
-तमिलनाडु की राजनीति में नया मोड़
तमिलनाडु की बदली राजनीतिक तस्वीर में कांग्रेस का टीवीके को समर्थन क्या डीएमके के साथ विश्वासघात था या फिर भाजपा को रोकने की दूरदर्शी रणनीति? वरिष्ठ पत्रकार देवेन्द्र यादव का विश्लेषण राज्य की नई सत्ता राजनीति, राहुल गांधी की रणनीति और इंडिया गठबंधन के भविष्य पर कई अहम सवाल खड़े करता है।
-देवेन्द्र यादव-

कांग्रेस ने डीएमके की पीठ पर खंजर घोंपा है या फिर उसे संजीवनी दी है] यह फिलहाल एक राजनीतिक रहस्य बना हुआ है। इस रहस्य से पर्दा कब उठेगा, या उठेगा भी या नहीं, यह तो समय ही बताएगा। हालांकि, तमिलनाडु की राजनीति में हालिया घटनाक्रम ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। डीएमके ने सत्ता गंवा दी, वहीं एआईडीएमके भी सत्ता में वापसी नहीं कर पाई। इसी बीच विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले बने राजनीतिक दल टीवीके ने 108 सीटें जीतकर पहली बार तमिलनाडु में अपनी सरकार बना ली। इस घटनाक्रम की राजनीतिक गलियारों में व्यापक चर्चा हो रही है।
कांग्रेस के समर्थन पर उठे सवाल
सबसे ज्यादा चर्चा इस बात को लेकर हो रही है कि कांग्रेस ने डीएमके का साथ छोड़कर टीवीके को समर्थन दे दिया। यहीं से डीएमके नेता स्टालिन ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने डीएमके की छाती पर खंजर चलाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कर्नाटक की एक सभा में इसी बात का उल्लेख किया। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस ने वास्तव में डीएमके के साथ विश्वासघात किया, या फिर टीवीके की सरकार बनवाकर डीएमके को राजनीतिक संजीवनी दे दी?
भाजपा की रणनीति और राहुल गांधी का दांव
यदि भाजपा के चुनावी प्रदर्शन और विभिन्न राज्यों में सरकार बनाने के उसके ट्रैक रिकॉर्ड को देखा जाए, तो कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का टीवीके को समर्थन देना एक दूरगामी राजनीतिक रणनीति माना जा सकता है। ऐसा माना जा रहा है कि इस कदम से राहुल गांधी ने तमिलनाडु के दोनों बड़े क्षेत्रीय दलों को राजनीतिक रूप से बचा लिया। अन्यथा, भाजपा तमिलनाडु में भी वही स्थिति पैदा कर सकती थी, जैसी दिल्ली में आम आदमी पार्टी, बिहार में राष्ट्रीय जनता दल, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, ओडिशा में बीजू जनता दल और उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के साथ देखने को मिली।
राष्ट्रपति शासन और भाजपा की संभावनाएं
यदि कांग्रेस टीवीके को समर्थन नहीं देती, तो संभवतः तमिलनाडु में राष्ट्रपति शासन लग सकता था और राज्य की सत्ता अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा के प्रभाव में चली जाती। इसके बाद चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल और बिहार की तरह तमिलनाडु में भी एसआईआर जैसी राजनीतिक परिस्थितियां बन सकती थीं। ऐसी स्थिति में भाजपा दिल्ली, बिहार और पश्चिम बंगाल की तरह तमिलनाडु में भी सत्ता हासिल करने की रणनीति पर आगे बढ़ सकती थी। माना जा रहा है कि राहुल गांधी ने टीवीके को समर्थन देकर भाजपा के इन संभावित राजनीतिक मनसूबों पर पानी फेर दिया।
राहुल गांधी की राजनीतिक परिपक्वता
राहुल गांधी अब दूरदृष्टि और स्पष्ट राजनीतिक इरादे वाले नेता के रूप में नजर आने लगे हैं। भले ही इंडिया गठबंधन के कुछ घटक दल अभी भी उनकी राजनीतिक परिपक्वता पर अंदर ही अंदर सवाल उठाते हों, लेकिन तमिलनाडु के घटनाक्रम में उनकी रणनीतिक सोच स्पष्ट दिखाई दी।
विजय और स्टालिन की मुलाकात के राजनीतिक संकेत
टीवीके नेता विजय थलापति ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके नेता स्टालिन से उनके घर जाकर मुलाकात की। यह मुलाकात बेहद गर्मजोशीपूर्ण माहौल में हुई। इससे यह संकेत मिलता है कि राहुल गांधी का कदम शायद सही साबित हुआ और तमिलनाडु में इंडिया गठबंधन को लेकर उठ रहे सवालों पर विराम लग सकता है। अब यह संभावना जताई जा रही है कि तमिलनाडु में इंडिया गठबंधन समाप्त नहीं होगा, बल्कि और मजबूत हो सकता है। विजय और स्टालिन की आत्मीय मुलाकात ने इसी दिशा में स्पष्ट संकेत दिए हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

















