
संसद में बिल पास न होने की विपक्षी खुशी के बीच असली परीक्षा 4 मई के चुनाव परिणाम होंगे। क्या भाजपा की रणनीति फिर भारी पड़ेगी, या विपक्ष अपनी जीत को बरकरार रख पाएगा?
-देवेंद्र यादव-

जीतकर बाजी हारने वाले को बाजीगर कहते हैं। 17 अप्रैल को सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी अपने एक दशक से अधिक के कार्यकाल में पहली बार कोई बिल पास नहीं करवा पाई। क्या भाजपा ने महिला आरक्षण बिल के साथ परिसीमन बिल को जोड़कर अपनी बाजीगरी दिखाई? और क्या अब भाजपा पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में अपनी सरकार बनाएगी? यदि भाजपा के पुराने चुनावी ट्रैक रिकॉर्ड को देखें, तो उसके राजनीतिक पैंतरे कुछ इसी तरह के नजर आते हैं। भाजपा के रणनीतिकार कांग्रेस सहित विपक्षी दलों के सामने चुनावी मौसम में बड़े मुद्दे खड़े कर उन्हें खुश होने का मौका देते हैं, और फिर उन्हें अपने जाल में फंसा लेते हैं। कांग्रेस सहित विपक्षी दल भाजपा की रणनीति को समझे बिना ही खुश हो जाते हैं और चुनाव में जीती हुई बाजी हार जाते हैं।
बंगाल और तमिलनाडु की चुनौती
सवाल यह है कि क्या पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में भाजपा अपनी सरकार बनाएगी? यह चुनौती भाजपा के लिए नहीं, बल्कि कांग्रेस, डीएमके और तृणमूल कांग्रेस के सामने अधिक बड़ी है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की सरकार है, जबकि तमिलनाडु में स्टालिन की डीएमके और कांग्रेस गठबंधन की सरकार है।
17 अप्रैल बनाम 4 मई की असली परीक्षा
यदि 17 अप्रैल को संसद में तीन बिलों की बात करें, तो कांग्रेस सहित विपक्षी दलों के लिए असली खुशी का दिन 17 अप्रैल नहीं, बल्कि 4 मई होगा, जब पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम आएंगे। यदि इन चुनावों में भाजपा हारती है और कांग्रेस सहित विपक्षी दल, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके अपनी सरकार बनाते हैं, तो यह संसद में बिल पास नहीं होने की खुशी से भी बड़ी होगी।
जनता के बीच भाजपा की स्थिति
इन चुनाव परिणामों से यह भी स्पष्ट होगा कि केंद्र में भाजपा सरकार जनता के बीच कितनी लोकप्रिय रह गई है या कितनी कमजोर हुई है। पांच राज्यों के परिणाम यह संकेत देंगे कि सत्ताधारी भाजपा संसद से लेकर सड़क तक मजबूत है या कमजोर पड़ रही है।
मोदी का संदेश और भाजपा का आत्मविश्वास
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 18 अप्रैल को रात 8:30 बजे जनता को दिया गया संबोधन यह संकेत देता है कि भाजपा और उसके नेता अभी भी खुद को मजबूत मानते हैं और विपक्ष के राजनीतिक मंसूबों को सफल नहीं होने देना चाहते।
विपक्षी एकता का सवाल
कांग्रेस नेता राहुल गांधी लंबे समय से विपक्षी दलों को भाजपा के खिलाफ एकजुट होने का आह्वान कर रहे थे। 17 अप्रैल को संसद में विपक्षी एकता दिखाई भी दी, लेकिन क्या यह एकता देर से आई? और यदि आई भी, तो क्या यह 2029 के लोकसभा चुनाव तक कायम रह पाएगी?
खड़गे की चेतावनी
कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने यहां तक कहा है कि यदि विपक्ष एकजुट नहीं हुआ, तो उसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।
इंडिया गठबंधन की उलझनें और संकेत
जब भी भाजपा के खिलाफ कांग्रेस और राहुल गांधी ने मुद्दे उठाए और विपक्षी एकता के नाम पर बैठकें हुईं, तब सबसे ज्यादा चर्चा तृणमूल कांग्रेस और उसकी नेता ममता बनर्जी को लेकर हुई। सवाल उठता रहा कि विपक्षी एकता कहां है और ममता बनर्जी इन बैठकों में क्यों नहीं शामिल हो रहीं। इस सवाल ने मीडिया और राजनीतिक गलियारों में कांग्रेस सहित इंडिया गठबंधन को काफी परेशान किया। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के ऐलान के समय कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच गठबंधन नहीं हुआ और कांग्रेस ने सभी सीटों पर अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए। तब यह धारणा बनी कि इंडिया गठबंधन कमजोर हो गया है। हालांकि, 17 अप्रैल को संसद में यह गठबंधन एकजुट नजर आया, लेकिन उसके लिए असली परीक्षा पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव होंगे। यदि वहां जीत मिलती है, तभी यह एकता सार्थक मानी जाएगी, जिसके लिए 4 मई तक इंतजार करना होगा।

















