अपनाती है। आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को सत्ता से दूर रखने के लिए भाजपा ने चंद्रबाबू नायडू की पार्टी को सत्ता दिलाने में भूमिका निभाई और बदले में 2024 में केंद्र की सत्ता में समर्थन प्राप्त किया।
राहुल गांधी और कांग्रेस को अब यह समझ आ गया होगा कि चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार जैसे नेता केंद्र में भाजपा को समर्थन क्यों दे रहे हैं। दोनों ही नेता अपने-अपने राज्यों में भाजपा के समर्थन के बिना सत्ता में नहीं रह सकते थे। संभवतः भाजपा के रणनीतिकारों ने ही ऐसी परिस्थितियां बनाई हैं, जिससे कांग्रेस को सत्ता से दूर रखा जा सके। कांग्रेस और राहुल गांधी को यह समझना होगा कि उन्हें अकेले ही लड़कर भारतीय जनता पार्टी से सत्ता हासिल करनी होगी।
कांग्रेस के रणनीतिकारों की स्थिति पर हैरानी होती है कि 2014 के बाद से वे अब तक भाजपा की रणनीतियों को पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं और लगातार क्षेत्रीय दलों पर निर्भर रहे हैं, जिसके चलते कई राज्यों में कांग्रेस कमजोर होती चली गई। यह भरोसे का भी सवाल है। राहुल गांधी शायद अभी भी उन नेताओं पर पूरा भरोसा नहीं जता पा रहे हैं, जो राज्यों में कांग्रेस के लिए संसद से लेकर सड़क तक संघर्ष कर रहे हैं। इसका एक उदाहरण बिहार के निर्दलीय सांसद पप्पू यादव हैं, जो 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले से ही कांग्रेस के पक्ष में भाजपा के खिलाफ सक्रिय रहे हैं।
असम चुनाव में पप्पू यादव कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते थे, लेकिन कांग्रेस शायद उनकी क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर पाई। अभी भी समय है राहुल गांधी को पप्पू यादव को असम चुनाव में सक्रिय भूमिका देनी चाहिए। साथ ही, उन्हें पश्चिम बंगाल के चुनाव में भी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

















